जब तिलक और जिन्ना बने थे हिंदू-मुस्लिम एकता के सूत्रधार

भारत-पाक रिश्ते एक बार फिर अंधी सुरंग में फंस गए हैं. इस सुरंग में कोई हल्की-सी रोशनी भी नहीं दिख रही है ताकि यह उम्मीद बंधे कि कभी न कभी तो हालात ज़रूर सुधरेंगे.
इस बीच, भारत को बहुलतावादी और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र से 'हिंदू राष्ट्र' में बदलने की व्यवस्थित कोशिश जारी है. ऐसे वक्त में हमें स्वतंत्रता संग्राम के अपने प्रबुद्ध नेताओं की विरासत पर गौर करने की ज़रूरत है ताकि हिंदू-मुस्लिम एकता और भारत-पाकिस्तान की दोस्ती की कोई नई राह तलाश की जा सके.
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जिन नेताओं ने दिशा दी उनमें से एक थे दूरदृष्टि संपन्न लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ( 1856-1920). भारत में महात्मा गांधी का युग शुरू होने से पहले वह कांग्रेस के सबसे बड़े नेता थे.
उस वक्त भारत के राजनीतिक माहौल में तिलक का जो क़द था उसे देखकर 1917 से 1922 तक देश में ब्रिटिश सेक्रेट्री ऑफ़ स्टेट फॉर इंडिया रहे सैमुअल मोंटेग्यू ने कहा था, "इस वक़्त भारत में शायद तिलक से ज़्यादा ताक़तवर कोई दूसरा शख़्स नहीं है."
थोड़े वक्त तक बीमार रहने के बाद 1 अगस्त, 1920 में तिलक का बॉम्बे (मुंबई) में निधन हो गया. उस वक्त उनकी उम्र 64 साल थी. उनके अंतिम संस्कार में दस लाख से अधिक लोग शामिल हुए. शोकाकुल महात्मा गांधी ने अपने अखबार 'यंग इंडिया' में लिखा, "एक विशाल व्यक्तित्व चला गया. एक शेर की आवाज़ शांत हो गई. तिलक ने जिस तन्मयता और आग्रह से स्वराज की अविरल गाथा सुनाई वैसा कोई नहीं कर पाया."
तिलक के बेहद नज़दीकी सहयोगी रहे मोहम्मद अली जिन्ना ने हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुए कहा- श्री तिलक ने एक सैनिक की तरह देश की सेवा की और हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने में अहम भूमिका अदा की. उन्हीं की वजह से 1916 में लखनऊ समझौते को ज़मीन पर उतार पाना संभव हुआ."
भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की दो घटनाएं हिंदू-मुस्लिम एकता के मील का पत्थर कही जा सकती हैं. इन दोनों घटनाओं में हिंदू-मुस्लिम एकता अपने शिखर पर पहुंच गई थी. एक थी 1857 में आज़ादी की पहली लड़ाई. यह वह समय था जब हिंदू और मुसलमान पेशावर से ढाका तक लालची ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ कंधे से कंधा मिला कर लड़े थे.
दूसरा अहम वाक़या था लखनऊ में कांग्रेस और मुस्लिम लीग का समझौता. यह समझौता 1916 में हुआ था और उसके मुख्य वास्तुकार थे तिलक और जिन्ना. अगर समझौते की यह भावना बरकरार रहती तो शायद स्वतंत्रता संग्राम का नतीजा कुछ अलग और बेहतर होता.

जब शेर दहाड़ा था
अपनी दो गिरफ़्तारियों की बदौलत तिलक भारतीयों के दिल की धड़कन बन गए थे. वह इस देश के बड़े जननायक बन कर उभरे. उनकी पहली गिरफ़्तारी 1897 में हुई थी. उस साल उन्हें डेढ़ साल के लिए जेल भेज दिया गया था.
बाद में 1908 में वह एक बार फिर गिरफ़्तार किए गए. उन्हें छह साल की सश्रम कारावास की सजा सुना कर बर्मा की मांडले जेल भेज दिया गया. देश के कामगार वर्ग ने तिलक की सजा का जोरदार विरोध किया. इस सजा के ख़िलाफ़ कामगारों ने बॉम्बे (मुंबई) में अब तक की पहली राजनीतिक हड़ताल की.
सभी जातियों के हिंदुओं और मुस्लिमों ने बॉम्बे (मुंबई) को छह दिन के लिए ठप कर दिया. तिलक को दी गई हर एक साल की सजा के विरोध में एक दिन का बंद रखा गया यानी छह साल की सजा के लिए छह दिन. तिलक के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मामला चलाया गया. उनके ख़िलाफ़ जब तीसरी बार 1916 में राजद्रोह का मामला चला तो युवा वकील और भारतीय राजनीति के उभरते सितारे मोहम्मद अली जिन्ना ने उनका सफलतापूर्वक बचाव किया.
बॉम्बे हाई कोर्ट में एक शेर की तरह गरजते हुए तिलक ने ऐलान किया "स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा."
जब जज ने उनसे पूछा कि क्या आप सजा सुनाए जाने से पहले कुछ कहना चाहते हैं तो तिलक ने बड़ी निर्भिकता से कहा, "मैं सिर्फ़ यही कहना चाहता हूं कि ज्यूरी का फ़ैसला ग़लत है. मैं निर्दोष हूं. लोगों और देश की नियति इससे भी ऊंची सत्ता के हाथ में होती है. ईश्वर शायद चाहता है कि मैं जिन हितों के लिए लड़ रहा हूं उन्हें बाहर रहने के बजाय जेल के कष्ट सह कर ज़्यादा मजबूती दी जा सकती है."
तिलक की सजा की निंदा करते हुए 1917 की रूस क्रांति का नेतृत्व करने वाले ब्लादीमिर लेनिन ने कहा, "ब्रिटिश भेड़ियों ने भारतीय लोकतांत्रिक नेता तिलक को सजा सुनाई है, वह यह दिखाता है कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का बस नाश होने ही वाला है!"
तिलक के असंख्य प्रशंसकों में मौलाना हसरत मोहानी भी थे. मौलाना हसरत मोहानी एक प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी और उर्दू के शायर थे. मौलाना ने ही इंक़लाब ज़िंदाबाद का नारा पहली बार दिया था. वह तिलक को अपना मेंटर और गुरु मानते थे. 1908 में तिलक को जब जेल भेज गया तो उन्होंने लोकमान्य की शान में एक गज़ल लिखी.
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क्या तिलक मुस्लिम विरोधी थे? बिल्कुल नहीं !
यह दुर्भाग्य है कि कुछ इतिहासकारों ने तिलक की विरासत को ग़लत ढंग से दिखाने की कोशिश की है. उन्हें 'हिंदू राष्ट्रवादी' और इस तरह से 'मुस्लिम विरोधी' के तौर पर दिखाया गया है.
इन इतिहासकारों का कहना है कि उन्होंने गणेश और शिवाजी महोत्सवों का आयोजन कर 'हिंदू पुनरुत्थानवाद' को बढ़ाने की कोशिश की. लेकिन वे इस बात की अनदेखी करते हैं कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को आम आदमी से जोड़ने के लिए ऐसा किया था.
वे बड़े ही सुविधानजक तरीके इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि पुणे में तिलक अपने मुस्लिम भाइयों के साथ मोहर्रम के जुलूस में भी शामिल होते थे.
स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व देने के दौरान तिलक को यह पक्का विश्वास हो गया था कि भारत की मुक्ति और भविष्य की तरक्की के लिए हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच एकता निहायत ज़रूरी है. उन्होंने इस बात पर बार-बार ज़ोर दिया कि भारतीय राष्ट्रवाद 'साझा' है- मतलब इसमें हिंदू-मुस्लिम दोनों के लिए बराबर की जगह है. यह हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवाद ही भारत को 'हिंदू राष्ट्र' और पाकिस्तान को 'इस्लामी देश' बनाने के पैरोकारों के लिए नफ़रत फैलाने का औजार बन गया.
खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता मौलाना शौकत अली और उनके भाई मोहम्मद अली जौहर तिलक का काफ़ी सम्मान करते थे. शौकत अली ने तो यहां तक कहा, "मैं एक बार नहीं सैकड़ों बार यह कहता हूं कि मेरा और मेरे भाई का नाता अब भी लोकमान्य तिलक की राजनीतिक पार्टी से है".
वे हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के बेहतरीन दिन थे. जब अंतिम संस्कार के बाद तिलक की अस्थियां एक विशेष ट्रेन से उनके पैतृक शहर पुणे लाई गईं तो इसके साथ चल रहा जुलूस एक मस्जिद के सामने रुका. लोगों ने वहां अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि दी और नारे लगाए- " हिंदू-मुस्लिम एकता की जय".

हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक जिन्ना
राष्ट्रीय मुक्ति के लिए जिन्ना भी हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार थे. आज यह अविश्वसनीय लग सकता है कि आगे चल कर पाकिस्तान की स्थापना करने वाला एक ही वक्त में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों का सदस्य कैसे था?
जिन्ना 1896 में कांग्रेस में शामिल हुए थे. वह काफ़ी बाद में, 1913 में मुस्लिम लीग के सदस्य बने. जिन्ना ने खुद को देश की आज़ादी के साझा लक्ष्य के लिए संघर्ष कर रहे दो भारतीय राजनीतिक दलों के बीच पुल के तौर पर देखा. जिन्ना के राजनीतिक गुरु थे गोपाल कृष्ण गोखले. कांग्रेस के उदार धड़े के नेता. (तिलक कांग्रेस के उग्र धड़े के नेता थे).
गोखले ने जिन्ना को 'हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत' क़रार दिया था. जिन्ना ने खुद 'मुस्लिम गोखले बनने' की इच्छा जताई थी. लिहाजा यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि तिलक और जिन्ना ही ऐतिहासिक लखनऊ पैक्ट के वास्तुकार बने. यह तिलक और जिन्ना के बनाए माहौल का ही नतीजा था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों का वार्षिक अधिवेशन दिसंबर, 1916 में लगभग एक ही समय हुआ. इन अधिवेशनों में दोनों पार्टियां मुस्लिमों के लिए अलग प्रतिनिधत्व की व्यवस्था करने को तैयार हो गईं. उनके प्रतिनिधित्व को पर्याप्त महत्व दिया गया.
अल्पसंख्यक होने के बावजूद इंपीरियल और प्रांतीय विधानमंडलों में आबादी के अनुपात से मुस्लिमों को ज़्यादा प्रतिनिधित्व देने पर सहमति बनी. इसी तरह इस समझौते ने पंजाब और बंगाल जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में गैर मुस्लिमों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की. गैर मुस्लिमों को पर्याप्त सीटें देने के लिए मुस्लिमों की सीटें घटाई भी गईं. इस समझौते की वजह से इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में मुस्लिमों को एक तिहाई सीट दी गई.
पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे कांग्रेस के प्रभावशाली हिंदू नेताओं ने तिलक का विरोध किया. उन्होंने कहा कि अलग निर्वाचक मंडल जैसी 'राष्ट्रविरोधी' और 'लोकतंत्र विरोधी' व्यवस्था का समर्थन कर तिलक ने मुस्लिमों के सामने समर्पण कर दिया है. इसके बावजूद तिलक अपने रुख़ पर दृढ़ रहे और हिंदू-मुस्लिम समझौते के लिए सारी आलोचनाएं झेल लीं.
उन्होंने कहा कि हम हिंदुओं ने बहुत ज़्यादा ले लिया है. हमारे मुस्लिम भाइयों को विधान मंडलों में जो सीटें मिली हैं, वो कहीं से भी ज़्यादा नहीं है. जिस अनुपात में उन्हें रियायत दी गई है उसके हिसाब से उन्होंने बहुत उत्साह और ज़िंदादिली दिखाई है. मुस्लिमों की मदद के बगैर हम मौजूदा असहिष्णु दौर से नहीं निकल सकते.

तिलक यह मानते थे कि ब्रिटिश, हिंदू और मुस्लिमों के इस त्रिकोणीय संघर्ष को ब्रिटिश और आम हिंदू-मुसलमान के साझा मोर्चे के बीच की लड़ाई में बदल देना चाहिए और इस बुनियादी तब्दीली को जमीन पर उतारने के लिए वह यह दिखाने को तैयार थे कि हिंदू मुस्लिमों के लिए सदाशयता बरतने को तैयार हैं. आख़िरकार हिंदू और मुसलमान, दोनों ही तो भारतीय हैं.
जिन्ना ने तिलक की सोच को वाणी दी. लखनऊ में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में जिन्ना ने खुद को एक 'पक्का कांग्रेसी' करार दिया. ऐसा कांग्रेसी जिसे 'सांप्रदायिक नारों से कोई लगाव नहीं' था. जिन्ना का 'भारत के दो बड़े समुदायों के बीच एकता' में पक्का विश्वास था. उनका मानना था कि 'हिंदू-मुस्लिम एकता और साझा हितों के लिए दोनों के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल' होना चाहिए.
कांग्रेस और मुस्लिम लीग समझौते ने एकता का ऐसा माहौल बना दिया था कि तिलक को मुस्लिम लीग के अधिवेशन के एक सत्र में बुलाया गया. वहां उनका भव्य स्वागत और अभिनंदन हुआ. इस अवसर का आंखों देखा ब्योरा डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी ने दिया था जो बाद में कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के अध्यक्ष बने.
डॉ. मुख्तार ने कहा था, "तिलक की दृष्टि हिंदू वर्चस्व की सोच नहीं रखती थी. कुछ लोगों ने तिलक के विचारों को ग़लत नज़रिये से देखा. वह चाहते थे कि यह देश एक होकर अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़े".
तिलक-जिन्ना समझौता- इस भावना को ज़िंदा करने की ज़रूरत
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की यह सबसे बड़ी त्रासदी रही कि आगे आने वाले घटनाक्रमों के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता और कांग्रेस-मुस्लिम सहयोग अपनी कसौटी पर खरा नहीं उतर सका. इसकी एक वजह तो यह है कि तिलक ज़्यादा दिनों तक ज़िंदा नहीं रहे. वह ज़िंदा रहते तो शायद इसे एक व्यावहारिक शक्ल दे पाते.
दूसरी ओर जिन्ना यह देख रहे थे कि कांग्रेस में उन्हें लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है. आख़िरकार उन्होंने 1921 में कांग्रेस पार्टी छोड़ दी. बढ़ते अविश्वास और आपस में ना के बराबर असहयोग की वजह से कांग्रेस और मुस्लिम लीग भारत को 1947 के रक्तरंजित विभाजन की ओर ले गई.
अगर आज तिलक और जिन्ना, दोनों ज़िंदा होते भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की यह बुरी हालत देख कर उन्हें भारी निराशा होती. दोनों देशों में दो धर्मों के लोगों के बीच की दूरियां देख कर वे भी काफ़ी दुखी होते.
आज भारत और पाकिस्तान, दोनों में से कोई भी सदाशयता या सकारात्मक सोच दिखाने को तैयार नहीं है. दोनों अपने विवादास्पद मुद्दों को सुलझाने के लिए समझौता करने को तैयार नहीं दिखते.
ईमानदारी से कहें तो क्या यह संभव है कि कश्मीर का विवाद आपसी विश्वास कायम किए सुलझ जाएगा? क्या आपसी बातचीत और आपसी समझदारी के बगैर इसका कोई हल निकल सकता है? आपसी लेन-देन, इंसाफ़ और निष्पक्षता के लिए प्रतिबद्धता दिखाए बगैर क्या इस मुश्किल हालात से हम निकल सकते हैं? क्या भारत और पाकिस्तान एक दूसरे को दुश्मन मानते रहेंगे?
अगर हम इन सवालों से जूझना चाहते हैं तो हमें धीरे-धीरे यह समझ बनानी होगी कि तिलक और जिन्ना ने एक-दूसरे को समझने की जिस भावना का प्रदर्शन किया था उसी से आज की सभी बड़ी चुनौतियों का सामना करने में सफलता मिलेगी. हिंदू-मुस्लिम एकता और भारत-पाक रिश्तों को सामान्य बनाना आज के दौर में सबसे बड़ी चुनौतियों में शुमार हैं.
(लेखक 1998 से लेकर 2004 तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक रहे. वह 'Music of the Spinning Wheel: Mahatma Gandhi's Manifesto for the Internet Age' के लेखक हैं.)
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