IB को कंफ्यूज करने वाली होती है CIA की जानकारी!

बेंगलुरु। सोमवार को मुंबई हमलों से जुड़ी एक और खबर आई जब अमेरिकी न्‍यूज पेपर न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने 26/11 हमलों के बारे में यह जानकारी दी कि कैसे ब्रिटेन, अमेरिका और यहां तक कि भारत ने हमले से जुड़ी तमाम इंटेलीजेंस जानकारियों को नजरअंदाज कर दिया।

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वहीं अगर विशेषज्ञों की बात पर यकीन करें तो अमेरिका और ब्रिटेन की ओर से इस तरह की जानकारियों का आना नया नहीं हैं। इन दोनों ही देशों की ओर से अक्‍सर इस तरह की जानकारियां सामने आती रहती हैं।

अमेरिका की जानकारी, भारत की नजरअंदाजगी

अमेरिका का कहना है कि उसने 26/11 से जुड़ी इंटेलीजेंस को भारत के साथ साझा किया था तो भारत हर बार इस सच्‍चाई से इंकार कर देता है। भारत का कहना है कि मुंबई हमलों से जुड़ी जो जानकारियां उसे दी गईं, वह ऐसी नहीं थीं कि उन्‍हें इकट्ठा करके उस पर कोई कार्रवाई की जा सकती।

कई अ‍‍धिकारियों की ओर से उस समय की सरकार पर यह कहकर दोष डाल दिया गया कि हमलों को लेकर सरकार का रवैया काफी उदासीन था। न तो हमलों से पहले और न ही हमलों के बाद सरकार की ओर से कोई गंभीर रुख कभी अख्तियार किया गया था।

जानकारी के पीछे सीआईए का मकसद

अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए की ओर से भारत को जो भी इनपुट हासिल होते हैं, भारत काफी सावधानी से उसे परखता है। सरोज कुमार राठ जिन्‍होंने मुंबई हमलों पर एक किताब, 'फ्रैजाइल फ्रंटियर्स: द सीक्रेट हिस्‍ट्री ऑफ मुंबई टेरर अटैक्‍स,' लिखी थी, उनका कहना है कि भारत को हमेशा ही सीआईए की ओर से मिलने वाली जानकारियों के बारे में सतर्क रहना होगा और इन्‍हें एक से ज्‍यादा बार परखना होगा।

हो सकता है कि सीआईए की ओर से भारत को जो भी जानकारी दी जा रही हो, वह अफगानिस्‍तान में नाटो सेना के जाने के बाद भारत की मदद हासिल करने के मकसद से, उसे आकर्षित करने के लिए हो।

राठ कहते हैं कि वह ऐसा मानते हैं क्‍योंकि आईबी को जब कभी भी इस तरह की जानकारियां हासिल हुई हैं, वह अक्‍सर गलत ही साबित हुई हैं। अमेरिका अफगानिस्‍तान में बड़े स्‍तर पर भारत का साथ चाहता है और इसलिए वह इस तरह की जानका‍रियां समय-समय पर सामने लाता रहता है।

अपने पर आती है तो बोलता है अमेरिका

आईबी के कई अधिकारियों की मानें तो सीआईए की ओर से तभी कोई निश्चित जानकारी भारत को हासिल होती है, जब अमेरिका पर किसी तरह को कोई खतरा होता है। कुछ ऐसा ही हाल ब्रिटेन का भी है।

ब्रिटेन की इंटेलीजेंस एजेंसी एमआई6 और सीआईए तभी साथ में मिलकर काम करती हैं जब उनके देश पर कोई बड़ा खतरा होता है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर इस बात की संभावना न के बराबर है कि वह कोई सही जानकारी भारत को मुहैया कराएंगे।

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बात के कई सुबूत हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि एमआई6 की ओर से मुंबई हमलों के समय पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति आसिफ अली जरदारी को सलाह दी गई थी कि वह जितनी जल्‍द हो सके इन हमलों की जिम्‍मेदारी लें नहीं तो भारत की ओर से और जानकारियां मांगी जाने लगेंगी।

तो झूठी है न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की रिपोर्ट

न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की रिपोर्ट में पूर्व एनएसए शिव शंकर मेनन की ओर से जो बयान दिश गया है, उसके मुताबिक भारत को इस तरह के हमले की कोई भी जानकारी नहीं मिली थी। जबकि हकीकत यही है कि भारत को इन हमलों से जुड़ी कोई भी जानकारी हमलों से पहले दी ही नहीं गई थी।

लेकिन वहीं यह भी सच है कि कई हिस्‍सों में बंटी जानकारी देश को हमलों से बचा नहीं सकी और इसके बाद जांच में हुई ढिलाई ने भी काफी नुकसान किया। राठ कहते हैं कि डेविड कोलमेन हेडली के बारे में भारत को कुछ भी नहीं मालूम था।

हमलों के करीब एक साल बाद अमेरिका ने हेडली को गिरफ्तार किया था। राठ की मानें तो यह बात भी अपने आप में काफी रोचक है कि अमेरिका हेडली को शांत रहने देना चाहता था क्‍योंकि हो सकता है कि वह इन हमलों के बारे में कुछ भी जानकारी दे सकता था।

भारत को लेनी होगी जिम्‍मेदारी

वहीं भारत के पास भी उसकी अपनी इंटेलीजेंस जानकारियां थीं और रामपुर के सीआरपीएफ कैंप पर हमले के आरोपी सबाहुद्दीन अहमद के कुबूलनामे के बाद भारत को इस बारे में भी जानकारियां मिली कि आने वाले समय में भारत पर समंदर के रास्‍ते हमले और बढ़ेंगे।

भारत ने न तो इस जानकारी पर अपनी एजेंसियों से कुछ पूछा और न ही जानकारियों को आपस में इकट्ठा कर एक बड़ी तस्‍वीर तैयार करने की कोई कोशिश ही की। मुंबई हमलों की जांच को पूरी तरह से ढीले रवैये के साथ आगे बढ़ाया गया। इससे दुनिया को जो संदेश गया वह भी देश के लिए नकारात्‍मक संदेश देने वाला था।

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