Anti-Defection Law: क्या है दलबदल कानून? राघव चड्ढा समेत 7 MP के इस्तीफे के बाद क्या जाएगी सांसदी? जानिए नियम
Anti-Defection Law: भारतीय राजनीति में 'आया राम, गया राम' का दौर एक बार फिर चर्चा में है। इस बार केंद्र में है आम आदमी पार्टी (AAP)। राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा समेत पार्टी के कुल सात सांसदों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। 24 अप्रैल को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में राघव चड्ढा ने न सिर्फ बीजेपी जॉइन की, बल्कि यह दावा भी कर दिया कि उन्होंने पूरी कागजी कार्रवाई संविधान के नियमों के तहत की है। उन्होंने यह भी कहा कि इस संबंध में दस्तावेज तैयार कर राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए गए हैं।
राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया कि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई से ज्यादा सांसदों ने पार्टी से अलग होने और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ जाने का फैसला किया है। इन सांसदों में राघव चड्ढा,संदीप पाठक,अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल, संदीप पाठक, विक्रमजीत सिंह साहनी, हरभजन सिंह का भी नाम है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि अगर सांसद पार्टी बदलते हैं तो क्या उनकी राज्यसभा सदस्यता खत्म हो सकती है। यहीं से चर्चा शुरू होती है दलबदल विरोधी कानून यानी एंटी डिफेक्शन लॉ की।

▶️ क्या है दलबदल विरोधी कानून? (what is Anti-Defection Law)
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (10th Schedule) को 'दलबदल विरोधी कानून' कहा जाता है। इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य 'आया राम, गया राम' की राजनीति पर लगाम लगाना और निर्वाचित सदस्यों द्वारा पार्टी बदलने से पैदा होने वाली राजनीतिक अस्थिरता को रोकना था। सरल शब्दों में कहें तो, यह कानून उन जनप्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करता है जो चुनाव जीतने के बाद अपनी मूल पार्टी को धोखा देते हैं।
एक समय ऐसा था जब चुने हुए सांसद और विधायक चुनाव जीतने के बाद बार-बार पार्टी बदल लेते थे। इससे सरकारें गिरती थीं, राजनीतिक अस्थिरता पैदा होती थी और जनता का जनादेश कमजोर पड़ता था। इसी स्थिति को रोकने के लिए संसद ने दलबदल विरोधी कानून लागू किया।
इस कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चुना गया प्रतिनिधि बिना गंभीर कारण के अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में न जाए। इससे राजनीतिक स्थिरता बनी रहती है और वोटरों का भरोसा कायम रहता है।
▶️ Anti-Defection Law Rules: यह कानून कब लागू होता है?
दलबदल कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों पर लागू होता है। इसका मतलब यह है कि सांसद और विधायक दोनों इसकी सीमा में आते हैं।
अगर कोई सदस्य निम्न परिस्थितियों में पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है:
1. स्वेच्छा से पार्टी छोड़ना
अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या सार्वजनिक रूप से दूसरी पार्टी का समर्थन करने लगता है, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है।
2. पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान
अगर कोई सदस्य सदन में अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट करता है या वोटिंग से दूरी बनाता है, तो भी कार्रवाई हो सकती है।
3. निर्दलीय सदस्य का पार्टी जॉइन करना
अगर कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए, तो वह अयोग्यता का सामना कर सकता है।
4. मनोनीत सदस्य का नियम तोड़ना
मनोनीत सदस्य अगर शपथ लेने के छह महीने बाद किसी पार्टी में शामिल होता है, तो उसकी सदस्यता पर असर पड़ सकता है।
▶️ Why Anti-Defection Law Came: दलबदल कानून लाने की जरूरत क्यों पड़ी?
1960 और 1970 के दशक में भारतीय राजनीति में गठबंधन सरकारों का दौर बढ़ा। इस दौरान कई राज्यों और केंद्र में सरकारें सांसदों और विधायकों के दल बदलने से गिरने लगीं।
1967 के बाद राजनीति में "आया राम गया राम" शब्द काफी लोकप्रिय हुआ। यह उस दौर की राजनीति का प्रतीक बन गया जब नेता बहुत तेजी से पार्टी बदल रहे थे। रिपोर्टों के मुताबिक 1967 से 1971 के बीच बड़ी संख्या में विधायक और सांसद अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में शामिल हुए।
राजनीतिक अस्थिरता और सरकारों के टूटने की घटनाओं ने संसद को कानून बनाने पर मजबूर किया। इसके बाद 1985 में दलबदल विरोधी कानून अस्तित्व में आया।
▶️ Two-Third Rule Explained: दो-तिहाई नियम क्या कहता है?
राघव चड्ढा का पूरा दावा एक खास तकनीकी नियम पर टिका है। दलबदल कानून का सबसे अहम हिस्सा "दो-तिहाई नियम" है। यही नियम मौजूदा राजनीतिक विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा में है। शुरुआत में कानून में एक-तिहाई सदस्यों के अलग होने पर राहत का प्रावधान था। लेकिन बाद में 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए इसे बदल दिया गया।
अब नियम यह है कि अगर किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सांसद या विधायक एक साथ दूसरी पार्टी में शामिल होते हैं या किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करते हैं, तो उन्हें दलबदल कानून के तहत अयोग्य नहीं माना जाता। इसे "मर्जर" यानी विलय माना जाता है। यही कारण है कि राघव चड्ढा ने दावा किया कि अगर दो-तिहाई सांसद साथ हैं, तो दलबदल कानून लागू नहीं होगा।
राघव चड्ढा का दावा है कि उनके साथ 7 सांसद (यानी 70%) हैं, जो कि दो-तिहाई (6.66 से अधिक) के आंकड़े को पार कर जाता है। अगर यह साबित हो जाता है, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होगा और उनकी सांसदी बची रहेगी।
▶️ कौन लेता है अंतिम फैसला? (Who Makes the Final Decision)
इस कानून के तहत अयोग्यता का फैसला करने का पूरा अधिकार सदन के सभापति (राज्यसभा के मामले में उपराष्ट्रपति) या अध्यक्ष (लोकसभा के मामले में स्पीकर) के पास होता है। राघव चड्ढा ने पहले ही दस्तावेज सभापति को सौंप दिए हैं। हालांकि, इसमें एक ट्विस्ट भी है। 1992 के 'किहोतो होलोहन' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि सभापति का निर्णय अंतिम नहीं है और उसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है। यानी अगर मामला कोर्ट पहुंचता है, तो वहां भी लंबी लड़ाई चल सकती है।
▶️ Supreme Court Role: सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्या है?
दलबदल कानून से जुड़े फैसलों पर अदालत की नजर भी रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के किहोतो होलोहन मामले में कहा था कि अध्यक्ष या सभापति का फैसला अंतिम जरूर है, लेकिन उसकी न्यायिक समीक्षा हो सकती है। मतलब अगर किसी पक्ष को लगता है कि निर्णय गलत है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
▶️Who Are The MPs Named: किन सांसदों के नाम सामने आए?
राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिन नेताओं का नाम लिया, उनमें कई बड़े चेहरे शामिल बताए जा रहे हैं।
1. स्वाति मालीवाल: स्वाति मालीवाल राज्यसभा सांसद हैं और पहले दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष रह चुकी हैं। पिछले कुछ समय से पार्टी नेतृत्व के साथ उनके मतभेद चर्चा में रहे हैं।
2. अशोक कुमार मित्तल: अशोक कुमार मित्तल शिक्षा क्षेत्र से जुड़े बड़े नाम हैं। वह लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं। उन्हें 2022 में राज्यसभा भेजा गया था। हाल ही में उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर की जिम्मेदारी भी मिली थी।
3. संदीप पाठक: डॉ. संदीप पाठक पार्टी संगठन में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। उन्हें पंजाब से राज्यसभा भेजा गया था और उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव भी माना जाता रहा है।
4. हरभजन सिंह: पूर्व भारतीय क्रिकेटर हरभजन सिंह ने राजनीति में आने के बाद राज्यसभा का रास्ता चुना। वह पंजाब से सांसद हैं और उनका कार्यकाल 2028 तक है।
5. बलबीर सिंह सीचेवाल: पर्यावरण संरक्षण के लिए जाने जाने वाले बलबीर सिंह सीचेवाल पंजाब की राजनीति में एक सम्मानित चेहरा माने जाते हैं। उन्हें नदी संरक्षण अभियान के लिए पहचान मिली।
6. विक्रमजीत सिंह साहनी: विक्रमजीत सिंह साहनी सामाजिक और शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। इन नामों के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा और तेज हो गई है।
▶️Political Impact: राजनीति पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
अगर किसी पार्टी के बड़ी संख्या में सांसद एक साथ दूसरी पार्टी में जाते हैं, तो इसका असर सिर्फ संख्या पर नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश पर भी पड़ता है। ऐसे घटनाक्रम पार्टी नेतृत्व, संगठन और वोटरों के विश्वास पर असर डालते हैं। राज्यसभा में संख्या संतुलन बदलने से संसद में राजनीतिक समीकरण भी बदल सकते हैं। इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या वास्तव में दो-तिहाई सांसदों ने एक साथ कदम उठाया है और क्या कानूनी प्रक्रिया इसे मान्यता देगी।
▶️ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. क्या 2/3 सदस्यों के अलग होने पर भी दलबदल कानून लागू होता है?
नहीं, यदि किसी पार्टी के 2/3 या उससे अधिक सदस्य एक साथ किसी दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो उन्हें 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
Q2. 'आया राम, गया राम' की कहानी क्या है?
यह कहावत 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल के नाम पर पड़ी थी, जिन्होंने महज 15 दिनों के भीतर तीन बार अपनी पार्टी बदली थी। इसी घटना के बाद दलबदल कानून की जरूरत महसूस हुई।
Q3. क्या स्पीकर के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
हां, सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, स्पीकर या सभापति के फैसले की न्यायिक समीक्षा हो सकती है, अगर उसमें किसी प्रक्रियागत खामी या पक्षपात की आशंका हो।
Q4. क्या पाला बदलने वाले सांसद दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं?
यदि किसी सांसद की सदस्यता दलबदल कानून के तहत रद्द हो जाती है, तो उसे दोबारा सदन में आने के लिए उपचुनाव लड़ना पड़ता है। इसके अलावा 2003 के संशोधन के बाद, ऐसे व्यक्ति को तब तक मंत्री नहीं बनाया जा सकता जब तक वह दोबारा चुनाव न जीत जाए।














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