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Crop Damage: मिडिल ईस्ट संकट और बेमौसम बरसात से पड़ेगी महंगाई की दोहरी मार, गेंहू से लेकर फलों तक की फसल बर्बाद

Crop Damage Effect: देश के अधिकांश हिस्सों में मौसम के बदले मिजाज ने न केवल कुदरत का कहर बरपाया है, बल्कि आम आदमी की जेब पर भारी बोझ डालने की तैयारी भी कर दी है। एक तरफ जहां मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को $120 प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन और ट्रांसपोर्टेशन लागत में भारी उछाल आया है। वहीं दूसरी तरफ भारत के कृषि प्रधान राज्यों में बेमौसम बारिश, भीषण आंधी और ओलावृष्टि ने पकी-पकाई रबी फसलों को मलबे में तब्दील कर दिया है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में गेहूं, सब्जियों और फलों की खड़ी फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचा है। यदि आपूर्ति में यह बाधा जारी रही, तो आने वाले सप्ताहों में आटा, दाल और सब्जियों की कीमतों में 20% से 40% तक की वृद्धि देखी जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो किचन का बजट पूरी तरह बिगड़ना तय है।

Crop Damage Effect

खेतों में बिछ गई फसल, किसानों का बुरा हाल

बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने उत्तर प्रदेश के कई जिलों में तबाही के निशान छोड़े हैं। सुल्तानपुर जिले के बालमपुर गांव के किसानों का कहना है कि शिमला मिर्च की फसल पूरी तरह तैयार थी, लेकिन तेज आंधी ने पौधों को जड़ से उखाड़ दिया। वहीं, किसान अमरूद के बागों और गेहूं को लेकर भी चिंतित हैं। किसानों का कहना है कि अगर बारिश नहीं थमी, तो इस साल गेहूं घर तक ले जाना भी मुश्किल हो जाएगा।

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आगरा और रायबरेली में भी हालात भयावह हैं। आगरा के एत्मादपुर, बाह और फतेहाबाद में पिछले एक हफ्ते से हो रही बारिश और ओलों ने गेहूं की खड़ी फसल को जमीन पर सुला दिया है। रायबरेली के किसान भी भीगी हुई कटी फसल को बचाने की जद्दोजहद में जुटे हैं, क्योंकि नमी के कारण अनाज की गुणवत्ता खराब होने और सड़ने का खतरा पैदा हो गया है।

देशभर में फैला नुकसान का जाल

मौसम की यह मार केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है:

  • पंजाब: लगभग 1.25 लाख एकड़ फसल प्रभावित हुई है, जहां ओलों ने गेहूं के दानों को भारी नुकसान पहुंचाया है।
  • महाराष्ट्र: यहां 2 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अंगूर, आम और दलहन की फसलें बर्बाद होने की खबर है।
  • राजस्थान और हरियाणा: इन राज्यों में रिकॉर्ड तोड़ बारिश (सामान्य से 790% अधिक) ने चने की खेती को भारी क्षति पहुंचाई है।

मिडिल ईस्ट संकट, बढ़ती लागत का नया सिरदर्द

खेती के नुकसान के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जारी ईरान-इजरायल संघर्ष ने आग में घी डालने का काम किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावित होने से कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हुई है। इससे डीजल की कीमतें बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर खेतों की जुताई, सिंचाई और अनाज को मंडी तक ले जाने वाली ढुलाई (Freight cost) पर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, जब उत्पादन कम हो और परिवहन महंगा, तो खुदरा बाजार में महंगाई का ग्राफ तेजी से ऊपर जाता है।

प्रशासन का रुख और भविष्य की चुनौती

संकट को देखते हुए राज्य सरकारों ने नुकसान का आकलन (Survey) शुरू कर दिया है। अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि 'गिरदावरी' के बाद किसानों को मुआवजा दिया जाएगा और बीमा कंपनियों को दावों के त्वरित निपटान के निर्देश दिए गए हैं। विपक्षी दलों ने किसानों के लिए ₹50,000 प्रति एकड़ तक के मुआवजे की मांग की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि क्लाइमेट चेंज के कारण मौसम का यह अनिश्चित पैटर्न अब एक स्थायी चुनौती बन गया है। बिना सिंचाई की बेहतर तकनीक और मजबूत फसल बीमा सुरक्षा के, भारतीय किसानों के लिए खेती करना एक महंगा जुआ साबित हो रहा है। आने वाले दिनों में यदि बाजार में नई फसल की आवक कम रही, तो आम जनता को खाने-पीने की चीजों के लिए अपनी जेब और ढीली करनी पड़ सकती है।

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