बंगाल में किस बात पर निर्भर करता है बीजेपी का भविष्य? RSS ने खामियों को उजागर कर समझाया
पश्चिम बंगाल में इस बार के लोकसभा चुनावों में सिर्फ बीजेपी की उम्मीदें नहीं टूटी हैं, बड़े-बड़े चुनाव विश्लेषकों की चुनावी गणनाएं भी धरी की धरी रह गई हैं। 2019 में भाजपा ने जिस तरह से इस राज्य में धमाका किया था, उसके बाद यह उसकी लगातार दूसरी करारी हार है।
भाजपा के सामने अगली चुनौवी 2026 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव है। उसके लिए अच्छी बात ये है कि विपक्ष का पूरा स्थान उसके लिए खुला हुआ है। राज्य में दशकों तक सत्ता पर काबिज रह चुके लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस हाथ मिलाने के बावजूद अंतिम सांसें गिनते नजर आ रहे हैं।

बंगाल में बीजेपी की सारी प्लानिंग क्यों हो रही है फेल?
लेकिन, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस से मुकाबला करने में बीजेपी की सारी प्लानिंग फेल हो जा रही है। पार्टी की इस बार की करारी हार पर उसके वैचारिक अभिभावक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने बहुत ही गंभीर विश्लेषण किया है। आरएसएस ने अपनी एक संगठनात्मक पत्रिका 'स्वस्तिका' में कहा है कि बंगाल में बीजेपी की दिक्कत ये है कि वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुकाबले कोई चेहरा नहीं तैयार कर सकी है।
भाजपा की हार पर आरएसएस का क्या है विश्लेषण?
संघ का विश्लेषण ये है कि तृणमूल की राजनीति को समझने के लिए बीजेपी को उसकी 'लक्ष्मी भंडार' योजना से आगे निकलकर सोचना होगा। 'स्वस्तिका' के एक हालिया लेख में लिखा गया है कि बनर्जी और टीएमसी की ताकत सिर्फ 'रेवड़ी पॉलिटिक्स' में नहीं है, बल्कि उससे आगे है और बीजेपी को इसपर काम करना होगा।
बंगाल में बीजेपी की कमजोरी क्या है?
इसमें भाजपा की खामियों को लेकर जिन कुछ बिंदुओं की ओर इशारा किया गया है, उनमें ममता के मुकाबले 'स्वीकार्य और शक्तिशाली' चेहरे का अभाव, 'कमजोर संगठन' और 'जनता से संवाद' की कमी शामिल हैं।
बंगाल में किस बात पर निर्भर करता है बीजेपी का भविष्य?
इसमें कहा गया है, '2019 के बाद बीजेपी को दो चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा है। 2026 (विधानसभा चुनाव) अग्नि परीक्षा होगा....उसे हारे हुए और अक्षम उम्मीदवारों को हटाना होगा और खुद को राज्य की जमीनी पार्टी के तौर पर फिर से खड़ा करना होगा।'
बंगाल में बीजेपी को कमजोर संगठन ले डूबा!
2019 के लोकसभा चुनावों के मुकाबले 2024 में बंगाल में टीएमसी का वोट शेयर करीब 2.5% बढ़ गया है और बीजेपी का लगभग 1.5% कम हो गया है। इसके कई सारे कारण हैं। लेकिन, संघ का नजरिया है कि फिर भी पार्टी अपनी 6 सीटें बचा सकती थी अगर उसका संगठन मजबूत होता।
इसने कहा है, '146 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी 40% वोट ला सकती थी। लेकिन, ऐसे भी मंडल अध्यक्ष हैं, जिन्हें पता नहीं है कि मंडलों में कितने बूथ हैं। यह महत्वपूर्ण है कि उत्तरदायित्व सही व्यक्ति को दिया जाए।'
बंगाल में भाजपा के लिए उम्मीद?
हालांकि, बंगाल में भाजपा के भविष्य को लेकर संघ ने उम्मीदें भी दिखाई हैं। मसलन, इसमें कहा गया है कि बंगाल का परिणाम उम्मीदों के अनुसार नहीं है, 'लेकिन, भाजपा कार्यकर्ताओं को समझना पड़ेगा कि विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी 12 सीटें जीतने में सफल रही है।'
इसके मुताबिक, 'एक तरफ तृणमूल की रेवड़ी पॉलिटिक्स और तुष्टिकरण की राजनीति ने इसके वोट बैंक को सुनिश्चित करने में मदद की, सीपीएम-कांग्रेस की वजह से भी उसका वोट शेयर बढ़ गया। लोगों ने सोचा कि भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल, लेफ्ट फ्रंट से ज्यादा ताकतवर है।' यही नहीं, संपादकीय में यह भी दावा किया गया है कि डर और दबाव की वजह से भी लोग तृणमूल को वोट डालने को मजबूर हुए हैं।












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