जानिए अफजल गुरु को फांसी के ठीक बाद क्या हुआ जेएनयू में?

लोकतांत्रिक नवाचार के नाम पर जेएनयू की सीमा के अंदर यूटोपियाई अंदाज में काम होते रहे हैं, सोच भी यूटोपियाई होती रही है। इस विश्वविद्यालय में वह सब कुछ होता है, जिसे कम से कम देश के समाज और संस्कृति में सर्वमान्य मान्यता नहीं है। बहरहाल मौजूदा विवाद बेशक वाम विरोधी खेमों की तैयारी के बाद दुनिया के सामने आया है। लेकिन इसका एक पक्ष ऐसा भी है, जिसकी जानकारी अभी पूरी दुनिया को नहीं है।

इससे पहले जेएनयू में कब-कब हुईं देश-विरोधी गतिविधियां

What happened in JNU just after Afzal Guru hanged

क्या हुआ था अफजल की फांसी के बाद?

9 फरवरी 2013 को अफजल गुरू को फांसी पर कांग्रेस सरकार ने लटकाया था। तब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी और सुशील कुमार शिंदे गृहमंत्री थे। अफजल गुरू के साथ नाइंसाफी को लेकर तभी से जेएनयू में डीएसयू नामक छात्र संगठन विरोध जताता रहा है। उसके बाद से ही हर साल नौ फरवरी को यह संगठन अफजल गुरू की याद में विश्वविद्यालय में कार्यक्रम करता रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि यह संगठन जेएनयू में प्रतिबंधित है। इतना ही दिलचस्प यह भी जानना होगा कि इस कार्यक्रम के लिए डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर से अनुमति सांस्कृतिक कार्यक्रम के तौर पर ली जाती रही है।

प्रतिबंधित होने के बावजूद इस बार दो फरवरी को ही इस संगठन ने विश्वविद्यालय में कार्यक्रम को लेकर पर्चा दाखिल किया। 9 फरवरी को कार्यक्रम करने के लिए उसकी तरफ से विश्वविद्यालय प्रशासन से अनुमति मांगी। अनुमति को लेकर विश्वविद्यालय में दो तरह के विचार है।

डीन से हो पूछताछ?

डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर का कहना है कि उन्होंने अनुमति नहीं दी तो एसोसिएट डीन का कहना है कि उन्होंने अनुमति दी। फिर सवाल यह है कि प्रतिबंधित होने के बावजूद डीएसयू पर्चे बांटने और उसमें अपने पदाधिकारियों का नाम और फोन नंबर देने में कामयाब कैसे हुआ और प्रतिबंधित संगठन के खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्रवाई क्यों नहीं की?

किसके समर्थन में हैं राहुल गांधी?

जिस तरह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी विश्वविद्यालय में गये और भारत-विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों का समर्थन किया धरने में शामिल हुए, उससे यह साफ है कि उनकी पार्टी की सरकार ने अफजल गुरू के साथ नाइंसाफी की। तो क्या राहुल गांधी भी उन लोगों का साथ दे रहे हैं, जो लोग कश्मीर की आजादी चाहते हैं?

क्या नक्सलियों को देंगे खून बहाने की आजादी?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के इस विवाद के बाद हम सवाल कर रहे हैं उन लोगों से जो कश्मीर की आजादी के नारे लगाते रहे हैं। सवाल यह कि अगर जम्मू-कश्मीर या छत्तीसगढ़ की सत्ता इनके हाथों में सौंप दी जाये, तो क्या यही लोग कश्मीर को आजाद करा पायेंगे? तब ये लोग नक्सली हिंसा का खात्मा करेंगे या बढ़ावा देंगे? क्या नक्सलियों को खून बहाने की अनुमति देते रहेंगे?

सिंगूर और नंदीग्राम में तो सीपीएम की अगुआई वाली बुद्धदेव दास गुप्ता की पश्चिम बंगाल सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ वैसे ही कदम उठाए थे, जैसे वाम विचार विरोधी दलों की सरकारें उठाती रही हैं। जब इन संदर्भों में जेएनयू के अंदर होने वाले कार्यों की परख और मीमांसा की जाती है तो निश्चित तौर पर राजनीतिक संदेह बढ़ते हैं और उन संदेहों की सूई एक ही तरफ बढ़ती है।

वक्त आ गया है कि इन सवालों से भी मुठभेड़ किया जाय और इस विश्वविद्यालय को राजनीति का अखाड़ा बनाने की बजाय पठन-पाठन का केंद्र ही रहने देने में सहयोग किया जाय।

लेखक परिचय- उमेश चतुर्वेदी टेलीविजन पत्रकार और स्तंभकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।

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