'हम दलित हैं इसलिए हमारी चाय नहीं पियेंगे आप'
बात सिर्फ़ चाय पीने की थी.
हरिचरण सरपंच ने जो कहा था वो बात इससे कहीं आगे की थी. हंसते हुए कहे गए उनके एक छोटे से वाक्य ने एकबारगी झझकोर सा दिया था मुझे. हालांकि ऐसा नहीं था कि उस दलित ने जो कहा था, वो मैंने पहली बार सुना हो.
हरिचरण यूं ही मिल गए थे हमें राजस्थान के हिंडौन शहर में आंबेडकर नगर में. शायद यही नाम था उस मोहल्ले का!
शहर में कर्फ़्यू लागू था, सड़कों पर इक्का-दुक्का लोग बस गलियों में नज़र आ रहे थे और हर तरफ़ पुलिस की गाड़ियां और नाकेबंदी. 'घर से बाहर न निकलें, शहर में कर्फ़्यू लागू है.... ' वाली अनाउंसमेंट फिर से शुरू हो गई थी, या ये मेरा भ्रम था - उस दौरान कर्फ़्यू वाले कई शहरों में लगातार घूमता रहा था मैं और कुछ बातें जैसे ज़हन में यूं ही घूम रही थीं.
बातों-बातों में दिन में किसी अधिकारी ने बताया था कि दो अप्रैल की दलितों की रैली आंबेडकर की प्रतिमा के पास से निकली थी, तो नए शहर में, दलितों की किसी बस्ती का यही पता था मेरे पास.
शहर के एक किनारे बसे, ईंट की सड़क से होते हुए जब आंबेडकर की बल्ब की रोशनी में नहाई प्रतिमा के पास हम पहुंचें, तो ये तो यक़ीन हो गया कि जगह सही है लेकिन फिर बात करने वाले भी तो ढूंढने थे.
वहीं हमें हरिचरण और कुछ दूसरे दलित युवक मिल गए और हम कर्फ़्यू से बचने के लिए लकड़ी की टाल में जा बैठे.
बात अभी ख़त्म ही हुई थी कि ज़िला कलेक्टर के दफ़्तर से फ़ोन आ गया कि वो आ गए हैं और अगर हमें उनसे मिलना है तो हम जल्द ही वहां पहुंचे.
हरिचरण कहने लगे चाय-पानी आ रहा है पी लीजिए.
हमने कहा- नहीं-नहीं, देर हो जाएगी, और हमारा इंतज़ार भी हो रहा है तहसील कार्यालय में.
हरिचरण बोले, दो मिनट बस जिसके जवाब में मैंने कहा, फिर कभी.
बल्ब की उस टिमटिमती रोशनी में, जो उस लकड़ी की टाल में अकेला ही अंधेरे से लड़ रहा था, मैं उनके चेहरे की भावना देख तो नहीं पाया लेकिन उनकी आवाज़ अभी तक किसी-किसी वक़्त कानों में गूंज जाती है: 'अच्छा, हम दलित हैं तो हमारे घर की चाय नहीं पिएँगे.'
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