अयोध्यावासी राम मंदिर को लेकर उदासीन क्यों

अयोध्या विवाद
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"सर, अयोध्या में कुछ है क्या? दीपोत्सव कार्यक्रम तो दिवाली पर है, अभी काफ़ी दूर है?" अयोध्या में होटल के रिसेप्शन पर बैठे युवक ने मुस्कराते हुए जिज्ञासावश ये सवाल मुझसे किया.

दरअसल, यहां जब भी आना होता है तो इसी होटल में रहना होता है. रिसेप्शन पर बैठे इस युवक के सवाल ने ऐसे तमाम सवालों का शायद जवाब दे दिया था जो यहां के लोगों से जानने के लिए आया था.

लखनऊ-गोरखपुर हाईवे से उतरकर नयाघाट होते हुए अयोध्या के भीतर दाख़िल होने पर इस मुद्दे पर तमाम लोगों से बात हुई.

अयोध्या
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पिछले दिनों अयोध्या में हिन्दू नेता प्रवीण तोगड़िया के कार्यक्रम की चर्चा लोगों ने ज़रूर की, लेकिन सोमवार (29 अक्टूबर) को अयोध्या को लेकर क्या होने वाला है, इसकी जानकारी कम लोगों को ही थी. जिन्हें थी भी, उनका कहना था कि सुबह टीवी और अख़बार देखकर पता चला कि 'सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई हो रही है.'

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ़ की खंडपीठ सोमवार से अयोध्या के मंदिर-मस्जिद विवाद की सुनवाई करेगी.

अयोध्या में रविवार से ही मीडिया वालों के आने का तांता लग चुका है और दुनिया भर की निगाहें इस अहम विवाद के फ़ैसले पर लगी हैं. लेकिन अयोध्या के लोग इस पूरी प्रक्रिया से बेफ़िक्र हैं.

इस विवाद में बाबरी मस्जिद की ओर से पक्षकार इक़बाल अंसारी कहते हैं कि यहां के लोगों के लिए ऐसी हलचलें सिर्फ़ तकलीफ़ और नुक़सान देने वाली होती हैं, फ़ायदा तो बाहर के लोग उठाते हैं.

इक़बाल अंसारी
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अंसारी बताते हैं, "जब भी यहां से संबंधित कुछ घटना होती है या फिर कोई आता है, अयोध्या के लोगों को बेवज़ह परेशान होना पड़ता है. जाम लगेगा, ट्रैफ़िक रुक जाएगा, दुकानें बंद रहेंगी और लोगों का रोज़ी-रोज़गार प्रभावित होगा."

उनका कहना है कि अयोध्या के लोगों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं रहती और न ही इस विवाद की वज़ह से यहां के हिन्दुओं और मुसलमानों में कोई विवाद है.

उनके मुताबिक़ लगातार बाहर से आने वाले लोगों के उकसावे वाली कार्रवाई की वज़ह से दोनों समुदायों के कुछे-एक लोग भले ही आपस में लड़ने-भिड़ने की कोशिश करें, लेकिन आम अयोध्यावासी अमन-चैन से रहते हैं.

1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद उस ज़मीन का तीन हिस्सों में बँटवारा साल 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कर दिया था, लेकिन तीनों पक्षों यानी निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ़ बोर्ड और राम लला विराजमान ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

अदालत में होने के बावजूद ये मुद्दा राजनीतिक तौर पर अक़्सर गर्म होता रहता है और इसे गर्म करने वाले लोग अयोध्या के नहीं बल्कि अयोध्या के बाहर से होते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी कहते हैं कि राजनीतिक तौर पर कुछ लोग इसे हल करने के मूड में बिल्कुल नहीं दिखते क्योंकि उन्हें डर है कि यदि ये मसला हल हो गया तो फिर उनके पास मुद्दा ही क्या रह जाएगा?

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वहीं विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा का कहना है कि अयोध्या एक धार्मिक नगरी होने के नाते यहां हलचल होना स्वाभाविक है, लेकिन इस सवाल का जवाब वो टाल गए कि ये हलचल चुनाव के वक़्त ही क्यों बढ़ जाती है?

शरद शर्मा एक बार फिर दोहराते हैं कि मंदिर का निर्माण कार्य तेज़ गति से चल रहा है, सिर्फ़ ढांचा खड़ा करना बाक़ी है और उसके लिए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले या फिर सरकार के किसी 'निर्णायक क़दम' का इंतज़ार है.

लेकिन इन सबके बीच, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशे जाने वाली कार्यशाला के ठीक बाहर एक पान की गुमटी चलाने वाली एक बुज़ुर्ग महिला ने शायद वो सच्चाई बयां की जिसे यहां महसूस हर कोई करता है, लेकिन बताना कोई नहीं चाहता.

इस महिला का कहना था, "मंदिर बनाना कोई चाहता ही नहीं है. बाहरी लोग राजनीति करते हैं और यहां के साधु-संतों को ये डर है कि यदि भव्य राम मंदिर बन गया तो सब लोग उसी मंदिर को देखने आएंगे, इनके मंदिरों का महत्व कम हो जाएगा."

राम मंदिर अयोध्या
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राम मंदिर अयोध्या

अपनी बात के समर्थन में ये महिला आगरा का उदाहरण देती हैं और कहती हैं कि वहां लोग ताजमहल देखने जाते हैं, बाकी स्थलों को नहीं. उनके मुताबिक़, यदि अयोध्या में राम मंदिर बन गया तो लोगों के आकर्षण का केंद्र वही होगा, दूसरे मंदिर नहीं.

हालांकि ऐसा नहीं है कि अयोध्या के सभी लोग सुप्रीम कोर्ट में आज से होने वाली सुनवाई और उसके महत्व से अनभिज्ञ हों.

रविवार यानी 28 अक्टूबर को कुछे-एक जगहों पर मंदिर के समर्थन में फ़ैसले की उम्मीद कर रहे लोग यज्ञ और हवन करते हुए मिले और इस कार्यक्रम में मुस्लिम समुदाय से जुड़े कुछ लोग भी शामिल थे.

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का विवाद यूं तो आज़ादी के पहले से चला आ रहा है, लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर 7 जनवरी, 1993 से इसके आस-पास की 67 एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया, जिसमें तीन गांव कोट रामचंद्र, अवध ख़ास और जलवानपुर की ज़मीन थी.

इस अधिग्रहण के ख़िलाफ़ मुस्लिम पक्ष कोर्ट गया, लेकिन अदालत ने इसको ख़ारिज कर दिया.

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30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई-कोर्ट ने इस विवाद में बड़ा फ़ैसला दिया और विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन को तीन हिस्सों में बांट दिया. फ़ैसले में कहा गया कि विवादित स्थल के तीन गुंबदों में बीच का हिस्सा रामलला विराजमान का होगा, निर्मोही अखाड़ा को दूसरा हिस्सा दिया गया जिसमें सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल हैं जबकि एक तिहाई हिस्सा सुन्नी सेंट्रल वक्फ़ बोर्ड को दिया गया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को तीनों पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बहाल कर दी. इसी मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की खंडपीठ 29 अक्टूबर से करने जा रही है.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई सोमवार (29 अकटूबर) से शुरू हो रही है, लेकिन अयोध्या में हलचल पिछले एक महीने से लगातार बढ़ती जा रही है.

आने वाले दिनों में राज्य सरकार का विराट दीपोत्सव कार्यक्रम और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का अयोध्या आने का कार्यक्रम इसे और तेज़ी देंगे, लेकिन इस मसले का हल कुछ निकल पाएगा, इसे लेकर यहां के लोग बहुत आश्वस्त नहीं दिखते.

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