जिनको कांग्रेस से भाजपा में लेकर आए थे शिवराज, वही चले गए कमलनाथ के साथ
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मैहर के विधायक नारायण त्रिपाठी को जानिए
मैहर से बीजेपी के बागी विधायक नारायण त्रिपाठी 2014 में तत्कालीन नेता विपक्ष अजय सिंह से मतभेदों के चलते कांग्रेस से निकल कर भाजपा में शामिल हो गए थे। आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हार के बाद अजय सिंह को कांग्रेस में साइडलाइन किया जा चुका है। जबकि, सतना के बीजेपी सांसद गणेश सिंह के साथ नारायण की नाराजगी जगजाहिर हो चुकी है। यानी उन्हें कांग्रेस में 'वापसी' में अभी कोई दिक्कत नहीं है। यही वजह है कि अब उन्हें शिवराज सिंह चौहान की ओर से मैहर को लेकर किए गए विकास के वादों में खोट नजर आने लगी है। उन्हें अब ये भी महसूस होने लगा है कि भाजपा में बाहरी लोगों का कोई कद्र नहीं होता, जबकि उनके लिए उनका 'सम्मान' और 'स्वाभिमान' सबसे ज्यादा मायने रखता है।

मैहर सीट के मिथक को भी जान लीजिए
नारायण सिंह का बीजेपी से मोहभंग होने के पीछे मैहर सीट को लेकर प्रचलित एक मिथक भी वजह हो सकती है। इस विधानसभा क्षेत्र के बारे में एक बात कही जाती है कि यहां से एक ही व्यक्ति एक ही पार्टी से दोबारा चुनाव नहीं जीतता। खुद त्रिपाठी इसके प्रमाण हैं, जो 2003 में समाजवादी पार्टी के टिकट से चुनाव जीते थे। 2005 में वे समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी बनाए गए। लेकिन, 2008 में बीजेपी के मोतीलाल तिवारी ने उन्हें हरा दिया। 2013 में उन्होंने कांग्रेस का टिकट ले लिया और चुनाव जीतकर भोपाल पहुंच गए। 8 अप्रैल, 2014 को वे कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आ गए और 2016 का उपचुनाव वे भाजपा के टिकट पर जीत गए।

शरद कोल का राजनीतिक इतिहास
शरद कोल 2018 के विधानसभा चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर ही शहडोल के ब्योहारी से चुनाव जीते थे। चुनाव से ठीक पहले तक वे कांग्रेस की राजनीति करते थे। 28 अक्टूबर, 2018 को उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह और वरिष्ठ बीजेपी नेता विनय सहस्त्रबुद्धे की मौजूदगी में पार्टी में शामिल किया गया था। बीजेपी में शामिल होने से पहले वे शहडोल के जिला पंचायत के उपाध्यक्ष और कांग्रेस के पूर्व जिला उपाध्यक्ष भी रह चुके थे।

टिकट नहीं मिलने पर छोड़ी थी कांग्रेस
2018 के विधानसभा चुनाव में वे कांग्रेस से ब्योहारी के लिए टिकट के दावेदार थे, लेकिन कांग्रेस ने उनपर भरोसा नहीं किया। इसलिए वे चुनाव से 10 दिन पहले भाजपा में शामिल हुए थे। ब्योहारी आदिवासी बहुल इलाका है और उनकी सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। शिवराज सिंह उनको पार्टी में शामिल कराकर इतने उत्साहित थे कि वे उनके नामांकन में भी शामिल हुए और उनके लिए चुनाव प्रचार भी किया। लेकिन, अब वे शिवराज को नहीं, कमलनाथ को अपना आइकन मानने लगे हैं। अब कोल कह रहे हैं कि जिसने 10 साल तक कांग्रेस के साथ काम किया है,उसके लिए बीजेपी में जगह ही नहीं है। यानी इन दोनों विधायकों की बगावत भारतीय जनता पार्टी के लिए जितना बड़ा झटका है, उससे कहीं ज्यादा पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के लिए है।












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