कांग्रेस को विपक्ष का BIGG BOSS बनने से क्यों रोक रहे ममता और अखिलेश ?
हाल ही में अखिलेश ने ममता से कोलकाता में मुलाकात की थी। जिसके बाद तीसरे मोर्चे की सुर्खियों ने जोर पकड़ लिया था। आगामी चुनाव में तीसरे मोर्चे को लेकर कई दल एकजुट हो रहे हैं।

ममता बनर्जी और अखिलेश यादव को ये मंजूर नहीं कि कांग्रेस विपक्ष की बिग बॉस बने। इसलिए दोनों कांग्रेस को विपक्ष की केन्द्रीय राजनीति से विस्थापित करने की मुहिम में जुट गये हैं। अखिलेश यादव ने भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बना कर चलने की बात कही है। भाजपा के साथ लड़ाई में वे ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आते हैं। उन्होंने कहा है, चूंकि दीदी ने पश्चिम बंगाल में भाजपा को आसानी से रोक लिया इसलिए 2024 के चुनाव में वे उनके साथ रहेंगे। क्या अखिलेश यादव के इस कथन का यह मतलब है कि ममता बनर्जी 2024 में विपक्ष का प्रधानमंत्री चेहरा बनेंगी?
सपा-तृणमूल की कांग्रेस से बढ़ी दूरी
संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में कांग्रेस और विपक्ष के अन्य दलों के बीच दूरियां बढ़ती दिख रही हैं। भाजपा को घेरने के सवाल पर यूपीए के सहयोगी दल कांग्रेस का साथ नहीं दे रहे। शुक्रवार को अडाणी मुद्दे पर जेपीसी की मांग के लिए कांग्रेस ने संसद परिसर में धरना दिया। सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत कई बड़े नेता इसमें शामिल हुए। लेकिन सपा और तृणमूल ने खुद को इस धरना से अलग कर लिया। विपक्षी दल, लंदन प्रकरण पर राहुल गांधी का बचाव करने में कतरा रहे हैं। संसद सत्र में मौजूदा वाकयुद्ध भाजपा और कांग्रेस के बीच नाक की लड़ाई बन गयी है। अगर राहुल गांधी को बढ़त मिल गयी तो वे अपोजिशन के हीरो बन सकते हैं। इसलिए सपा, तृणमूल कांग्रेस के धरना में शामिल नहीं हुई। कांग्रेस और भाजपा के बीच इस लड़ाई में बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस और तेलगूदेशम जैसे दलों ने भी खामोशी ओढ़ ली है।
अखिलेश यादव ने कांग्रेस को नकारा
कांग्रेस के सहयोगी रहे अखिलेश यादव ने अब अपनी आंखें फेर लीं हैं। कोलकाता में आयोजित सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से एक नये राजनीतिक समीकरण की रूपरेखा बनने लगी है। कोलकाता आने के बाद अखिलेश ने कांग्रेस को नकार दिया। उन्होंने जो कहा है उसका यही मतलब है कि अब कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में कोई वजूद नहीं। जब उनसे कोलकाता में पूछा गया, क्या कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता संभव है ? तब उन्होंने जवाब दिया, आप देखेंगे अधिकतर वही सांसद (2024) चुन कर आएंगे जो न तो भाजपा के साथ हैं और न कांग्रेस के। उनके कहने का मतलब है कि अगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की कोई अहमियत नहीं रहेगी। कोलकाता में अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर जा कर उनसे मुलाकात की थी। इसके बाद माना जा रहा है कि कांग्रेसविहीन तीसरे मोर्चे के गठन की कवायद शुरू हो गयी है।
उपचुनाव हारने के बाद ममता का कांग्रेस विरोध बढ़ा
ममता बनर्जी को आखिर कांग्रेस से क्या दिक्कत है ? इस सवाल का जबाब पश्चिम बंगाल के सागरदिघी विधानसभा उपचुनाव के नतीजे में खोजा जा सकता है। इस महीने की शुरू की बात है। कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में भूचाल ला दिया। जिस कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में मृतप्राय माना जा रहा था उसने इस उपचुनाव में चमत्कार कर दिया। ये सीट तृणमूल कांग्रेस की थी लेकिन कांग्रेस ने उससे छीन ली। कांग्रेस उम्मीदवार बायरन विश्वास ने देवाशीष बनर्जी को करीब 22 हजार वोटों से हरा दिया। भाजपा इस उपचुनाव में तीसरे स्थान पर रही। राज्य सरकार के मंत्री सुब्रत साहा के निधन से यह सीट खाली हुई थी। इस सीट पर तृणमूल की हार से ममता बनर्जी की महाशक्तिमान छवि खंडित हुई है। किसी मंत्री की सीट हार जाना उनके लिए चिंता की बात है। ममता बनर्जी को डर है कि अगर केन्द्र स्तर कांग्रेस मजबूत हुई तो पश्चिम बंगाल में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इसलिए वे कांग्रेस को विपक्ष की केन्द्रीय भूमिका से अपदस्थ करना चाहती है।
ममता- अखिलेश की एक जैसी मजबूरी
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के साथ भी यही समस्या है। वे भी कांग्रेस को मजबूत होते नहीं देखना चाहते। अगर अगामी चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता है और कांग्रेस का कोई नेता प्रधानमंत्री बनता है तो यह स्थिति अखिलेश यादव के लिए भी मुफीद नहीं रहेगी। इससे कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में मजबूती मिलेगी जिससे उन्हें ही राजनीतिक नुकसान उठाना होगा। इसलिए सपा इस संभावना से बचने के लिए कांग्रेस से अलग तीसरे मोर्चे की परिकल्पना साकार करना चाहती है। दरअसल अधिकतर क्षेत्रीय दल भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस को भी अपने लिए चुनौती मानते हैं। इसलिए वे राहुल गांधी को विपक्षा का प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने के लिए सहमत नहीं दिख रहे।
...तो फिर कैसे चलें कांग्रेस के साथ ?
कांग्रेस चाहे कितना भी कमजोर क्यों न हो लेकिन आज भी वह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है। इस सच के बावजूद विपक्ष के कई नेता पीएम चेहरा बनने की महत्वाकांक्षा पाले हुए हैं। सबके मन में एक ही ख्याली पुलाव पक रहा है। अगर त्रिशंकु संसद हुई और किसी सर्वमान्य नेता के चयन का सवाल आया तो शायद उनकी किस्मत खुल जाए। जैसा कि एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के साथ हुआ था। 1996 के लोकसभा चुनाव में किसी ने कल्पना नहीं की थी कि ये दोनों प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि इनकी तकदीर संवर गयी। ऐसे महत्वाकांक्षी नेताओं में ममता बनर्जी, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार और चंद्रशेखर राव के नाम लिये जा सकते हैं। हालांकि इनमें से कोई नेता सीधे-सीधे खुद को पीएम चेहरा नहीं मानता लेकिन इनके आसपास के घटनाचक्र इन्ही बातों की तरफ संकेत करते हैं। जब पीएम बनने की छिपी महत्वाकांक्षा इतने नेताओं में हो तो भला कांग्रेस कैसे विपक्ष का अगुआ बन सकती है।












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