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Operation Blue Star: आखिर क्‍यों पड़ी गुरुद्वारे में सैन्‍य ऑपरेशन की जरूरत, 5 Facts

By Ankur Kumar Srivastava
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    नई दिल्‍ली। सिख धर्म के सबसे पावन स्‍थल अमृतसर स्थित हरिमंदिर साहिब परिसर (स्‍वर्ण मंदिर) में भारतीय सेना की कार्रवाई 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' से पंजाब की समस्‍या पूरी दुनिया के सामने सुर्खियों में आई थी। यह अभियान स्‍वर्ण मंदिर को खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से मुक्त कराने के लिए चलाया गया अभियान था। पंजाब समस्या की शुरुआत 1970 के दशक के अंत में अकाली राजनीति में खींचतान और अकालियों की पंजाब संबंधित मांगों को लेकर शुरू हुई थी। आइए आपको उन 5 मुख्‍य कारणों के बारे में विस्‍तार से बताते हैं कि आखिर कयों पड़ी थी गुरुद्वारे में सैन्‍य ऑपरेशन की जरूरत लेकिन इससे पहले ये जान लीजिए कि ऑपरेशन ब्लू स्टार में कुल 492 जानें गई थीं। इस ऑपरेशन में सेना के 4 अफसरों समेत 83 जवान शहीद हुए। वहीं जवानों सहित 334 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

    Operation Blue Star: आखिर क्‍यों पड़ी गुरुद्वारे में सैन्‍य ऑपरेशन की जरूरत, 5 Facts

    बटवारे की आग में जल रहा था पंजाब और कट्टरपंथी विचारधारा जन्म लेने लगी

    बंटवारे की आग ने पंजाब को तोड़ कर रख दिया। यही वो वक्त था जब पंजाब में कट्टरपंथी विचारधारा जन्म लेने लगी। सिखों के सबसे बड़े तीर्थ स्वर्ण मंदिर समेत सभी गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अधीन आ चुका था और एसजीपीसी की पॉलिटिकल विंग शिरोमणि अकाली दल सिख अस्मिता की राजनीति शुरू कर चुका था। आनंदपुर साहिब में अलग सिख राज्य समेत पंजाब के लिए कई मांगें रखी गईं जो अकाली राजनीति का आधार बन गईं।

    इसी बीच अमृतसर से कुछ दूर चौक मेहता के दमदमी टकसाल में सात साल के एक लड़के ने सिख धर्म की पढ़ाई शुरू की। उसका नाम था जरनैल सिंह भिंडरावाले। कुछ ही सालों में भिंडरावाले की धर्म के प्रति कट्टर आस्था ने उसे टकसाल के गुरुओं का प्रिय बना दिया। जब टकसाल के गुरु की मौत हुई तो उन्होंने अपने बेटे की जगह भिंडरावाले को टकसाल का प्रमुख बना दिया। आज भी टकसाल में भिंडरावाले को शहीद का दर्जा दिया जाता है।

    निरंकारियों और अलगाववादियों के बीच झड़प

    1966 में केन्द्र सरकार ने हिमाचल और हरियाणा को निकाल कर सिख बाहुल्य अलग पंजाब की मांग मान ली। लेकिन सिख राजनीति पर पकड़ बनाए रखने के लिए अकालियों ने चंडीगढ़ को पंजाब में मिलाने और पंजाब की नदियों पर हरियाणा और राजस्थान के अधिकार खत्म करने की मांग शुरू कर दी। कई जानकार मानते हैं कि ऐसे वक्त में इंदिरा गांधी को जरूरत थी ऐसे नेता की जो अकालियों की राजनीति खत्म कर सके। अब ये एक खुला सच है कि कांग्रेस ने इसी काम के लिए भिंडरावाले को प्रमोट किया। जानकार मानते हैं कि भिंडरावाले की अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। भिंडरावाले ने निरंकारियों की खिलाफत के साथ कट्टरपंथी राजनीति की शुरुआत की। 1978 में अमृतसर में निरंकारियों के सम्मेलन के दौरान भिंडरावाले समर्थकों और निरंकारियों के बीच जानलेवा झगड़ा हुआ जिसमें भिंडरावाले के 13 समर्थक मारे गए। इस एक घटना ने भिंडरावाले को हिंसा का लाइसेंस दे दिया। भिंडरावाले पर तीन हाई प्रोफाइल हत्याओं के आरोप लगे लेकिन कांग्रेस के राज में ये आरोप कभी साबित नहीं हो पाए।

    1981 में हुई थी हिंसा

    भिंडरावाले के ख़िलाफ़ लगातार हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगने लगे, लेकिन कांग्रेस सरकार के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने इस बारे में कम से कम दो बार इन घटनाओं में उनका हाथ न होने की बात कही। कांग्रेस पर लगातार ये आरोप लगते रहे कि उसकी केंद्र और राज्य सरकारों ने भिंडरावाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें रोकने की भी कोई कोशिश नहीं की। सितंबर 1981 में ही भिंडरावाले ने महता चौक गुरुद्वारे के सामने गिरफ़्तारी दी, लेकिन वहां एकत्र भीड़ और पुलिस के बीच गोलीबारी हुई और ग्यारह व्यक्तियों की मौत हो गई। पंजाब में हिंसा का दौर शुरू हो गया। लोगों को भिंडरावाले के साथ जुड़ता देख अकाली दल के नेताओं ने भी भिंडरावाले के समर्थन में बयान देने शुरू कर दिए। अक्तूबर 1981 में भिंडरावाले को रिहा कर दिया गया।

    डीआईजी अटवाल की हत्या

    उधर पंजाब में हिंसक घटनाएं लगातार बढ़ती चली गईं। यहां तक कि पटियाला के पुलिस उपमहानिरीक्षक के दफ़्तर में भी बम विस्फोट हुआ। पंजाब के उस समय के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह पर हमला हुआ। फिर अप्रैल 1983 में एक अभूतपूर्व घटना घटी। पंजाब पुलिस के उपमहानिरीक्षक एएस अटवाल की दिन दहाड़े स्वर्ण मंदिर परिसर में गोली मारकर तब हत्या कर दी गई जब वे वहाँ माथा टेक कर बाहर निकल रहे थे।

    पुलिस के मनोबल की दशा इससे पता चलती है कि मामले की जांच करते हुए बाद में पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल ने पाया कि उस समय घटनास्थल के आसपास लगभग सौ पुलिसकर्मी थे और उनमें से आधे हथियारों से लैस थे। लेकिन अटवाल का शव इस घटना के करीब दो घंटे बाद तक वहीं पड़ा रहा। कुछ ही महीने बाद जब पंजाब रोडवेज़ की एक बस में घुसे बंदूकधारियों ने पहली बार हिंदुओं को मार डाला तो इंदिरा गांधी सरकार ने पंजाब में दरबारा सिंह की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया।

    इंदिरा गांधी और अकाली नेताओं के बीच असफल बातचीत

    पंजाब में स्थिति बिगड़ती चली गई और 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार से तीन महीने पहले हिंसक घटनाओं में मरने वालों की संख्या 298 हो गई थी। अकाली राजनीति के जानकारों के अनुसार, ऑपरेशन ब्लूस्टार से पहले इंदिरा गांधी सरकार की अकाली नेताओं के साथ तीन बार बातचीत हुई। आख़िरी चरण की बातचीत फ़रवरी 1984 में तब टूट गई जब हरियाणा में सिखों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई। एक जून को भी स्वर्ण मंदिर परिसर और उसके बाहर तैनात पुलिसकर्मियों के बीच गोलीबारी हुई, लेकिन तब तक वहाँ ये आम बात बन गई थी।

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    English summary
    What lead to Operation Blue Star? all you need to know.

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