जहां माधवराव सिंधिया का था आवास वहीं 'दरबार' लगाना चाहते हैं छोटे 'महाराज', फंस रहा है ये पेच

नई दिल्ली, 13 अगस्त: कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया के दिन फिर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें वही मंत्रालय सौंपा है, जिससे उनके पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया की राजनीतिक विरासत जुड़ी हुई थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता की विरासत से जुड़ी एक और ख्वाहिश पूरी करना चाहते हैं। यह काम बहुत मुश्किल भी नहीं है। लेकिन, पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के चलते इसमें एक छोटी सी अड़चन खड़ी हो गई है। देखने वाली बात ये है कि करीब साल भर में ही अपने सभी सियासी संकटों से उबर चुके सिंधिया इस नई चुनौती का सामना किस तरह से कर पाते हैं।

गुना से हारे तो परिवार के नाम रहा बंगला खाली करना पड़ा

गुना से हारे तो परिवार के नाम रहा बंगला खाली करना पड़ा

2019 के लोकसभा चुनाव तक की बात है। नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया नई दिल्ली के हाई प्रोफाइल लुटियंस जोन के 27, सफदरजंग रोड वाले बंगले में रहते थे। सफदरजंग मकबरे के पास ये कोने वाला बंगला है। यह बंगला करीब 4 दशकों तक सिंधिया परिवार के नाम था। लेकिन, पिछले लोकसभा चुनाव में ग्वालियर के छोटे सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर अपने ही एक पुराने वफादार रहे भाजपा उम्मीदवार से मध्य प्रदेश की गुना लोकसभा सीट हार गए। इसके चलते उन्हें पिता के राजनीतिक 'आशीर्वाद' के तौर पर मिला वह सरकारी बंगला खाली करना पड़ गया।

पिता माधवराव सिंधिया को मिला था वह बंगला

पिता माधवराव सिंधिया को मिला था वह बंगला

गुना हारने के करीब एक साल में ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल होने के बाद पिछले साल राज्यसभा के लिए चुन लिए गए। पार्टी के जानकारों के मुताबिक तब उन्हें भारत सरकार ने कम से कम तीन बंगले का विकल्प दिया, लेकिन उन्होंने किसी में भी जाने की बजाए आनंद लोक स्थित अपने निजी आवास में रहने का ही फैसला किया। पार्टी के जानकारों के मुताबिक उनकी इच्छा उसी पुराने बंगले में लौटने की होगी, जो 1980 के दशक में उनके पिता माधवराव सिंधिया को तब आवंटित की गई थी, जब राजीव गांधी सरकार में वे मंत्री बने थे।

पिता के आवास में मिलेगा 'दरबार' लगाने का मौका ?

पिता के आवास में मिलेगा 'दरबार' लगाने का मौका ?

छोटे सिंधिया के लिए पिता 'महाराज' की यादों से जुड़े उस बंगले की अहमियत को समझा जा सकता है। जहां से तकरीबन दो दशकों तक उन्होंने सत्ता और विपक्ष की राजनीति में अहम भूमिका निभाई थी। माधवराव सिंधिया वहीं मेहमानों की मेजबानी करते और उसी आवास पर उनका 'दरबार' लगता था। पिता की सियासी विरासत से मिली इसी परंपरा को आगे के दशकों में ज्योतिरादित्य को बढ़ाने का मौका मिला। जाहिर है कि उनके लिए वह बंगला पिता की अंतिम राजनीतिक निशानी की तरह है, जिसको लेकर उनका आकर्षण होना स्वाभविक है।

अपना सरकारी बंगला नहीं छोड़ना चाहते निशंक

अपना सरकारी बंगला नहीं छोड़ना चाहते निशंक

लेकिन, पिता की राजनीतिक विरासत की पहचान को बरकरार रखने के लिए छोटे 'महाराज' की राह में एक छोटी से रुकावट आ रही है लगती है। एस्टेट निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पहचान जाहिर नहीं होने देने की शर्त पर ईटी से कहा है, 'हमने पूर्व शिक्षा मंत्री (रमेश पोखरियाल निशंक) को एक बंगला दिखाया है, लेकिन उन्हें वह मंजूर नहीं है। उन्होंने अनुरोध किया है कि उन्हें इसी बंगले को रखने की अनुमति दी जाए। यह हमारी जिम्मेदारी है कि नए बंगले के रहने लायक बनाएं और तभी कोई व्यक्ति नई जगह में शिफ्ट कर सकता है। लेकिन, अभी तक यह नहीं हो पाया है।' सिंधिया के बाद यह बंगला निशंक को ही आवंटित किया गया था, लेकिन अब वह मंत्री नहीं हैं।

क्या पूरा होगा सिंधिया का यह सपना ?

क्या पूरा होगा सिंधिया का यह सपना ?

एस्टेट निदेशालय के नियमों के मुताबिक टाइप-VIII बंगले मौजूदा मंत्रियों, न्यायिक अधिकारियों और राज्यसभा सांसदों को आवंटित किए जा सकते हैं। इन बंगलों में सात कमरों के अलावा नौकरों के लिए क्वार्टर भी बने हुए हैं। यदि किसी मंत्री से उसकी जिम्मेदारी ले ली जाती है तो वह एक महीने तक उस आवास में रह सकता है, लेकिन इसके बाद उसे वैकल्पिक आवास में जाना होता है, जो कि उसे संसद सदस्य के रूप में आवंटित किया जाता है। अब सवाल है कि निशंक के लिए रूलबुक में कुछ बदलाव (जेनरल कोटे से लोकसभा कोटे में करने जैसा) किया जाता है या फिर सिंधिया की राह में खड़ी हुई इस अड़चन को दूर करने का कोई और वैकल्पिक रास्ता निकलता है।

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