भाजपा के पास नाम का पड़ा अकाल, बस एक नाम का बचा सहारा
आखिर क्यों भाजपा के कार्यकाल में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह दीन दयाल उपाध्याय युग है, तमाम योजनाओं जगहों के नाम दीन दयाल के नाम पर
नई दिल्ली। केंद्र में भाजपा सरकार आने के एक जो बड़ा बदलाव देखने को मिला है वह है तमाम योजनाओं के नामों में बदलाव। लेकिन इन नामों में जो सबसे बड़ी समानता है वह यह कि ज्यादातर योजनाओं के नाम दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर हैं। भाजपा के लिए दीन दयाल एक बड़े नाम के तौर पर सामने आए हैं जिनके नाम पर कई योजनाओं का नामकरण किया गया है।
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कई जगहों के नामों को बदला गया
केंद्र की सत्ता संभालने के बाद से भाजपा ने कई योजनाओं के नामों में बदलाव किया है, कई सड़कों के नाम को बदला है, कई संस्थानों, एयरपोर्ट यहां तक कि रेलवे स्टेशन का भी नाम बदल दिया है। अब भारतीय जनता पार्टी सरकार ने यूपी में मुगलसराय रेलवे स्टेशन के नाम को बदलने का फैसला लिया है। अब इस स्टेशन का नाम आरएसएस विचारक पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर किया जाएगा।

रहस्यमयी तरीके से हुई थी मौत
आपको बता दें कि पंडित दीनदयाल का देहात बेहतर संदेहास्पद तरीके से हुआथा, जिस वक्त वह ट्रेन में सफर कर रहे थे तो मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर 11 फरवरी 1968 को उनका देहांत हो गया था। गौरतलब है कि मुगलसराय रेलवे स्टेशन पूर्वी रेलवे के सबसे व्यस्त रेलवे स्टेशन में से एक है। इससे पहले योगी आदित्यनाथ ने आगरा एयरपोर्ट के नाम को भी बदलकर दीनदलाय उपाध्याय एयरपोर्ट करने पर विचार कर रही थी।

गुजरात के पोर्ट का नाम दीन दयाल के नाम पर
पिछले वर्ष दिल्ली के पर्यावरण भवन के नाम को बदलकर इसे पंडित दीनदयाल अंत्योदय भवन कर दिया गया है, पीएम मोदी ने खुद खुद गुजरात के कंडला पोर्ट का नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय पोर्ट किया था। बहरहाल जिस तरह से इन तमाम जगहों का नाम दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर किया जा रहा है, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आप दीनदयाल के युग में जी रहे हैं।

कांग्रेस की तर्ज पर भाजपा
ऐसे में आप यह सवाल पूछ सकते हैं कि इन तमाम जगहों का नाम दीनदयाल के नाम पर ही क्यों रखा जा रहा है, क्या भाजपा के पास और नामों की कमी है, लेकिन भाजपा भी कांग्रेस की ही तर्ज पर एक-दो नामों पर सिमटती नजर आ रही है, जिस तरह से कांग्रेस ने तमाम योजनाओं और स्थान का नाम इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर रखा है। बहरहाल हम भाजपा को दक्षिण भारत के कुछ ऐसे नामों का विकल्प दे सकते हैं जिनपर वह विचार कर सकती है, इनमे से मुख्य रूप से राजेंद्र चोलन, रानी रुद्रमा देवी , वीरपांडिया कट्टाबोमन, कोविलान , कनांगी, इलैंगो अदिगल , अव्वैयर , कृष्णदेव राय, हक्का-बक्का, पजाशी राजा, वेलूथंबी दलावा, बसवन्ना, अयांकली, कंदकूरी।

शहरों के नाम को बदलने का दौर शुरु किया था भाजपा ने
भारत में शहरों के नामों को बदलने का प्रचलन 20 वर्ष पहले 1996 में शुरु हुआ था, जब केंद्र में भाजपा की सरकार सत्ता में आई थी। उस वक्त भाजपा-शिवसेना ने बांबे के नाम को बदलकर मुंबई कर दिया था, जिसके बाद मद्रास के नाम को बदलकर चेन्नई कर दिया गया, लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि जो गैर तमिल थे उन्होंने 1990 से पहले इस नाम को पहले कभी नहीं सुना था। इसके बाद कम्युनिस्ट सरकार ने कलकत्ता के नाम को बदलकर कोलकाता रख दिया। इसके अलावा भाजपा अहमदाबाद के नाम को भी बदलना चाहती थी, जिसे 600 साल पहले गुजरात सल्तनत के अहमद ने बसाया था। भाजपा चाहती थी कि अहमदाबाद के नाम को बदलकर कर्णवती किया जाए जोकि सोलंकी वंश के राजा थे जिनका नाम कर्ण था।












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