उद्धव ठाकरे या एकनाथ शिंदे की; किसकी होगी शिव सेना

एकनाथ शिंदे
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एकनाथ शिंदे

शिव सेना के बाग़ी नेता एकनाथ शिंदे के अलग राह चुनने के बाद महाराष्ट्र की सियासत गरमा गई है. शिव सेना के कुल 55 विधायकों में से 39 विधायक एकनाथ शिंदे के साथ हैं.

दो-तिहाई विधायकों का समर्थन होने की वजह से एकनाथ शिंदे महाविकास अघाड़ी से बाहर निकलने के लिए अलग दल बनाने का प्रयास कर रहे हैं. ऐसा करना पूरी तरह क़ानूनी होगा, ऐसा दावा शिंदे की तरफ़ से किया जा रहा है.

दूसरी तरफ़ शिव सेना ने बाग़ी विधायकों को अपात्र घोषित करने के लिए क़दम आगे बढ़ा दिए हैं. दोनों ही गुट अपने-अपने दावे कर रहे हैं.

ऐसी स्थिति में आगे क्या हो सकता है बीबीसी मराठी ने यही समझने की कोशिश की.

शिव सेना की क्या भूमिका है?

एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में अलग हो जाने वाले बाग़ी विधायकों पर क़ानूनी कार्रवाई करने का इशारा शिव सेना नेता अरविंद सावंत ने एक पत्रकार वार्ता में रविवार को दिया.

प्रेस वार्ता में उनके साथ सुप्रीम कोर्ट के वकील देवदत्त कामत भी उपस्थित थे. मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति पर शिव सेना की भूमिका क्या रहेगी इस बारे में उन्होंने चर्चा की.

शिव सेना के वकील देवदत्त कामत ने कहा, "मैं क़ानूनी तौर पर बात करना चाहूंगा, राजनीतिक बात नहीं. शिव सेना ने विधायकों को बैठक में बुलाया लेकिन वो नहीं आए. महाराष्ट्र से बाहर चले गए. भाजपा नेता से मिले. ये अपनी पार्टी का विरोध है. बाग़ी विधायकों ने सरकार गिराने की कोशिश की है.''

'दो-तिहाई का नियम केवल पार्टी के विलय पर लागू होता है. इसलिए उनको विलय ही करना पड़ेगा. अब तक वो किसी भी पार्टी में विलय हो नहीं पाए हैं, इसलिए उनको अपात्र ठहराया जा सकता है. अनाधिकृत ईमेल आईडी से विधानसभा के विरोध में ईमेल के ज़रिए अविश्वास प्रस्ताव भेजा गया."

"उपाध्यक्ष के कार्यक्षेत्र में अपात्र ठहराना नहीं आता ऐसा कहा जा रहा है लेकिन उनके पास सभी अधिकार हैं. कल तक बाग़ी विधायकों को नोटिस का जवाब देना पड़ेगा. उन्होंने नियम विरुद्ध बर्ताव किया है, इसलिए वो अपात्र हैं. इसका हमें पक्का विश्वास है."

कामत ने कहा, "विधायकों की अपात्रता को लेकर राज्यपाल कुछ भी नहीं कर सकते हैं, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कहा है."

इससे पहले विधान परिषद उपसभापति रहे निलम गोर्हे ने इस बारे में मत व्यक्त किया था.

उन्होंने कहा, "शिंदे गुट दूसरे पक्ष में विलय नहीं होता है तो अपात्रता से छुटकारा नहीं मिलेगी. विलय होते समय उन्हें अधिकृत पक्ष में ही प्रवेश करना पड़ेगा. इसलिए उन्हें अगर विलय होना होगा तो प्रहार पार्टी या बीजेपी में से चुनना पड़ेगा."

एकनाथ शिंदे गुट का क्या कहना है?

शिवसेना के बाग़ी विधायक और पूर्व मंत्री दीपक केसरकर
Getty Images
शिवसेना के बाग़ी विधायक और पूर्व मंत्री दीपक केसरकर

एकनाथ शिंदे गुट की तरफ़ से विधायक दीपक केसरकर को बाग़ी विधायकों की भूमिका स्पष्ट करने की ज़िम्मेदारी दी गई है. केसरकर ने शनिवार को ज़ूम ऐप पर एक प्रेस वार्ता की, इसके अलावा उन्होंने बीबीसी मराठी से भी ख़ास बातचीत की.

क़ानूनी पेच पर बोलते हुए उन्होंने कहा, "हम अब भी शिव सेना में है, भाजपा या किसी दूसरी पार्टी में जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता. शिव सेना में रहकर ही हमें अलग गुट स्थापित करना है, ये हमारा संवैधानिक अधिकार है."

"हमारे बारे में ग़लतफ़हमी फैलाई जा रही है. हमारी बात कहने के लिए ही मैं आपके सामने आया हूँ."

एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अपात्र ठहराने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है. लेकिन ये प्रस्ताव क़ानूनी नहीं है. ऐसा दावा केसरकर ने किया.

केसरकर ने कहा, "विधायकों को भेजे गए नोटिस का जवाब देने के लिए सोमवार शाम साढ़े पांच बजे तक का समय है. लेकिन क़ानूनी तौर पर हमें सात दिनों का समय मिलना चाहिए था. विधायकों को अपात्र घोषित किया गया तो हम अदालत में जाएंगे."

एकनाथ शिंदें क्या कर सकते हैं?

इसी बीच, एकनाथ शिंदे ने विधायकों को अपात्र घोषित की मांग करने वाले प्रस्ताव के विरोध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.

इसके अलावा विधानसभा उपाध्यक्ष के ख़िलाफ़ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को नामंज़ूर किए जाने के विरोध में भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल की गई है. एकनाथ शिंदे ने ऐसी दो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल की हैं.

इस बारे में अधिवक्ता उदय वारूंजीकर ने एबीपी मांझा से कहा, "अधिवक्ता देवदत्त कामत ने रविनायक और शरद यादव केस का उदाहरण दिया है लेकिन ये मामला एकनाथ शिंदे के मामले पर लागू नहीं होता है. रविनायक के आदेश में उन्होंने पार्टी छोड़ने की बात मानी थी. लेकिन एकनाथ शिंदे ने पार्टी छोड़ने की बात नहीं मानी है. एकनाथ शिंदे का दावा है कि वो अभी भी शिव सेना में हैं. इसलिए 2(1) के अंतरगत उनकी अपात्रता शिद्ध नहीं हो सकती है."

"शरद यादव के मामले के बारे में कहा जाए तो उन्होंने दूसरी पार्टी के मंच पर उपस्थिति दर्शाई थी, इसलिए उन्होंने पार्टी छोड़ी, ऐसा निष्कर्ष आदेश में निकाला गया था. लेकिन इस आदेश को अभी अंतिम रूप नहीं मिल पाया है. दिल्ली उच्च न्यायालय में ये मामला अभी भी चल रहा है. ऐसा घटनाक्रम एकनाथ शिंदे के मामले में नहीं हुआ है."

गुट को मान्यता मिलेगी या नहीं?

नीलम गोर्हे ने कहा था कि शिव सेना के बाग़ी विधायक या तो भाजपा में जाएंगे या प्रहार पार्टी में. विशेषज्ञों की मानें तो ये तकनीकी रूप से सही है.

वरिष्ठ संविधान विशेषज्ञ उल्हास बापट की मानें तो यदि एकनाथ शिंदे और बाक़ी बाग़ी विधायक अदालत जाने से बचना चाहते हैं तो उन्हें किसी और पार्टी में विलय करना ही होगा. दो-तिहाई विधायकों के समर्थन की वजह से इस क़दम को क़ानूनी माना जाएगा लेकिन इसके बाद एकनाथ शिंदे शिव सेना के नेता नहीं कहे जाएंगे, ये धयान रखना होगा. ये निर्णय सभी विधायकों को मान्य है या नहीं ये शिंदे को देखना होगा.

लेकिन शिव सेना छोड़नी नहीं है और अलग गुट के तौर पर मान्यता भी चाहिए है तो उन्हें क़ानूनों का पालन करना पड़ेगा.

"बाग़ी विधायकों की संख्या दो-तिहाई से अधिक है, इस पर क़ानून क्या कहता है, इसके बारे में बताते हुए अधिवक्ता वारूंजीकर ने कहा कि दसवीं अनुसूची में 2003 में हुए संशोधन के अनुसार बाग़ी विधायकों के पास विलय का एक ही पर्याय है, अन्यथा उन पर अपात्रता की कार्रवाई भी हो सकती है."

फ्लोर टेस्ट में दो-तिहाई मत ना मिलने पर क्या होगा?

उल्हास बापट कहते हैं, "विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान फ्लोर टेस्ट में दो तिहाई बहुमत साबित नहीं कर पाते हैं तो सभी विधायकों का निलंबन हो सकता है"

बहुमत सिद्ध ना करने पर सभी विधायक अपात्र घोषित किए जा सकते हैं. लेकिन ऐसा होने पर भाजपा को फ़ायदा मिल सकता है. पार्टी के तौर पर शिव सेना के विधायकों की संख्या कम हो जाएगी.

उल्हास बापट कहते हैं, "एकनाथ शिंदे को 39 विधायकों का समर्थन है, फ्लोर टेस्ट में बहुमत सिद्ध करने के लिए उन्हें 37 विधायकों की ज़रूरत है. मौजूदा स्थिति देखते हुए वो आसानी से बहुत सिद्ध कर सकते हैं. लेकिन किसी कारण वश अगर वो ये आँकड़ा नहीं छू पाते हैं तो 37 से कम जितने भी विधायक होंगे, उन सभी विधायकों का निलंबन हो जाएगा."

उदाहरण के तौर पर अगर एकनाथ शिंदे को प्लोर टेस्ट में 35 विधायकों का समर्थन मिला तो सभी का निलंबन हो जाएगा.

अगर ऐसा होता है तो विधानसभा की स्थिति और भी रोचक हो जाएगी. 35 विधायक अपात्र होने की वजह से महाराष्ट्र विधानसभा की कुल संख्या 253 होगी, इस स्थिति में बहुमत का आंकड़ा 127 रह जाएगा.

मौजूदा राजनीतिक स्थिति में राष्ट्रवादी कांग्रेस के 53 और कांग्रेस के 44 विधायक हैं. शिव सेना के पास बाक़ी बचे 20 विधायक रह जाएंगे. यानी महाविकास अघाड़ी का संख्या बल 117 तक ही पहुंचेगा.

दूसरी तरफ़ बीजेपी के पास 106 विधायक हैं, इसके अलावा भाजपा को कुछ निर्दलीय विधायकों का समर्थन प्राप्त है. ऐसी स्थिति अगर आई को तो निर्दलीय विधायकों की भूमिका अहम हो जाएगी.

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