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हर हफ्ते पांच ग्राम प्‍लास्टिक निगल रहे हैं हम, अब तो हो जाए सतर्क

बेंगलुरु। देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के अवसर पर प्लास्टिक के खिलाफ एक नया जन-आंदोलन आरंभ करने जा रहा है। जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर भाारतीयों को इस आंदोलन में शामिल होने का आह्वान करते हुए ''नो प्लास्टिक'' का मोदी मंत्र भी दिया। हमारे जीवन में हर जगह प्लास्टिक की घुसपैठ है।

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सस्ती, हल्की, लाने-ले जाने में आसान होने की वजह से लोग प्लास्टिक को पसंद करते हैं। ये प्लास्टिक हमारे लिए कितना बड़ा खतरा बनता जा रहा है इसका शायद आपको अंदाजा भी नहीं होगा। यह प्‍लास्टिक जल जमीन सब कुछ दूषित करने वाली यह प्लास्टिक इंसान की हलक तक पहुंच चुकी हैं। भारत ही नहीं वर्तमान समय में प्लास्टिक प्रदूषण विश्‍व भर के लिए समस्या खड़ी कर चुका है। पर्यावरण पर हुए शोध और सरकारी आंकड़े कुछ ऐसी ही सच्चाई बयां कर रहे हैं।

प्लास्टिक कचरे का एक तिहाई से अधिक हिस्सा प्रकृति में मिल जाता है

शोध के अनुसार दुनिया भर में बनने वाले प्लास्टिक का 75 प्रतिशत का कचरा बन जाता है और लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा पर्यावरण में मिल जाता है। हर व्यक्ति औसतन पांच ग्राम प्लास्टिक निगल रहा है। यह अध्‍ययन ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूकैसल द्वारा किया गया है। जिसे इस वर्ष के वल्र्ड वाइल्डलाइफ फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसमें बताया गया है कि एक सप्ताह में एक व्यक्ति औसतन पांच ग्राम प्लास्टिक निगल रहा है। यानी किसी न किसी माध्यम से यह नुकसानदेह चीज उसके शरीर में पहुंच रही है। अध्ययन के अनुसार प्लास्टिक कचरे का एक तिहाई से अधिक हिस्सा प्रकृति में मिल जाता है, विशेष रूप से पानी में जो शरीर में प्लास्टिक पहुंचाने का सबसे बड़ा स्रोत है।अध्ययन के मुताबिक, नल के पानी में प्लास्टिक फाइबर पाए जाने के मामले में भारत तीसरे नंबर पर है। भारत में 82.4 प्रतिशत तक प्लास्टिक फाइबर पाया जाता है। इसका मतलब है कि प्रति 500 मिली में चार प्लास्टिक फाइबर मौजूद रहता है ।

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भारत में प्रतिदिन 25,940 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है

वर्ष 1950 से अब तक वैश्विक स्तर पर 8.3 से 9 अरब मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन हो चुका है, जो कचरे के चार से अधिक माउंट एवरेस्ट के बराबर है। अब तक निर्मित कुल प्लास्टिक का लगभग 44 फीसद वर्ष 2000 के बाद बनाया गया है। वहीं भारत में प्रतिदिन 9 हजार एशियाई हाथियों के वजन जितना 25,940 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है।

एक वर्ष में 11 किलो प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है एक भारतीय

भारतीय दुनिया के सबसे कम प्लास्टिक उपभोक्ताओं में शामिल हैं। एक भारतीय एक वर्ष में औसतन 11 किग्रा प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है। वहीं अमेरिका में 109 किलो, युरोप में प्रति व्‍यक्ति 65 किलो, चीन में 38 किलो और ब्राजील में 32 किलो प्रतिव्‍यक्ति एक साल में प्लास्टिक इस्तेमाल करता है।

79 प्रतिशत प्लास्टिक अभी भी है पर्यावरण में मौजूद

विश्‍व के 127 देशों ने प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध लगा रखा है। वहीं 27 देशों ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। उत्पादित प्लास्टिक का लगभग 40 फीसद पैकेजिंग के इस्तेमाल में आता है, जिसे एक बार उपयोग किया जाता है और फिर छोड़ दिया जाता है। 1950 के बाद से उत्पादित सभी प्लास्टिक का 79 फीसद पर्यावरण में अभी भी मौजूद है।

5 ट्रिलियन प्लास्टिक की थैलियां होती उपयोग

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हर साल लगभग 5 ट्रिलियन प्लास्टिक की थैलियां दुनिया भर में उपयोग की जाती हैं। प्लास्टिक की थैलियां पर्यावरण, समुद्र और धरती पर रहने वाले जीवों के लिए बेहद हानिकारक हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि बांग्लादेश 2002 में प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला देश था। कई अफ्रीकी देशों ने अपेक्षाकृत कम अपशिष्ट-संग्रह और रीसाइक्लिंग दरों के लिए जगह बनाई है। अमेरिका ने अभी तक प्लास्टिक की थैलियों पर प्रतिबंध नहीं लगाया है, हालांकि उसके कुछ राज्यों ने स्वंय ही थैलियों पर प्रतिबंध लगा रखा है। भारत में भी प्लास्टिक पर सरकार ने प्रतिबंध लगाया हुआ है लेकिन लोग अभी धड़ल्ले से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

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सीपीसीबी की चौंकाने वाली रिपोर्ट

भारत में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के पालन का आकलन करने वाले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट अंतिम बार 2017-18 के लिए प्रकाशित की गई थी। 2018 में इसके नियमों में संशोधन किया गया था। 2017-18 में केवल 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट सीपीसीबी को सौंपी थी।
इन 14 में से उत्तर प्रदेश में हर साल 2.06 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हुआ। यहां पर प्लास्टिक निर्माण और रिसाइकिल की 16 अपंजीकृत इकाइयां भी थीं। वहीं गुजरात में 2.69 लाख टन प्रति वर्ष प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हुआ। मध्‍यप्रदेश में 0.69 टन, पंजाब में0.54टन, नागालैंड में 0.14 लाख टन और ओडिशा 0.12 लाख टन प्रतिवर्ष प्लास्टिक कचरा उत्पन्न कर रहा है।

माइक्रोप्लास्टिक कणों का सेवन कर रहे हम

प्लास्टिक वेस्ट हमारी सेहत को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रहा है इसका एक आंकलन सामने आया है। हाल ही के एक विश्लेषण में कहा गया है कि हर साल भोजन और सांस के जरिए हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण मानव शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक, प्लास्टिक के महीन कण होते हैं जो मानव निर्मित उत्पादों जैसे सिंथेटिक कपड़ों, टायर और कॉन्टैक्ट लेंस आदि से टूट कर बनते हैं। माइक्रोप्लास्टिक पृथ्वी पर हर जगह मिलने वाली सामग्रियों में से एक है। वे दुनिया के सबसे ऊंचे कुछ ग्लेशियरों और सबसे गहरी समुद्री खाइयों की सतह पर भी पाए जाते हैं। पिछले कई अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि कैसे माइक्रोप्लास्टिक मानव की खाद्य श्रृंखला में शामिल हो सकता है। पिछले साल सामने आए एक अध्ययन के अनुसार लगभग सभी प्रमुख बोतलबंद पानी ब्रांडों के नमूनों में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया गया था।

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भारत ने प्लास्टिक के खिलाफ शुरु किया आंदोलन

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले स्वतंत्रता दिवस के भाषण में नागरिकों से प्लास्टिक के उपयोग को छोड़ने का आग्रह किया था। उसके बाद मन की बात कार्यक्रम में नागरिकों से प्लास्टिक के खिलाफ जन आंदोलन का आह्वान किया है। 20 अगस्त को भारतीय संसद ने कहा कि वह परिसर में प्लास्टिक की वस्तुओं के उपयोग पर प्रतिबंध लगाएगी। 2 अक्टूबर से भारतीय रेलवे सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने जा रही है। प्लास्टिक के खिलाफ भारत ने आंदोलन की शुरुआत कर दी है।

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