कर्नाटक: धर्मांतरण क़ानून बनाने का काम शुरू होने से क्यों घबराया हुआ है ईसाई समुदाय?

कर्नाटक कैबिनेट अब धर्मांतरण विरोधी विधेयक की समीक्षा करने को तैयार है. राज्य की बीजेपी सरकार की योजना है कि राज्य विधानमंडल के मौजूदा सत्र में ही इस विधेयक को क़ानून का दर्जा दिला दिया जाए.

उधर इस नए क़ानून की आहट पाते ही ईसाई लोगों में डर बढ़ने लगा है. इनके प्रतिनिधियों को भय है कि क़ानून बनने से पहले दक्षिणपंथी संगठन और अन्य तत्त्व उनके धर्मगुरुओं और प्रार्थना कक्षों पर अपने सीधे हमले बढ़ा देंगे.

इनका तर्क है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में धर्मांतरण विरोधी विधेयक के सामने आते ही वहां के अल्पसंख्यक समूहों पर हमले बढ़ गए थे.

उत्तर प्रदेश में इस साल मार्च में इस बारे में क़ानून बनाया गया. उससे पहले नवंबर 2020 में राज्य की बीजेपी सरकार इस बारे में एक अध्यादेश लेकर आई थी.

देश के 65 हज़ार चर्चों के समूह और ईसाइयों के तीसरे सबसे बड़े संप्रदाय 'द इवेंजेलिकल फ़ेलोशिप ऑफ़ इंडिया' (ईएफ़आई) ने इस साल जनवरी से दिसंबर के बीच कर्नाटक में हुई 39 घटनाओं का ज़िक़्र एक रिपोर्ट में किया है.

इस रिपोर्ट के अनुसार, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्यों ने रविवार के दिन होने वाली सभा का आयोजन करने से ईसाई धर्मगुरुओं और पादरियों को ज़बरदस्ती रोका और उन पर हमले किए.

इनमें से ज़्यादातर घटनाओं में पुलिस का बर्ताव या तो ढीला रहा या उसने तय किया कि हमला करने वालों और पीड़ितों में सुलह हो जाए और दर्ज शिक़ायतें वापस ले ली जाएं. धर्मगुरुओं का आरोप है कि एक जगह ऐसी 16 घटनाएं घटीं, लेकिन पुलिस ने केवल तीन मामले ही दर्ज किए.

सबसे ताज़ा घटनाक्रम में, कोलार में पुलिस ने बाइबिल की प्रतियां जलाने के ईसाई प्रतिनिधियों के आरोप को ख़ारिज कर दिया.

कोलार के डीसीपी डी. किशोर बाबू ने बीबीसी हिंदी को बताया, "बाइबिल नहीं केवल परचे को जलाया गया था. इस बारे में चूंकि कोई शिक़ायत नहीं की गई, इसलिए कोई केस भी नहीं लिया गया.''

बेंगलुरु के आर्चबिशप पीटर मचाडो ने बीबीसी हिंदी को बताया, "ज़ाहिर सी बात है कि लोगों के अपने हाथों में क़ानून लेने, किताबें जलाने और पुलिस की परवाह न करने की प्रवृत्ति से हम ख़ुश नहीं हैं. अधिकारियों की मौन सहमति मिले होने के संकेत हैं. अब ये विधेयक हमारे दुख-दर्द को और बढ़ाने वाला है. हमें पता है कि इसके पास हो जाने के बाद हमें और उत्पीड़न और कठिनाइयों का सामना करना होगा.''

वहीं ईएफ़आई के महासचिव रेवरेंड विजयेश लाल ने आर्चबिशप मचाडो के बयान को सही ठहराते हुए कहा कि कैसे मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण निरोधक विधेयक के पेश होते ही वहां ईसाई पूजा स्थलों पर हमले की घटनाएं बढ़ गईं.

विजयेश लाल ने कहा, ''ये एक पैटर्न है. किसी समुदाय को परेशान और कमज़ोर किया जाता है. धर्मांतरण करने के झूठे आरोप लगाए जाते हैं. उसके बाद फिर क़ानून बनाया जाता है जिसके बारे में उन्हें मालूम है कि यह असंवैधानिक है. हालांकि उत्तर प्रदेश ने ऐसा किया है. वहां इस क़ानून का दुरुपयोग करके लोगों को फंसाया जा रहा है और सिस्टम अपनी बोली ख़ुद लगा रहा है.''

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नया धर्मांतरण विरोधी क़ानून

विजयेश लाल ने पादरी नंदू नथियान और उनकी पत्नी का उदाहरण दिया, जो ''धर्मांतरण के छोटे से आरोप'' में पिछले क़रीब एक महीने से जेल में हैं.

वो कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश और झारखंड की तरह कर्नाटक में भी इस क़ानून का दुरुपयोग लोगों को परेशान करने के लिए किया जाएगा. आप देखिएगा कि धर्मांतरण के नाम पर कर्नाटक में भी ईसाइयों के साथ शारीरिक हिंसा बढ़ेगी.''

बताया जा रहा है कि कर्नाटक सरकार के इस प्रस्तावित क़ानून को उत्तर प्रदेश में हाल में बने धर्मांतरण क़ानून की तर्ज पर बनाया जाएगा.

उत्तर प्रदेश धर्मांतरण विरोधी क़ानून, 2021 के मुताबिक़, ज़बरदस्ती धर्म बदलवाने पर अधिकतम 10 साल की जेल और 50 हज़ार रुपये तक के जुर्माने की सज़ा दी जा सकती है. वहीं केवल शादी के​ लिए धर्म बदलवाने की बात साबित होने पर शादी भी ख़त्म हो सकती है.

योगी आदित्यनाथ
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इसके तहत धर्म बदलने के पहले डीएम से अनुमति लेना ज़रूरी हो गया है. वहीं धर्म बदलने वालों को धर्मांतरण के बाद एससी या ओबीसी कैटेगरी के तहत मिलने वाले आरक्षण और अन्य लाभों को नहीं दिया जाता.

हालांकि इस क़ानून के बनने के बाद उत्तर प्रदेश और उसके बाहर काफ़ी हो-हल्ला मचा. आलोचकों का आरोप है कि अल्पसंख्यक तबक़ों को परेशान करने के लिए इस क़ानून का जमकर दुरुपयोग हो रहा है.

कर्नाटक के प्रस्तावित क़ानून की फ़िलहाल वहां का क़ानून विभाग ज़रूरी पड़ताल कर रहा है. उसके बाद इसे गुरुवार को राज्य कैबिनेट की बैठक में पेश किया जाएगा. वहां से मंज़ूरी मिलने के बाद इसे राज्य विधानमंडल में पारित कराने के लिए भेजा जाना है.

हुबली से बीजेपी विधायक अरविंद बेलाड ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''धर्मांतरण के ख़िलाफ़ मौजूदा क़ानून असरदार नहीं है. इसे लागू करना कठिन है. दिलचस्प बात ये है कि प्रस्तावित क़ानून से मुसलमान या सिख या जैन जैसे अल्पसंख्यक समूह चिंतित नहीं हैं. केवल ईसाई मिशनरी ही चिंतित हैं.''

राज्य के अधिकतर इलाक़ों में हुए ये हमले

अजीब बात ये कि ईसाइयों के धर्मगुरुओं और प्रार्थना कक्षों पर हुए ये हमले राज्य के कुल 31 में से 21 ज़िलों में हुए हैं.

शुरुआत में ऐसे हमले राज्य के उत्तरी ज़िलों में शुरू हुए. हालांकि जल्द ही कर्नाटक के सभी इलाक़ों से ऐसे छिटपुट मामले आने लगे. लेकिन धर्मांतरण विरोधी विधेयक की चर्चा शुरू होते ही सितंबर के बाद ऐसी घटनाएं नियमित तौर पर होने लगीं.

बेलगावी पादरी संघ के अध्यक्ष रेवरेंड थॉमस टी ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''मैं यहां पिछले 40 साल से हूं, लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा कि ऐसे आरोप अब क्यों आ रहे हैं. यहां काफ़ी हिंदू हमारे दोस्त हैं. हम धर्म नहीं बदलवाते क्योंकि ये क़ानूनी मामला है. आज हम ऐसे मुक़ाम पर खड़े हैं जहां हमें किसी मैरिज हॉल या होटल हॉल में प्रार्थना सभा न करने को कहा गया है.''

कुछ हफ़्ते पहले हासन ज़िले के बेलूर में महिलाओं के चिल्लाने और हट्ठे-कट्ठे पुरुषों द्वारा ज़ोर आजमाइश करके चर्च जाने से रोकने वाले वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे.

सांकेतिक तस्वीर
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इस बारे में पादरी सुरेश पॉल ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''हम सब एक ही जगह के और एक ही साथ पले-बढ़े हैं. लेकिन वे चर्च में ये कहते हुए अचानक घुस गए कि हम लोगों के धर्म बदलवाते हैं. हम ऐसा कैसे कर सकते हैं? हम राष्ट्रवादी हैं. लोगों को देशभक्त बनना सिखाते हैं. हम देशद्रोही नहीं हैं.''

हालांकि कुछ देर बाद पुलिस वहां पहुंची और उस भीड़ को खदेड़ दिया. पादरी पॉल कहते हैं, ''वैसे हमें कोई नुक़सान नहीं हुआ. बाद में उन्होंने पुलिस से इसके लिए माफ़ी मांगी और हमने शांति का ध्यान रखते हुए कोई शिक़ायत भी दर्ज नहीं कराई. हमें पुलिस को ज़रूरी सभी कागज़ात दिखाकर बताना पड़ा कि यह रजिस्टर्ड है. पुलिस ने हमें सुरक्षा दी.''

लेकिन हुबली के बैरीदेवराकोप्पा नामक जगह के पादरी सोमू अवाराधी का ऐसा अनुभव नहीं रहा. वहां जो हुआ उसके चलते हुबली और धारवाड़, दोनों जुड़वां शहरों में काफ़ी विरोध प्रदर्शन हुए.

उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, ''मैं चर्च के भीतर गया तो पाया कि वहां लोग बैठे हैं और भजन गा रहे हैं. नारे भी लगा रहे हैं. उसके बाद मैंने ही पुलिस को फ़ोन करके बुलाया तो ये लोग पलट गए और उल्टा मुझ पर आरोप लगाने लगे कि उन्हें धर्म बदलने के लिए चर्च बुलाया गया था.''

पादरी का आरोप है कि 'ग़ैर-सरकारी तत्त्वों' ने उन्हें थाने के भीतर ही मारा जिसके बाद मुझे अस्पताल ले जाना पड़ा.

वो कहते हैं, ''पुलिस ने मुझे सलाह दी कि कुछ दिनों के लिए मैं शहर से बाहर चला जाऊं. लेकिन जब मैं चित्रदुर्ग के पास पहुंचा तो मुझे रोका गया और हुबली वापस जाने को कहा गया. जब मैं लौटा तो बताया गया कि कुछ लोगों को गाली देने के ​आरोप में मुझे गिरफ़्तार किया जा रहा है. मुझ पर एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया. मुझे 12 दिनों तक जेल में रहने को मजबूर होना पड़ा."

17 अक्टूबर को कई घंटों तक बेंगलुरु-पुणे राजमार्ग जाम करने वाले विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले बीजेपी विधायक अरविंद बेलाड बताते हैं, ''धर्मांतरण में पादरी के लगे रहने से लोग बहुत परेशान थे. हमारे सहयोगियों ने पुलिस को इस बात की शिक़ायत भी की, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.''

हुबली के पुलिस कमिश्नर लाभू राम ने बीबीसी हिंदी को बताया, "इस मामले की जांच की जा रही है क्योंकि पादरी ने चार दिन बाद अपनी शिक़ायत तब दी जब लोगों ने उनके ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज़ कराई."

सांकेतिक तस्वीर
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पुलिस की कार्रवाई

बेलगावी ज़िले की पुलिस शहर के बॉक्साइट रोड पर स्थित सेंट जोसेफ़ वर्कर चर्च के फ़ादर फ़्रांसिस डिसूज़ा पर हुए हमले की भी जांच कर रही है. उनका आरोप है कि एक शख़्स ने उन पर हमला किया.

फ़ादर डिसूज़ा का कहना है, "मैं चर्च के पीछे के अपने कमरे में कुत्ते को भीतर करने गया था. मैंने जैसे ही उसे खोला तो एक आदमी ने 'क्या, क्या' चिल्लाते हुए मुझ पर तलवार चला दिया. मुझे नहीं मालूम कि मैं बच कैसे गया. मैं तुरंत मुड़ा और भागने लगा और वो भी भाग गया. पिछले 30 सालों में पहली बार मुझे ऐसे ख़तरे का सामना करना पड़ा.''

वो कहते हैं कि शिक़ायत करने के बाद ज़िले के शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने चर्च का दौरा किया और मुझे सुरक्षा देने का भरोसा दिया, लेकिन ''मेरे मन में डर अभी भी बना हुआ है.''

बाक़ी ज़िलों के पादरियों को पुलिस ने पहले से बने प्रार्थना कक्षों में भी प्रार्थना सभा न करने की सलाह दी है. लेकिन मार्च के बाद से ही इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

पादरियों से खुलेआम परेड करवाया गया. उन्हें गालियां देने के साथ मारा-पीटा गया. कई मामलों में ख़ुद ईसाई समुदाय ने ही उनसे पुलिस के पास शिक़ायत दर्ज न करने की सलाह दी गई ताकि ''शांति बनी रहे और माहौल ख़राब न हो.''

बेंगलुरु के आर्चडायोसेस (पादरी का अधिकार क्षेत्र) के प्रवक्ता जेए कंठराज इस बारे में बीबीसी हिंदी को बताते हैं, ''टेक्स्ट या परचे बांटना कोई अवैध काम नहीं है. संविधान किसी भी धर्म को प्रचार की अनुमति देता है. हिंदू और मुसलमान के अलावा दूसरे धर्म के लोग भी ऐसा कर सकते हैं. कोलार में पुलिस को ख़ुद ही संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. यह निश्चित तौर पर काफ़ी परेशान करने वाली बात है.''

देश की अदालतों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, झारखंड और हिमाचल प्रदेश में बने इसी तरह के धर्मांतरण विरोधी क़ानूनों को चुनौती दी गई है.

रेवरेंड विजयेश लाल इस बारे में कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश का क़ानून भावना और चरित्र दोनों लिहाज से असंवैधानिक है. धर्म परिवर्तन करवाना सही नहीं है, पर संविधान में सभी धर्म के प्रचार की आज़ादी है. पहले के धर्मांतरण विरोधी क़ानून धर्म परिवर्तन करवाने वाले के लिहाज से बने हुए थे. लेकिन हिमाचल प्रदेश और गुजरात के क़ानून धर्म बदलने वालों से सवाल पूछते हैं. यही कारण है कि उत्तर प्रदेश के नए क़ानून के अनुसार यदि कोई धर्मांतरण पर आपत्ति दर्ज करता है तो धर्म में बदलाव नहीं माना जाएगा. सरकार धर्म बदलने के किसी के अधिकार में सीधे हस्तक्षेप कर रही है.''

सांकेतिक तस्वीर
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'तो ईसाइयों की आबादी बढ़ती क्यों नहीं?'

कर्नाटक के बीजेपी विधायक गूलीहट्टी शेखर का आरोप है कि हज़ारों लोग ईसाई धर्म अपना रहे हैं. उनके इस आरोप को विजयेश लाल 'बिल्कुल बकवास' क़रार देते हैं.

विजयेश लाल कहते हैं, ''भारत में ईसाइयों की आबादी सिर्फ़ 2.1 फ़ीसदी है, जबकि कर्नाटक में यह हिस्सा 1.87 फ़ीसदी से भी कम है और यह बढ़ नहीं रहा है."

हालांकि, 'श्रीराम सेना' के प्रमोद मुतालिक बीबीसी हिंदी से कहते हैं, ''ये आप भी जानते हैं और बहुत से धर्मांतरण हो रहे हैं. ऐसा केवल उत्तरी कर्नाटक के ज़िलों में ही नहीं हो रहा बल्कि पूरे राज्य में हो रहा है.''

प्रमोद मुतालिक लिंगायत समुदाय के संतों के उस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे जिन्होंने सीएम बसवराज बोम्मई से मुलाक़ात करके राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून बनाने की मांग की थी.

बीजेपी विधायक अरविंद बेलाड धर्मांतरण पर हो रही इस बहस को एक अलग रूप देते हैं. वो कहते हैं, ''कैथोलिक लोग मेरे पास आए और कहने लगे कि वे ऐसा नहीं करते, लेकिन प्रोटेस्टेंट यह कर रहे हैं.''

आर्चबिशप मचाडो इस आरोप का विरोध करते हुए कहते हैं, ''हमले ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ हो रहे हैं. हम इसमें एकजुट हैं. हम कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के बीच भेद नहीं करते. हम कहते हैं कि हम साथ चलेंगे.''

मुख्यमंत्री बोम्मई का कहना है कि नया क़ानून केवल धर्म बदलवाने के लिए लालच देने वालों के लिए है?

इस पर आर्चबिशप मचाडो कहते हैं, ''यह व्यंग्य करने का तरीक़ा है. आप बाघ को बाहर जाने दीजिए और कहिए कि चिंता मत कीजिए हम बाघ को अच्छी तरह से जानते हैं और वो आपको नुक़सान नहीं पहुंचाएगा. हालात नियंत्रित करने के लिए राज्य में पहले से पर्याप्त क़ानून है, तो फिर ईसाइयों का नाम क्यों ख़राब करते हैं. ईसाइयों को केवल धर्म बदलवाने में लगे रहने वालों के तौर पर स्थापित नहीं किया जा सकता. सरकार जो हमारे साथ कर ही है, वो अच्छी बात नहीं है.''

वहीं सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल एसजी वोंबटकेरे ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''वजह चाहे जो हो, लेकिन लोगों को क़ानून अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए. अब अप्रचलित बात आम होती जा रही है. यदि मुझे किसी से कोई शिक़ायत है भी तो भी मैं उसे जाकर नहीं पीट सकता. आप चाहे जो कुछ कर चुके हों, लेकिन उसके चलते मुझे आप पर हमला करने की वजह नहीं मिल जाती. हमें अच्छा नागरिक बनने के लिए ज़रूरी काम करना चाहिए.''

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