कौन हैं पूर्व IPS अधिकारी संजीव भट्ट? 27 साल पुराने यातना मामले में गुजरात कोर्ट ने किया बरी
Ex-IPS Officer Sanjiv Bhatt: पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को 27 साल पुराने मामले में बड़ी राहत मिली है। गुजरात के पोरबंदर कोर्ट ने संजीव भट्ट को 1997 के हिरासत में यातना मामले में बरी कर दिया। संजीव भट्ट को राहत देते हुए कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष 'उचित संदेह से परे मामले को साबित नहीं कर सका'।
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुकेश पंड्या ने शनिवार 07 दिसंबर को यह फैसला सुनाया है। उन्होंने पोरबंदर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (एसपी) भट्ट को साक्ष्य के अभाव में संदेह का लाभ देते हुए आईपीसी की धाराओं के तहत दर्ज मामले में बरी कर दिया। आइए जानते है कौन हैं पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट?

संजीव भट्ट कौन हैं?
संजीव भट्ट, कश्मीरी पंडित है और गुजरात कैडर के बर्खास्त IPS अधिकारी हैं। 1985 में IITबॉम्बे से एमटेक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की थी। साल 1988 में संजीव भट्ट गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी बने और 1985 में वह श्वेता भट्ट के साथ विवाद बंधन में बंधे गए थे। 1990 में जामनगर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के रूप में अपना पुलिस करियर शुरू किया था।
पुलिस हिरासत में प्रताड़ित का लगा था आरोप
जामनगर में अपने कार्यकाल के दौरान भट्ट ने दंगा शांत करने के लिए 150 लोगों को हिरासत में लिया था। हिरासत में लिया एक बंदी प्रभुदास वैष्णानी की अस्पताल में भर्ती होने के कुछ समय बाद ही किडनी फेल होने से मौत हो गई। वैष्णानी के भाई ने भट्ट और छह अन्य अधिकारियों के खिलाफ हिरासत में यातना देने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी।
भट्ट को हुई थी उम्रकैद की सजा, जाना पड़ा था जेल
हिरासत में लिए गए एक अन्य व्यक्ति विजय सिंह भट्टी ने संजीव भट्ट पर मारपीट का आरोप लगाया। इन आरोपों के कारण भट्ट को आजीवन कारावास की सजा हुई। जिसके चलते वह जेल में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, संजीव भट्ट की कानूनी परेशानियां यहीं खत्म नहीं हुईं। उनके खिलाफ कई मामले चल रहे हैं। हालांकि, उन्होंने अपनी सेवा के दौरान कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।
पीएम नरेंद्र मोदी की संभाली थी सुरक्षा-व्यवस्था
संजीव भट्ट दिसंबर 1999 से सितंबर 2002 तक गांधीनगर में स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो में बतौर डिप्टी कमिश्नर भी रहे। इस दौरान, जब गोधरा ट्रेन अग्निकांड हुआ, उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी संभाल रहे थे। गोधरा कांड के कारण पूरे गुजरात में व्यापक दंगे भड़क उठे। भट्ट को सितंबर 2002 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को मोदी के भाषण की रिकॉर्डिंग उपलब्ध कराने के आरोप में स्थानांतरित कर दिया गया था।
कैदियों के साथ ले थे लने-मिलने
इसके बाद, उन्हें राज्य रिजर्व पुलिस प्रशिक्षण कॉलेज का प्रिंसिपल नियुक्त किया गया और बाद में साबरमती जेल का अधीक्षक बनाया गया। साबरमती जेल में रहते हुए, भट्ट ने कथित तौर पर कैदियों को गाजर का हलवा परोसा और कथित तौर पर उनके साथ बहुत ज़्यादा घुलने-मिलने के कारण उन्हें स्थानांतरित कर दिया गया। गुजरात दंगों की जांच के दौरान, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी पर पक्षपात का आरोप लगाया। हालांकि, इन दावों को अदालत ने खारिज कर दिया।
निलंबन और बर्खास्तगी
जून 2011 में, गुजरात सरकार ने भट्ट को अनुपस्थित रहने के कारण निलंबित कर दिया था। लगभग पांच साल बाद, उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। गुजरात दंगों के मामले में पीएम मोदी को क्लीन चिट मिलने के बाद, अहमदाबाद पुलिस ने भट्ट के साथ-साथ राज्य के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार और कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ़ फर्जी सबूतों के साथ मोदी को फंसाने की साजिश रचने का मामला दर्ज किया।
हाई-प्रोफाइल मामलों में सामने आया था नाम
गुजरात दंगों से जुड़ी विभिन्न जांचों के दौरान भट्ट का नाम बार-बार सामने आया। इन विवादों के कारण उन्हें कई वर्षों तक कानूनी लड़ाइयों और सार्वजनिक जांच के दायरे में रहना पड़ा। अपनी बर्खास्तगी और चल रहे कानूनी मुद्दों के बावजूद, संजीव भट्ट नरेंद्र मोदी के मुखर विरोध और अपने पुलिस करियर के दौरान हाई-प्रोफाइल मामलों में शामिल होने के कारण कई सालों तक सुर्खियों में रहे।
वकील को फंसाने के मामले में भी सुनाई गई थी सजा
साल 1996 में पालनपुर में राजस्थान के एक वकील को फंसाने के लिए संजीव भट्ट ने ड्रग्स रखा था। इस मामले में भी भट्ट को 20 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। वह फिलहाल राजकोट सेंट्रल जेल में बंद है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष 'उचित संदेह से परे मामले को साबित नहीं कर सका' कि शिकायतकर्ता को अपराध कबूल करने के लिए मजबूर किया गया था।
खतरनाक हथियारों और धमकियों का उपयोग करके स्वेच्छा से दर्द देकर आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया गया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोपी पर मुकदमा चलाने के लिए आवश्यक मंजूरी, जो उस समय अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा एक लोक सेवक था, मामले में प्राप्त नहीं की गई थी।
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