Sengol Controversy 2024: क्या है सेंगोल? इसपर पहले सत्र में ही क्यों मचा बवाल? जानें 10 खास बातें
Sengol Controversy 2024: लोकसभा चुनाव 2024 के बाद संसद का पहला सत्र आज से चालू हुआ। नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों के शपथ ग्रहण और स्पीकर के चयन के बाद राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को संबोधित किया। इस बीच, विपक्ष ने पिछले साल ही संसद में स्थापित किए सेंगोल को हटाने की मांग शुरू कर दी।
आपको बता दें कि, पिछले साल 28 मई 2023 को नए संसद भवन में 'सेंगोल' उर्फ एक स्वर्ण राजदंड स्थापित किया गया था। 'सेंगोल' निष्पक्ष और समतापूर्ण शासन के मूल्यों का प्रतिनिधित्व करता है।

सेंगोल एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रतीक है, जो तमिलनाडु में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह राजदंड परंपरागत रूप से सत्ता और न्याय का प्रतीक माना जाता है। आइए जानते हैं क्या है सेंगोल? क्यों मचा है बवाल? विस्तार से इसके बारे में...
सेंगोल क्या है?
सेंगोल तमिल शब्द "सेम्मई" से आया है जिसका अर्थ है 'धार्मिकता'। यह सोने से बना एक राजदंड है और इसे कई कीमती पत्थरों से सजाया गया है। सेंगोल 5 फीट लंबा है और इसके शीर्ष पर एक सुनहरा गोला है। इस गोले पर नं नक्काशी है, जो भगवान शिव का प्रिय बैल है।
सेंगोल चोल राजाओं की सत्ता और न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का एक शक्तिशाली प्रतीक है। प्रेस सूचना ब्यूरो ने बताया कि तमिलनाडु के एक प्रमुख धार्मिक मठ के उच्च पुजारियों ने इसे आशीर्वाद दिया है। शीर्ष पर नंदी की मूर्ति हाथ से बनाई गई है, जिसकी अडिग निगाहें 'न्याय' के द्रष्टा की तरह हैं।
ये 10 खास बातें इतिहास और महत्व को समझाने में मददगार...
- सेंगोल का अर्थ: तमिल शब्द 'सेंगोल' का अर्थ होता है 'धार्मिक और आधिकारिक राजदंड'। यह राजाओं और साम्राज्यों द्वारा सत्ता के हस्तांतरण के समय प्रयोग किया जाता था।
- इतिहास: सेंगोल का इतिहास प्राचीन तमिलनाडु के चोल साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। इसे राजा द्वारा सत्ता के हस्तांतरण के समय उपयोग किया जाता था, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि नया शासक न्याय और धर्म के मार्ग पर चलेगा।
- सत्ता का प्रतीक: सेंगोल का मुख्य उद्देश्य सत्ता और न्याय का प्रतीक बनना है। यह एक तरह का प्रतीकात्मक चिन्ह है जो नए शासक को सत्ता सौंपने के समय दिया जाता था।
- आध्यात्मिक महत्व: सेंगोल को एक धार्मिक और आध्यात्मिक प्रतीक भी माना जाता है। इसे देने का मतलब होता है कि नया शासक नैतिकता, धर्म और न्याय के सिद्धांतों का पालन करेगा।
- आजादी से कनेक्शन: 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय, सेंगोल का उपयोग सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में किया गया था। इसे पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया गया था, जब ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली थी।
- अभी का विवाद: हाल ही में सेंगोल को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ है, जिसमें इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर चर्चा हो रही है। कुछ लोगों का मानना है कि इसे सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
- संविधान के समय: स्वतंत्रता के बाद, सेंगोल को नई सरकार और प्रशासन में एक प्रतीक के रूप में शामिल किया गया था, ताकि यह याद दिलाया जा सके कि सत्ता का उपयोग न्याय और धर्म के लिए किया जाए।
- सांस्कृतिक धरोहर: तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में सेंगोल को एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सम्मान दिया जाता है। यह तमिल सभ्यता और उसकी परंपराओं का प्रतीक है।
- आधुनिक समय में उपयोग: आज के समय में भी सेंगोल को विशेष अवसरों पर प्रयोग किया जाता है, जैसे कि धार्मिक उत्सव, राजकीय समारोह आदि।
- महत्व: सेंगोल का महत्व न केवल एक प्रतीकात्मक वस्त्र के रूप में है बल्कि यह भारतीय संस्कृति और इतिहास के महत्वपूर्ण पहलुओं को भी दर्शाता है। यह न्याय, धर्म और नैतिकता के सिद्धांतों का पालन करने का संदेश देता है।
क्यों मचा है बवाल?
2024 के संसद के पहले सत्र के दौरान विपक्ष ने सेंगोल को हटाने की मांग शुरू कर दी। समाजवादी पार्टी (सपा) ने सेंगोल को राजशाही का प्रतीक बताते हुए उसे हटाकर उसकी जगह संविधान स्थापित करने की मांग की है। सपा प्रमुख और सांसद अखिलेश यादव ने कहा कि मुझे लगता है कि हमारे सांसद शायद ऐसा इसलिए कह रहे है, क्योंकि पिछले साल पीएम मोदी ने इसकी स्थापना के वक्त सिर झुकाया था। शायद शपथ लेते वक्त इसे भूल गए हो, शायद तभी मेरी पार्टी ने इन्हें याद दिलाने के लिए कहा हो।
वहीं, आरजेडी सांसद मीसा भारती ने कहा कि सेंगोल को संसद में नहीं बल्कि म्यूजियम में रखो।
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