UAPA क़ानून पर दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी का क्या असर होगा?

प्रदर्शनकारी
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"संयुक्त प्रवर समिति को एक गधा सौंपा गया था और समिति का काम था उसे घोड़ा बनाना लेकिन परिणाम यह निकला है कि वह खच्चर बन गया है. अब गृह मंत्रालय का भार ढोने के लिए तो खच्चर ठीक है लेकिन अगर गृहमंत्री यह समझते हैं कि वह खच्चर पर बैठकर राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता की लड़ाई लड़ लेंगे, तो उनसे मेरा विनम्र मतभेद है."

ये बातें साल 1967 में अटल बिहारी वाजपेयी ने तब कही थीं जब तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार यूएपीए क़ानून पारित करने की तैयारी में थी.

यूएपीए यानी अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) एक्ट. वही यूएपीए जिसके दुरुपयोग पर दिल्ली हाई कोर्ट ने सरकार को जमकर आड़े हाथों लिया है.

साल 1967 में इंदिरा सरकार अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन बिल लेकर आई थी और पारित होने से पहले संसद की जॉइंट सिलेक्ट कमिटी ने इसके ड्राफ़्ट में कुछ बदलाव किए थे.

उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने इस बिल का जमकर विरोध किया था और इसकी तुलना एक ऐसे 'गधे' से की थी जिसे 'घोड़ा' बनाने की कोशिश की गई हो लेकिन वो 'खच्चर' बन गया हो.

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नताशा नरवाल
Pinjra Tod
नताशा नरवाल

यूएपीए: 54 साल बाद फिर वही कहानी

साल 1967 में इंदिरा सरकार ने कहा था कि देश में कुछ अलगाववादी ताक़तें काम कर रही हैं और भारत की अखंडता की रक्षा के लिए इस क़ानून की ज़रूरत बताई थी.

तब आज से करीब 54 साल पहले कई राजनीतिक पार्टियों ने इस क़ानून का जमकर विरोध किया था और आशंका जताई थी कि यूएपीए का इस्तेमाल विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए किया जाएगा.

आज 54 साल बाद इतिहास जैसे ख़ुद को दोहरा रहा है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली दंगों में अभियुक्त नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ़ इक़बाल तन्हा को ज़मानत देते हुए यूएपीए के दुरुपयोग पर चिंता जताई.

कोर्ट ने सरकारों से कहा कि किसी पर भी 'आतंकवादी' होने का ठप्पा लगाए जाने से पहले गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.

अदालत ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए कहा, "हमें यह कहने पर मजबूर होना पड़ रहा है कि ऐसा लगता है कि असहमति दबाने की बेचैनी में, सरकार के ज़हन में संविधान से सुनिश्चित विरोध प्रदर्शन के अधिकार और आतंकी गतिविधियों के बीच की रेखा धुंधली सी हो रही है. अगर ऐसी धारणा मज़बूत हुई तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद होगा."

नताशा नरवाल, देवंगना कलिता और आसिफ़ इक़बाल तन्हा को पिछले साल दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा मामले में साज़िश के आरोप में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

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अपने पति ख़ालिद सैफ़ी के साथ नरगिस सैफ़ी
NArgis Saifi/Facebook
अपने पति ख़ालिद सैफ़ी के साथ नरगिस सैफ़ी

उम्मीद की हल्की सी रोशनी

हालाँकि दिल्ली पुलिस ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को 'पूर्वाग्रह से ग्रसित' बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी है लेकिन इस फ़ैसले ने यूएपीए के शिकार कई लोगों और उनके परिजनों के मन में हल्की सी ही सही, मगर उम्मीद जगाई है.

आसिफ़ इक़बाल तन्हा की माँ जहांआरा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले और टिप्पणियों से उन्हें लंबे वक़्त के बाद थोड़ी सी राहत मिली है.

उन्होंने कहा, "अब बस हम यही दुआ कर रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट भी समझे कि हमारे बच्चों को ग़लत तरीक़े से ऐसे क़ानून का शिकार बनाया गया है."

दिल्ली दंगों में अभियुक्त और 'यूनाइटेड अगेंस्ट हेट' के संस्थापकों में से एक ख़ालिद सैफ़ी अब भी यूएपीए के तहत दर्ज मामले के कारण जेल में बंद हैं.

ख़ालिद की पत्नी नरगिस सैफ़ी ने बीबीसी से कहा, "भले ही दिल्ली पुलिस ज़मानत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चली गई हो लेकिन हाई कोर्ट ने जो कहा है, वो हमारे लिए बहुत मायने रखता है."

उन्होंने कहा, "यूएपीए एक ऐसा क़ानून है कि इसकी गिरफ़्त में आने वालों की ज़िंदगी में अँधेरा छा जाता है. आप इसका दर्द मुझसे और मेरे परिवार से पूछिए. मुझे तो ऐसा लगता है कि सरकार जब ठान लेती है कि इस शख़्स को जल्दी बाहर नहीं आने देना है तो कैसे न कैसे करके उस पर यूएपीए लगवा देती है."

नरगिस कहती हैं, "एक तो यह क़ानून आतंक और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा है. यानी एक बार इसका ठप्पा लगा तो मीडिया से लेकर सारी दुनिया आपके ट्रायल में लग जाएगी. मगर अब दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले के बाद मेरे मन में फिर भरोसा जगा है कि मेरा ख़ालिद बाइज़्ज़त बरी होकर आएगा."

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सिद्दीक़ कप्पन
SHAHEEN ABDULLA
सिद्दीक़ कप्पन

'क़ानून का नहीं, क़ानून के दुरुपयोग का विरोध'

केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन के वकील विल्स मैथ्यूज ने भी दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को शानदार बताया है.

सिद्दीक़ कप्पन पिछले करीब आठ महीने से यूएपीए और राजद्रोह जैसे मामलों में जेल में बंद हैं.

पिछले साल अक्टूबर में उन्हें उत्तर प्रदेश से तब गिरफ़्तार कर लिया गया था जब वो हाथरस में दलित लड़की से बलात्कार और हत्या मामले में रिपोर्टिंग के लिए गए थे.

कप्पन के वकील विल्स मैथ्यूज ने बीबीसी से कहा, "दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में यूएपीए को लेकर जो बातें कही हैं, वो बहुत तर्कपूर्ण हैं. मुझे लगता है कि इससे हमारा (कप्पन का) पक्ष मज़बूत होगा."

मैथ्यूज कहते हैं कि यूएपीए की एक क़ानून के तौर पर सरकार को ज़रूरत है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन इस क़ानून को जिस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है, वो बेहद चिंताजनक है.

उन्होंने कहा, "यूएपीए की सबसे बुरी बात यह है कि इसकी गिरफ़्त में आने के बाद ज़मानत मिलना नामुमकिन सा हो जाता है. मैंने कई ऐसे केस लड़े हैं जिनमें मेरे मुवक्किलों को अदालत से राहत मिली लेकिन यह राहत इतनी देर से आती है कि लोगों की ज़िंदगी में तब तक काफ़ी कुछ तबाह हो चुका होता है."

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विरोध प्रदर्शन
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विरोध प्रदर्शन

'विरोध प्रदर्शन का हक़ नहीं छीना जा सकता'

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दीपक गुप्ता का मानना है कि दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले में सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का अधिकार नागरिकों को संविधान ने दिया है और इसे नहीं छीना जा सकता.

जस्टिस गुप्ता ने बीबीसी से कहा, "यूएपीए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों के लिए अस्तित्व में आया था, न कि असहमति जताने वाले प्रदर्शनकारियों पर 'एंटी नेशनल' होने का ठप्पा लगाकर उन्हें जेल में बंद करने के लिए."

वो कहते हैं, "जब आतंकी गतिविधियों को लेकर यूएपीए के प्रावधान इतने सख़्त और विस्तृत हैं तो उन्हें बेतहाशा थोपा जाना नागरिकों के हक़ में नहीं है. इन्हें बेहद सावधानी के साथ इस्तेमाल किया जाना चाहिए."

इस पूरी बहस में जस्टिस गुप्ता एक और ज़रूरी बात की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं.

वो कहते हैं, "ऐसे मामलों में पब्लिक प्रोसिक्यूटर और वरिष्ठ क़ानूनविदों की अहम भूमिका होती है. उन्हें सरकार को उचित रास्ता दिखाना चाहिए लेकिन इन दिनों उनकी यह भूमिका कम ही नज़र आती है."

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उमर ख़ालिद की रिहाई के लिए प्रदर्शन
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उमर ख़ालिद की रिहाई के लिए प्रदर्शन

ज़मानत नियम है, जेल अपवाद

जस्टिस गुप्ता कहते हैं कि इन दिनों अदालतें कई सामान्य मामलों में भी अभियुक्तों की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज कर देती हैं जबकि ज़मानत हर नागरिक का अधिकार है.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी साल 1978 में 'स्टेट ऑफ़ राजस्थान बनाम बालचंद' मामले के अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में भी यही कहा था.

अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस न्यायिक सिद्धांत की बुनियाद रखी थी कि ज़मानत नियम है और जेल अपवाद.

इतना ही नहीं, इस साल फ़रवरी में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यूएपीए के मामलों में भी अगर मूल अधिकारों का हनन हो रहा है तो अभियुक्त को ज़मानत मिलनी चाहिए.

जस्टिस दीपक गुप्ता कहते हैं, "ज़मानत न मिलना सज़ा नहीं हो सकती. सज़ा तो ट्रायल पूरा होने के बाद मिलनी चाहिए. ज़मानत से इनकार सिर्फ़ उन्हीं संवेदनशील मामलों में किया जाना चाहिए जिसमें अभियुक्त के ग़वाहों को धमकाने, सबूत से छेड़छाड़ या देश छोड़ने जैसी आशंकाएं हों."

उनका मानना है कि अगर किसी अभियुक्त को ज़मानत नहीं दी जा रही है तो यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उसका ट्रायल जल्द से जल्द पूरा हो.

सांकेतिक तस्वीर
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सांकेतिक तस्वीर

'सरकार बनाम एक अकेला शख़्स'

सुप्रीम कोर्ट में वकील उर्वी मोहन प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों जैसे आम लोगों को यूएपीए का निशाना बनाए जाने को 'दोधारी तलवार' बताती हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "हालिया संशोधन से पहले यूएपीए के तहत आतंकी गतिविधियों से जुड़े संदिग्ध समूहों या संगठनों पर ही मुक़दमा चलाया जा सकता था लेकिन अब एक अकेले शख़्स को भी इसकी गिरफ़्त में लिया जा सकता है. यह बेहद ख़तरनाक स्थिति है."

उर्वी कहती हैं, "एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखने से लेकर पर्यावरण या कृषि से जुड़े प्रस्तावित क़ानूनों का विरोध करने तक की वजह से लोगों पर यूएपीए के तहत केस दर्ज किए गए हैं. ऐसी स्थिति में यूएपीए जैसे गंभीर क़ानून के तहत केस दर्ज होते ही पूरा मामला सरकार बनाम एक अकेले शख़्स का हो जाता है."

उनके मुताबिक़, "जिस पर यूएपीए के तहत केस दर्ज हुआ हो वो एक सामान्य या ग़रीब परिवार से ताल्लुक़ रखने वाला व्यक्ति भी हो सकता है. वहीं, दूसरी तरफ़ सरकार होती है जिसके पास असीमित संसाधन हैं. ऐसे में कोई अकेला शख़्स सरकार से कैसे लड़ पाएगा?"

उर्वी कहती हैं कि यूएपीए के प्रावधान ऐसे हैं कि ये सरकार और सरकारी एजेंसियों को तो बहुत ताक़त देते हैं लेकिन अभियुक्त को बेहद कमज़ोर और बेबस बना देते हैं.

वो उम्मीद जताती हैं कि दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले से लोगों के मन में यह भरोसा मज़बूत होगा कि अदालतों को उनके अधिकारों की चिंता है.

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'अदालती फ़ैसलों में समरूपता की कमी'

हालाँकि पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय दिल्ली हाई कोर्ट के इस फ़ैसले से बहुत ज़्यादा आशान्वित नज़र नहीं आते.

उनका मानना है कि ऐसे मामलों में अदालतों के फ़ैसलों में 'कंसिस्टेंसी' नहीं होती इसलिए उनका दूरगामी असर नहीं हो पाता.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "यह तो सिर्फ़ एक मामले की बात हुई. प्रगतिशील विचारों वाले दो जज आए और उन्होंने ये फ़ैसला सुना दिया लेकिन आम तौर पर इसी तरह दूसरे मामलों में ऐसे फ़ैसले नहीं आते."

विभूति नारायण दिल्ली दंगों से ही जुड़े अन्य कई मामलों की याद दिलाते हैं जिनमें लोगों पर यूएपीए के तहत केस दर्ज हुआ है और तकरीबन डेढ़ साल बाद भी उन्हें ज़मानत नहीं मिली है.

वो कहते हैं, "सरकारों और न्यायपालिका को ज़्यादा संवेदनशीलता दिखाने की ज़रूरत है. सरकारों को चाहिए कि वो विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए ऐसे गंभीर क़ानूनों का दुरुपयोग न करें और अदालतों को चाहिए वो नागरिकों के अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए फ़ैसले सुनाएं."

समय के साथ और कठोर होता गया यूएपीए

राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता से जुड़ी समस्याओं का हवाला देकर साल 1967 में लाए गए यूएपीए क़ानून में कई बार संशोधन हुए हैं और हर संशोधन के साथ ये ज़्यादा कठोर होता गया है.

एक नज़र यूएपीए के अब तक के सफ़र पर:

1967: यूएपीए प्रभाव में आया. राष्ट्रीय अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़े मसलों से निपटने का मक़सद.

2001: संसद पर आतंकी हमले के बाद वाजपेयी सरकार ने आतंकविरोधी क़ानून प्रिवेंशन ऑफ़ टेररज़िम एक्ट (POTA) लागू किया.

2004: यूपीए सरकार ने POTA के दुरुपयोग की बात कहते हुए इसे निरस्त किया और POTA के कई प्रावधानों को यूएपीए में जोड़ दिया. यह पहली बार था जब यूएपीए में ऐसे प्रावधान जोड़े गए.

2011: मुंबई में हमलों के बाद चरमपंथी गतिविधियों के संदिग्ध अभियुक्तों को बिना चार्ज़शीट दायर किए, लंबे समय तक जेल में रखे जाने के प्रावधान जोड़े गए. ज़मानत की शर्तों को और कठोर कर दिया गया.

2019: बीजेपी सरकार ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को चरमपंथी गतिविधियों से जुड़े मामलों की जाँच में असुविधा का हवाला देते हुए यूएपीए में और कड़े प्रावधान जोड़े. एनआईए को यूएपीए के तहत मामलों की जाँच करने का अधिकार मिला.

यूएपीए
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यूएपीए

लंबित मामले, जेलों में बंद लोग

गृह मंत्रालय और एनसीआरबी (नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के आँकड़े बताते हैं कि यूएपीए के मामलों में आरोपपत्र दायर होने और जाँच पूरी होने की दर बहुत कम है.

सितंबर, 2020 में गृह मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि साल 2016-18 के बीच यूएपीए के तहत कुल 3005 मामले दर्ज किए गए थे.

इनमें कुल 3947 लोगों को गिरफ़्तार किया था लेकिन चार्जशीट सिर्फ़ 821 मामलों में ही दायर की जा सकी थी. यानी इस दौरान महज 27% मालमों की जाँच ही पूरी जा सकी थी.

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