कहानी पूरी फिल्मी है: जूनियर इंजीनियर से कैसे बना हत्या का आरोपी संत रामपाल
हिसार। संत रामपाल का सतलोक आश्रम किसी रहस्यलोक से कम नहीं है। चारों ओर ब्लैक कमांडो का घेरा है तो महिलाओं और बच्चों का डेरा। वारंट पर वारंट आ रहे हैं, लेकिन बाबा रहस्यलोक से निकलने को तैयार नहीं है। अब सरकार और पुलिस ने बाबा के उस सतलोक की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं, जिसमें बाबा बैठे हैं। पुलिस और सरकार अब बाबा की बाबागीरी निकालने के मूड में है, समर्थक भी डटे हुए हैं। इस पूरे मामले में अगर किसी की किरकिरी हो रही है तो वो है भाजपा सरकार की। हो भी क्यों ना क्योंकि दाऊद को दुबई से घसीटकर लाने का दावा, पाकिस्तान को औकात दिखाने का दम, चीन को चेतावनी देने वाली 'मजबूत' सरकार फिलहाल हिसार के एक आश्रम में मजबूर हैं।

नौकरी के दौरान ही रामपाल की मुलाकात 107 साल के कबीरपंथी संत स्वामी रामदेवानंद महाराज से हुई। चुकि बचपन से ही संत रामपाल धार्मिक स्वभाव के थे तो वो फौरन ही रामदेवानंद महाराज के शिष्य बन गये। इसके बाद 1995 में उन्होंने 18 साल लंबी अपनी नौकरी छोड दी और सत्संग करने लगे। धीरे धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गयी। इसी दौरान उन्हें करोंथा गांव में आश्रम के लिए एक महिला से जमीन मिल गयी। 1999 में उन्होंने सतलोक आश्रम की नींव रखी।
विवाद की पूरी कहानी
2006 में स्वामी दयानंद की लिखी एक किताब पर संत रामपाल ने एक टिप्पणी की, जिसके बाद आर्यसमाज को यह टिप्पणी बेहद नागवार गुजरी और दोनों के समर्थकों कें हिंसक झडप हुई। घटना में एक शख्स की मौत भी हो गयी। इसके बाद एसडीएम ने 13 जुलाई 2006 को आश्रम को कब्जे में ले लिया। इसके बाद रामपाल व उनके 24 समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि 2009 में उन्हें आश्रम वापस मिल गया।
बाद में संत रामपाल के खिलाफ आर्यसमाज के लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद आर्य समाजियों व संत रामपाल के समर्थकों में बार बार झडप हुई। इस हिंसक झडप में तीन लोगों की मौत हो गयी, करीब 100 लोग घायल हो गये। इस मामले में संत रामपाल को पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट में पेश होना है।












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