Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

राष्ट्रपति बनने से क्यों पीछे हटे अटल बिहारी वाजपेयी, कैसे एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर बनी सहमति

Atal Bihari Vajpayee President Offer: भारत की राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ एक सफल प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सहमति की राजनीति के प्रतीक माने जाते हैं। वर्ष 2002 के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा एक कम चर्चित लेकिन अहम प्रसंग उनकी इसी सोच को उजागर करता है। इस घटना का जिक्र उनके पूर्व मीडिया सलाहकार अशोक टंडन ने किताब 'अटल स्मरण' में किया है।

उस समय बीजेपी ने वाजपेयी को राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया। वाजपेयी का मानना था कि बहुमत के आधार पर प्रधानमंत्री का राष्ट्रपति बनना भारतीय लोकतंत्र के लिए गलत परंपरा स्थापित करेगा। आइए विस्तार से जानते हैं आखि वाजपेयी ने क्यों ठुकराया राष्ट्रपति बनने का प्रस्ताव...

why-atal-bihari-vajpayee-rejected-president-post

वाजपेयी ने क्यों ठुकराया राष्ट्रपति पद?

वाजपेयी की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यही थी कि वे सहमति और संवाद को सर्वोपरि मानते थे। राष्ट्रपति पद के लिए भी उन्होंने विपक्ष को विश्वास में लेने का फैसला किया। अशोक टंडन के मुताबिक, वाजपेयी ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को अपने आवास पर आमंत्रित किया, ताकि राष्ट्रपति पद के लिए किसी ऐसे नाम पर सहमति बन सके, जिसे सभी स्वीकार करें।

इस अहम बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी और डॉ. मनमोहन सिंह शामिल हुए। बैठक के दौरान वाजपेयी ने पहली बार औपचारिक रूप से यह खुलासा किया कि एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए वैज्ञानिक और मिसाइल मैन के नाम से मशहूर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को अपना उम्मीदवार बनाने का फैसला किया है।

जब कलाम के नाम पर छाया सन्नाटा...

अशोक टंडन लिखते हैं कि वाजपेयी के इस ऐलान के बाद कुछ क्षणों के लिए बैठक में सन्नाटा छा गया। कांग्रेस नेतृत्व को इस नाम की उम्मीद नहीं थी। थोड़ी देर बाद सोनिया गांधी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि वे इस प्रस्ताव से हैरान हैं, लेकिन डॉ. कलाम जैसे व्यक्तित्व के सामने उनके पास समर्थन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस इस पर औपचारिक चर्चा कर अंतिम फैसला लेगी। इसके बाद एनडीए और विपक्ष के समर्थन से डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम वर्ष 2002 में भारत के 11वें राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने 2007 तक राष्ट्रपति पद संभाला और जनता के बीच 'जनता के राष्ट्रपति' के रूप में लोकप्रिय हुए।

अटल-आडवाणी की मजबूत जोड़ी

किताब में अशोक टंडन ने अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की साझेदारी पर भी रोशनी डाली है। उन्होंने लिखा है कि नीति और रणनीति को लेकर दोनों के बीच मतभेद जरूर थे, लेकिन उनके रिश्तों में कभी सार्वजनिक रूप से खटास नहीं आई। आडवाणी हमेशा वाजपेयी को "अपने नेता और प्रेरणास्रोत" कहते थे, जबकि वाजपेयी आडवाणी को अपना "अडिग और भरोसेमंद साथी" मानते थे। टंडन के अनुसार, इस जोड़ी ने न सिर्फ बीजेपी को खड़ा किया, बल्कि देश की राजनीति को भी एक नई दिशा दी।

संकट में भी दिखी मानवीयता

अशोक टंडन ने 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए आतंकी हमले से जुड़ा एक मानवीय प्रसंग भी साझा किया है। हमले के वक्त वाजपेयी अपने आवास पर थे और टीवी पर हालात देख रहे थे। तभी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का फोन आया। उन्होंने चिंता जताते हुए पूछा, "क्या आप सुरक्षित हैं?" इस पर वाजपेयी ने जवाब दिया, "मैं सुरक्षित हूं, लेकिन मुझे चिंता थी कि आप कहीं संसद भवन में तो नहीं थीं। अपना ख्याल रखिए।"

अटल बिहारी वाजपेयी का ये व्यक्तित्व राजनीतिक और मानवीय पक्ष को उजागर करती है। राष्ट्रपति पद ठुकराने से लेकर विपक्ष के साथ सहमति बनाने और संकट के समय मानवीय संवेदनाएं दिखाने तक-ये सभी प्रसंग वाजपेयी को भारतीय राजनीति के एक अलग ही कद का नेता साबित करते हैं।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+