2002 के दंगे! अब बच्चे पूछते हैं कुतुबुद्दीन अंसारी से सवाल

कहा जाता है न कि तस्वीरें दर्द बयां कर देती हैं। पर, हकीकत ये है कि जब दर्द को बार-बार कुरेदा जाता है तो दर्द नासूर बन जाता है। दरअसल 2002 के दंगों को जानने वाला कुतुबुद्दीन अंसारी आज भी नहीं जाना पाया है कि आखिर इंसान-इंसान का जानी दुश्मन कैसे बन गया। न वो कत्ल-ऐ-आम करने वालों का चेहरा ही पहचानता है। न ही कत्ल करने वालों का मजहब ही जानता है।

Qutubuddin Ansari

आखिर कत्ल करने वालों को कातिल कहा जाए वही बेहतर है। पर, कोसता है उस तस्वीर को, जिसके नाम पर सियासी फायदा तलाशा जा रहा है। दंगों के बाद प्रकाशित अंसारी की उस तस्वीर का मुखालिफत की खातिर इस्तेमाल किया गया है।

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इस बात से आहत कुतुबुद्दीन का कहना है कि मैं अपने बच्चों को इस तस्वीर से उभरते हुए सवालों के जवाब नहीं दे सकता कि पापा आप रोतेे हुए, दया से भीख मांगते हुए क्यों दिखाई देते हैं। कुतुबुद्दीन के जहन में इस सवाल के साथ ही जुबान पर पसर जाता है....एक सन्नाटा...बेहद लंबा सन्नाटा।

सियासी फायदे ने जगा दिया दंगों का जख्म

1 मार्च 2002 की उस तारीख को याद कर कुतुबुद्दीन के चेहरे पर सुबकन उतर आई। याद कराने वाले 14 साल पहले गुजरात में हुए दंगों की कहानी में से कुतुबुद्दीन के उस बेबस चेहरे की तस्वीर को सियासत की खातिर पोस्टरों में उतार लाए हैं। ताकि दंगों को चेहरों के जरिए एक शक्ल देने की कोशिश की जा सके। पर, शायद उन्होंने इस बात पर गौर नहीं किया कि कत्ल-ऐ-आम की खातिर उतरी भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता साहब। लेकिन चुनाव क्या न करा दें।

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लगता है जनता की बेहतरी की खातिर उठाए जाने वाले तमाम मुद्दों का अकाल आ गया है। असम और पश्चिम बंगाल चुनाव के चलते एक बार दर्द के चीथड़ों से जख्मों को खोलकर हरा करने का प्रयास किया जा रहा है। जी हां ये हम नहीं बल्कि ऐसा ही कुछ खुद अंसारी कह रहे हैं।

प्रयोग और दुरूपयोग जैसी चीज बनकर रह गया हूं

मीडिया से बात करते हुए कुतुबुद्दीन ने कहा, "जब-जब यह होता है, मेरे लिए जिंदगी और कठिन हो जाती है। कल लोगों को पता चलेगा तो वे मेरे मंशा पर सवाल उठाएंगे।

लेकिन सच यह है कि मुझे इस बारे में पता तक नहीं है।" इन सबके इतर अंसारी ने ये भी कहा कि मैं 43 साल का हूं और पिछले 14 सालों में राजनीतिक दलों, बॉलीवुड और यहां तक कि आतंकी संगठनों ने मेरा प्रयोग और दुरुपयोग किया। इससे तो अच्छा यही होता कि मैं 2002 में ही मर गया होता।

अपने ही दांव में फंसी कांग्रेस

असम और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अंसारी की उसी तस्वीर का प्रयोग किया है। अंसारी की तस्वीर के साथ कैप्शन लिखा है, क्या मोदी के गुजरात का मतलब विकास है?

क्या आप असम को अगला गुजरात बनने देंगे? फैसला आपका है। विकल्प सिर्फ कांग्रेस ही है। हालांकि अपने इस दांव में कांग्रेस अब उलझती जा रही है।

तस्वीर भी मेरी और आरोप भी मुझ पर

राजनीतिक फायदे के लिए राजनीतिक दल मेरी तस्वीर का इस्तेमाल करते हैं। वहीं कुछ लोग मुझ पर पैसे लेने का आरोप भी लगाते हैं। और दूसरा पक्ष मुझसे नाराज हो जाता है। दरअसल बगैर बीजेपी का नाम लिए अंसारी ने अपनी व्यथा सुना दी।

बहरहाल सियासत के इस कारनामें को देखने, समझने और जानने के बाद डॉ0 राहत इंदौरी की वो पंक्तियां याद आती हैं:

नई हवाओं की शोहबत बिगाड़ देती है,
कबूतरों को खुली छत बिगाड़ देती है,
जो जुर्म करते हैं इतने बुरे नहीं होते,
सजा न देकर अदालत बिगाड़ देती है,
ये चलती फिरती दुकानों की तरह लगते हैं,
नए अमीरों को दौलत बिगाड़ देती है,
मिलाना चाहा है जब भी इंसा को इंसा से,
तो सारे काम सियासत बिगाड़ देती है...

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