चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मोदी की मुलाकात के लिए ममल्लापुरम ( mamallapuram) को ही क्यों चुना गया?
नई दिल्ली- चीन और भारत का द्विपक्षीय संबंध 100-200 साल नहीं, बल्कि 2000 साल पुराना है और ममल्लापुरम 21वीं सदी में भी उसका जीता-जागता उदाहरण है। यही वजह है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच दूसरे अनौपचारिक सम्मेलन के लिए दोनों देशों ने तमिलनाडु के इस ऐतिहासिक स्थल को चुना है। भौगोलिकरण के दौर में दो देशों के बीच कूटनीतिक और सीमा संबंधों में चाहे जो भी मुद्दे रहें, व्यापार एक ऐसा विषय बन चुका है, जिसे नजरअंदाज करने का जोखिम दुनिया का कोई भी देश नहीं ले सकता। चीन और भारत दोनों मुल्क दुनिया के सबसे बड़े आबादी वाले देश भी हैं और सबसे बड़े बाजार भी। यही वजह है कि बात जब घोर कूटनीति की भी निकलती है तो उसमें व्यापारिक हित सबके लिए बहुत ज्यादा मायने रखते हैं। ममल्लापुरम में भारत और चीन के व्यापारिक रिश्तों की नींव बेहद गहरी 0है। वह ऐतिहासिक भी है, सांस्कृतिक भी है और व्यापारिक भी। शायद यही वजह है कि दोनों नेता यहां पर अनौपचारिक दौर की बातचीत करके दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों को एक और नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं।

चीन से 2000 वर्ष पुराना है ममल्लापुरम का संबंध
ममल्लापुरम की पहचान सांस्कृतिक नगरी के रूप में रही है। यह पराक्रमी पल्लव राजाओं के फलते-फूलते बंदरगाह का ऐतिहासिक स्थल भी है। चीन और पल्लव राजाओं के बीच द्विपक्षीय संबंध थे और चीन ने उनके शासन कालों में अपने राजदूतों को भी ममल्लापुरम भेजा था। ममल्लापुरम में आज भी जो पुरातात्विक सबूत मौजूद हैं, उससे पता चलता है कि चीन और इस स्थान का रिश्ता करीब 2000 साल पुराना है। पुरातत्वेत्ताओं के मुताबिक तमिलनाडु के सालुवनकुप्पम में 2004 में हुई खुदाई से भी साफ हो गया कि ममल्लापुरम करीब 2000 साल पहले संगम काल में भी एक बंदरगाह के रूप में विख्यात था। जाने-माने पुरातत्त्ववेत्ता एस राजावेलु के मुताबिक, "पहली और दूसरी ई.पू. के जो समुद्री लहरों के रंग के बर्तन तमिलनाडु के पूर्वी तट से मिले हैं, उससे हमें चीन के मैरिटाइम एक्टिविटीज के संकेत मिलते हैं। " उन्होंने बताया कि बताया कि पुरातात्विक सबूत इस बात के गवाह हैं कि इस क्षेत्र के- जिसमें आज के समुद्र तटीय इलाकों, जैसे ममल्लापुरम और कांचीपुरम जिले भी शामिल हैं, उनके चीन के साथ रिश्ते थे।

सदियों पुराने व्यापारिक रिश्तों के मौजूद हैं अनेकों सबूत
तमिलनाडु में पल्लव राजवंश काल के चीनी सिक्के भी मिले हैं। एस राजावेलु का कहना है कि इससे साफ जाहिर है कि 2000 साल पहले भी इस इलाके का चीन के साथ व्यापारिक संबंध था। यही नहीं पुराने तमिलनाडु के पूर्वी तट पर संगम काल के बाद के एक पौराणिक तमिल कला 'पट्टिनापलाई' भी चीन के लंगर का हवाला देता है। एक और पुरातत्ववेत्ता जो पहले आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से जुड़े रहे हैं, उन्होंने बताया कि उरुत्थिरण कन्नानर की तमिल पुस्तक 'टुंगु नावे' कुछ और नहीं चीन के एक बड़े जहाज 'जुंक' पर ही आधारित है। भारत में ही नहीं तमिलनाडु के साथ चीन के रिश्तों का जिक्र चीनी किताबों में भी मौजूद है, जिसमें 'हान अनाल्स' भी शामिल है। उन्होंने बताया कि चीन के सम्राट वी (185-149 ई.पू. ) ने व्यापारियों को बढ़ावा दिया और पहली सदी की चीनी किताब चेन हां शू में कांचीपुरम को 'हुआंग-चे' बताया गया है और तत्कालीन चीन के राजा ने कांचीपुरम के शासक को अनेकों उपहार भी भेजे थे। पुरातत्त्ववेत्ता एस राजावेलु ने कहा है कि, "अगर आप वयालुर शिलालेख (ममल्लापुरम के पास) को देखेंगे, उसमें लिखा है कि पल्लवों ने अपने दूतों चीन भेजा (6ठी-7वीं ई.) था। इसी तरह चीन में भी तमिल शिलालेख पाए गए हैं।"

चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन त्सांग भी आया था ममल्लापुरम
पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक प्रसिद्ध चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन त्सांग ने 7वीं सदी में कांचीपुरम की यात्रा की थी और इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह प्राचीन बंदरगाह शहर ममल्लापुरम भी पहुंचा था, जिसके बाद उसने मंदिरों के शहर की ओर अपनी यात्रा जारी रखी थी। राजावेलु ने बताया कि ह्वेन त्सांग कांचीपुरम इसलिए आया था कि उसमें बौद्ध धर्म के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानने की जिज्ञासा थी और उसे उस धर्म के मूलग्रंथ भी चाहिए थे। उस समय कांचीपुरम बौद्ध धर्म और शिक्षा का बहुत ही बड़ा केंद्र था, जिसके प्रति आकर्षित होकर ही ह्वेन त्सांग यहां की ओर खिंचा चला आया था।

ममल्लापुरम में होगी भारत-चीन के बीच नए रिश्तों की शुरुआत
दरअसल, अगर 11 और 12 अक्टूबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री मोदी के बीच दूसरा अनौपचारिक सम्मेलन तमिलनाडु के ममल्लापुरम में ही होगा। ये शहर राज्य की राजधानी चेन्नई से करीब 56 किलोमीटर दूर है। इससे पहले पिछले 27 और 28 अप्रैल को दोनों वैश्विक नेता वुहान में पहले दौर का अनौपचारिक सम्मेलन कर चुके है। गौरतलब है कि ये मुलाकात उस वक्त हो रही है, जब जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल-370 हटाने को लेकर पाकिस्तान भारत के खिलाफ आग उगल रहा है। लेकिन, चीन इस मुलाकात को इतनी अहमियत दे रहा है कि उसने इमरान खान की चीन में मौजूदगी के दौरान ही उसे कश्मीर पर झटका देते हुए कह चुका है कि कश्मीर मुद्दे को दोनों देशों को द्विपक्षीय बातचीत और आपसी समझदारी से ही सुलझाया जाना चाहिए। जबकि, इससे पहले यूएन जेनरल असेंबली में चीन का रुख पाकिस्तान के रुख से मेल खाने वाला नजर आया था।
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