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जानिए, बालाकोट एयरस्ट्राइक 2019 के चुनाव में बीजेपी को जीत की गारंटी क्यों नहीं देता?

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नई दिल्ली- पिछले साल दिसंबर में तीन हिंदी भाषी राज्यों में बीजेपी की हार के बाद से विपक्ष बहुत उत्साहित था। लग रहा था कि भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के लिए 2019 बहुत भारी पड़ने वाला है। इसका एक मजबूत कारण भी था। 5 साल पहले यानी 2013 में उन्हीं तीनों राज्यों में पार्टी के शानदार प्रदर्शन ने 2014 में मोदी के लिए लहर पैदा करने में काफी मदद भी की थी। इसलिए, 14 फरवरी तक बीजेपी रक्षात्मक नजर आ रही थी। जबकि, कांग्रेस समेत बाकी विपक्ष काफी आक्रमक था। लेकिन, 14 फरवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ काफिले पर हुए आतंकी हमले के जवाब में पाकिस्तान में घुसकर की गई एयरस्ट्राइक ने विपक्ष की तो एक तरह से बोलती बंद कर दी। एक-दो दिनों तक विपक्ष को कुछ सूझ ही नहीं पाया। फिर सबूत मांगने के बहाने किसी तरह संभलने का मौका मिला। लेकिन, बीजेपी को फिर से राष्ट्रवाद के खून का स्वाद चखने का मौका मिल गया। परन्तु, सवाल ये है कि क्या बालाकोट में दिखाया गया भारतीय वायुसेना का पराक्रम मौजूदा लोकसभा चुनावों में बीजेपी को जीत की गारंटी देता है?

बीजेपी का गेमप्लान

बीजेपी का गेमप्लान

1980 के दशक से 2000 के शुरुआती दशक में हिंदुत्व की फसल काटने के बाद बीजेपी और नरेंद्र मोदी का फोकस काफी हद तक राष्ट्रवाद की तरफ शिफ्ट हो चुका है। वह राष्ट्रवाद, जिसमें हिंदुत्व भी है, देशप्रेम भी है,पाकिस्तान और आतंकवाद भी है और भारत में टुकड़े-टुकड़े गैंग एवं उनसे सहानुभूति रखने वालों के खिलाफ वैचारिक लड़ाई भी। मोदी सरकार ने 5 वर्षों में केंद्र में चाहे जितनी भी लोकप्रिय योजनाएं चलाई हों, लेकिन हकीकत ये है कि उन योजनाओं के जरिए एमपी,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार बनाने लायक वोट नहीं जुट पाए। लिहाजा, 26 फरवरी को बालाकोट में एयरस्ट्राइक हुआ,तो बीजेपी को फिर से राष्ट्रवाद को सुलगाने का अवसर मिल गया। भारत की इस कार्रवाई के बाद देश में जो स्वाभाविक माहौल तैयार हुआ, उसकी फसल काटकर रखने के लिए पार्टी को पूरा मैदान साफ नजर आने लगा। जैसे-जैसे बालाकोट में हमारे फाइटर पाइयलटों के शौर्य और पराक्रम की खबरें आने लगीं और जैश के आतंकी कैंप पर बमों की वर्षा की कहानियां सुनाई जाने लगीं, बीजेपी के अंदर वोटों की बारिश की उम्मीदें पैदा होनी शुरू हो गईं। लिहाजा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हार के सदमे से निकलकर वह एकबार फिर आक्रमक हो गई। उसे लगने लगा कि राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अगर वह ध्रुवीकरण करा पाने में कामयाब रही, तो 2019 भी आसान हो सकता है।

विपक्ष की गोलबंदी

विपक्ष की गोलबंदी

एयरस्ट्राइक की खबर सुनकर पहले दिन तो विपक्ष को सांप ही सूंघ गया था। कोई सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाया। एक बार तो लगा कि तीन राज्यों ने जो आस जगाई थी, उसपर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई ने पानी ही फेर दिया है। धीरे-धीरे विपक्ष के धुरंधर संभलने लग गए। राष्ट्रवाद के प्रति हो रहे ध्रुवीकरण की काट खोजने में जुट गए। फिर सबूत मांगकर सरकार को घेरने की कोशिशें भी शुरू हो गईं। किसी तरह सरकार की लोकप्रियता बढ़ने न पाए, उसके लिए सारे अस्त्रों का प्रयोग शुरू हो गया। कई दफे लगा कि कहीं दांव उल्टा न पड़ जाए, तो फिर गिरते-पड़ते संभलने की कोशिश भी करते रहे। बीजेपी के राष्ट्रवाद के जवाब में फिर से रोजगार और किसान जैसे मुद्दे सामने ला दिए गए। विपक्ष को तीन राज्यों में मिले इन मुद्दों का स्वाद फिर से लालच देने लगा। यानी चुनाव तारीखों की घोषणा होने तक लड़ाई एक-तरफा नहीं रह गई। आज बीजेपी राष्ट्रवाद पर ध्रुवीकरण चाहती है, तो विपक्ष उसकी काट में। लिहाजा भले ही एक महागठबंधन नहीं बन पाया हो, लेकिन अभी तक बीजेपी को चुनौती देने के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटों पर तालमेल की कोशिशें जारी हैं। मतलब, वोटों की गोलबंदी में बीजेपी जुटी है, तो विपक्ष भी भाजपा विरोधी वोटों को गोलबंद करने में लगा है।

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वोट शेयर में बढ़त सीट बढ़ने की गारंटी नहीं

वोट शेयर में बढ़त सीट बढ़ने की गारंटी नहीं

कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये है कि पाकिस्तान में घुसकर एयरस्ट्राइक से हुए ध्रुवीकरण के कारण अगर बीजेपी की ओर लोगों का झुकाव बढ़ भी जाय, तो भी यह सीटों में तब्दील होगा यह कहना मुश्किल है। इस हकीकत को समझने के लिए कुछ उदाहरणों को देखना होगा। बीजेपी की ओर हुए ध्रुवीकरण के लिए दो चुनाव परिणामों का विश्लेषण करना जरूरी है। पहला 1993 में अयोध्या के विवादित ढांचा टूटने के बाद उत्तर प्रदेश में और दूसरा 2002 में दंगों के बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में। 1991 के यूपी चुनाव में भी बीजेपी ध्रुवीकरण करा पाने में सफल रही थी और 1993 के चुनाव में भी। लेकिन, 1991 में उसे सिर्फ 31.5% वोट मिले और वह 52.4% सीटें जीतने में कामयाब हो गई। जबकि, 1993 में उसका वोट शेयर बढ़कर 33.3% पहुंच गया, लेकिन सीटें घटकर 41.9% ही रह गईं। इसका कारण ये रहा कि 1993 में बीजेपी के खिलाफ समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने गठबंधन कर लिया था। इसलिए, बीजेपी का वोट शेयर तो बढ़ा, लेकिन उसे सीटों का नुकसान उठाना पड़ा।

हालांकि, गुजरात में ध्रुवीकरण के चलते बीजेपी को फायदा मिला था। जैसे-1998 के चुनाव में वो वहां 44.8% वोट लेकर 64.3% सीटें लेने में सफल हुई थी। जबकि, 2002 में 49.9% वोट शेयर प्राप्त करके 69.8% सीटें जीतने में सफल हुई। यानी गुजरात में उसका वोट शेयर भी बढ़ा और उस अनुपात में सीटें भी बढ़ गईं। क्योंकि, तब गुजरात में एकतरफा ध्रुवीकरण बीजेपी के पक्ष में ही नजर आया, विपक्ष में उसका असर नहीं दिखा। इसलिए, सीधा सा निष्कर्ष तो यही निकलता है कि एयरस्ट्राइक के कारण अगर बीजेपी को ज्यादा वोट मिल भी जाएं, लेकिन वो सीटों में भी तब्दील होगी, ये कहना फिलहाल नामुमकिन लग रहा है।

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English summary
Why Balakot may not be a game changer for bjp
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