'हां, हम लड़के हैं और हमारा यौन शोषण हुआ'

यौन शोषण
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सोशल मीडिया पर हैशटैग 'मी टू' में महिलाओं ने अपने यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा किए थे और अब भी कर रही हैं.

यूनीसेफ के एक आंकड़े के मुताबिक़ दुनिया में एक करोड़ बीस लाख लड़कियां ऐसी हैं जो कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार हुई हैं.

इन लड़कियों को ये तजुर्बा 20 साल या उससे कम उम्र में झेलना पड़ा है. यानी हर 10 में से एक लड़की ने अपने जीवन में कभी न कभी यौन उत्पीड़न का सामना किया है.

लेकिन क्या सिर्फ़ महिलाएं ही यौन शोषण का सामना करती हैं? या फिर समाज में ऐसे लोग भी हैं जो लड़कों, युवकों या पुरुषों को भी निशाना बनाते हैं.

यही सवाल बीबीसी हिंदी ने अपने पाठकों से किया और उनसे पूछा कि अगर आपके साथ भी कोई ऐसा अनुभव घटा है, तो हमें लिख भेजिए.

पाठकों ने इस पर प्रतिक्रिया दी और अपने अनुभव साझा किए. इनमें से कुछ में यौन शोषण करने वाला उनका अपना रिश्तेदार या जान-पहचान का था.

बीबीसी हिंदी को मिले पुरुषों की प्रतिक्रियाओं में से कुछ ये रहीं.

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'मकान मालिक को मारना चाहता हूं'

"हां, ये पुरुषों के साथ भी होता हैं. मैं जब 20 साल का था, हम किराए के घर मे रहते थे. गर्मी में छत पे सोते थे. एक रात हमारा मकान मलिक, जिसकी उम्र 60 साल से ज़्यादा थी, वो भी छत पर सो रहा था.

उसने अपनी चटाई मेरी बाज़ू में सरका ली और मुझें सोता हुआ समझ कर उसने मेरी पैंट में हाथ डाला. ये यौन शोषण आधे घंटे चला. मेरी नींद खुल गई पर मैं डर की वजह से हिल भी ना सका. मुझे उसे थप्पड़ मारने का मन था लेकिन उस वक्त इतना कमज़ोर था कि चुप रह गया.

चूंकि मैं पुरुष हूं इसलिए मैंने भी इसे ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया और ना ही किसी को बताया. 5 साल बीत चुके हैं और हम अब ख़ुद के घर में आ गए हैं लेकिन आज भी में उसे थप्पड़ मारना चाहता हूं. लेकिन वो समाज में सम्मानित है और बुज़ुर्ग भी है, इसलिए हिम्मत नहीं होती."

'मां के फूफा ने किया यौन शोषण'

"मैं सात-आठ साल का था, मेरी मां के फूफा जी आते थे. एक बार रात को गेस्ट रूम में पहली बार उनके साथ सोया.

रात में अचानक मेरे बिस्तर पर कोई महसूस हुआ. मैंने देखा तो वो मुझे चूम रहे थे.

उन्होंने मेरे साथ अप्राकृतिक संबंध बनाए और मैं रोने लगा. अगले दिन से मैं कतराने लगा और उन्हें देखकर सहम जाता था.

कई बार उनके चंगुल में फंसा लेकिन डर और खीज की वजह से किसी को कुछ नहीं बता पाया."

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'मेरे साथ टीचर ने क्या किया'

"यह घटना साल 1993 के आसपास की है. उस समय मैं तीसरी या चौथी क्लास में था. अपने गांव के सरकारी प्राइमरी स्कूल में ही पढ़ता था. मेरे गांव से बारात बगल वाले गांव में गई थी. सर्दियों का मौसम था. मैं रात को वहीं बारात में सो गया.

रात में मैंने महसूस किया कि मेरे पीछे कोई सट रहा है और वो कोई नहीं मेरा क्लास टीचर था जो मुझे गांव के स्कूल में पढ़ाता था. फिर मेरे जागने के बाद उसने मुझे थोड़ा धमकाया. मैं कभी भी उसके खिलाफ नहीं बोल पाया.

इसके बाद उसने मेरा कई महीनों तक शोषण किया. वो मुझे स्कूल ब्रेक में रोक लेता था और लंच ब्रेक में फिर मेरा शोषण करता था. मैं आत्मविश्वास की कमी से कभी भी यह बता नहीं पाया और घुटता ही रहा. बाद में मुझे पता चला कि वो इससे पहले और भी बच्चों का शोषण कर चुका था."

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'खेत में रिश्तेदार ने रेप किया'

"मेरी उम्र 12 साल की थी जब मैं गाँव में रहता और पढ़ाई करता था. पिता जी के बताने पर खेत में कभी-कभी काम भी करता था. एक दिन मैं खेत पर था. मेरे एक रिश्तेदार खेत पर आए. उस वक़्त मैं इलेक्ट्रिक मोटर पंप चला रहा था.

वो आए और उन्होंने थोड़ी देर इधर-उधर की बात शुरू की. फिर मुझे छूने-चूमने लगे तो मैं बिलकुल घबरा गया. मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ. फिर थोड़ी देर में मेरी पैंट उतारी और मेरा रेप किया. मुझे ज़बरदस्त दर्द हो रहा था.

ये सिलसिला कई साल तक चलता रहा. मैंने आज तक यह बात किसी को नहीं बताई क्योंकि मुझे डर था की मेरी ही बदनामी होगी. और हो सकता है लोग मेरा मज़ाक़ उड़ाएं. मैं जब भी इस घटना को याद करता हूं, तो सिहर जाता हूँ."

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'जब गराज वाले ने मेरे साथ बुरा किया'

"मेरा भी यौन शोषण हो चुका है. ये बात साल 2000 की है जब मैं कॉलेज के फर्स्ट इयर मैं था. मेरा कॉलेज मेरे घर से 20 किलोमीटर दूर था. मैं बस से जाता था. एक चौराहे पर बस से उतरकर ढाई किलोमीटर पैदल चलना होता था तो मैंने सोचा कि वहां कहीं पर अपनी साइकिल रख ली जाए.

मेरे पापा चौराहे के पास गाड़ी ठीक करवाया करते थे, उनके यूनियन के लीडर का गराज था और उन्हीं से मेरी साइकिल रखने के लिए बात कर ली. वो बिना पैसे लिए साइकिल रखने को तैयार हो गए. अब जब भी मैं साइकिल रखने और लेने जाता था तो वो मुझे देख कर मुस्कुराते थे तो मैं भी मुस्कुरा देता था.

लेकिन मैं नहीं जानता था कि मुस्कराहट के पीछे क्या है. इसी प्रकार से एक महीना गुज़र गया. एक दिन उसने मुझे अपने पास बुलाया. मैकेनिक नहीं थे और अपने पास बैठा लिया. वो मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर रगड़ने लगा. मैंने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो उसने अपने दोनों हाथों से मेरा हाथ पकड़ लिया. वो बड़ा और ताकतवर था. मैं अपना हाथ छुड़ा नहीं पाया. उसने कुर्ता-पायजामा पहना था.

फिर उसने मेरे साथ जबरदस्ती की. जब मैं रोने लगा तो वो चुप करते हुए बोला की शाम को घूमने चलेंगे. कॉलेज से जल्दी आ जाना. उसने मुझसे वादा लिया कि मैं आऊंगा तभी बहुत मुश्किल से जाने दिया.

मैं फिर लौटकर नहीं गया और अपने एक दोस्त के घर पर साइकिल रख दी जो उस रस्ते पर नहीं था. अब आप ही सोचिए मैं इस बात को किसी से कहता तो कोई मेरा भरोसा ना करता. आज मुझे ये बात 17 साल बाद भी याद है. मेरे बीवी-बच्चे भी हैं और कोई ये नहीं जानता."

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'मुझे उस पुजारी से नफ़रत है'

"मैं उस वक़्त 8 साल का था और नवरात्रि में चित्रकूट के आश्रम में गया था. वहां एक पुजारी ने मेरे गुप्तांगो को छुआ. मुझे अजीब लगा लेकिन ये सिर्फ़ शुरुआत थी. उसके बाद उसकी यही हरकतें जारी रहीं. वो कभी मेरी शर्ट उतार देता. कभी मेरी पेंट.

मैं उसे रोकना चाहता था पर मैं किसी से कह नहीं पा रहा था. मेरी माँ मेरे साथ तो थीं पर वो बहुत व्यस्त रहती थीं. मैंने उन्हें बताने की कोशिश की लेकिन उन्होंने सुना ही नहीं या मैं ये कहूँ कि वो सुनना ही नहीं चाहती थीं. उन्हें शायद लगता होगा कि लड़कों के साथ यौन शोषण नहीं हो सकता.

मैं उससे डरने लगा था. मैं उससे दूर जाना चाहता था. माँ से कहता कि चलो वापस घर. समझ नहीं पाता था कि ये सब हो क्यों रहा है? मुझे उस आदमी से नफरत थी. उसने उस वक़्त मेरी आत्मा को हिला दिया था. वो उंगलियां डालने की कोशिश करता मैं चीखता. एक बार मैंने उसको काट लिया था.

इन सब बातों का अंत आखिर तब हुआ जब दशहरा के बाद हम वापस अपने घर आये. पिछले साल जब मैं 14 साल बाद उस आश्रम में गया, वही हादसा मुझे याद आया लेकिन आज भी माँ को मेरे ऊपर यकीन नहीं है कि मैंने उस उम्र में उन 8 दिनों को कितनी मुश्किल से झेला है.

मैं आज भी शायद उस हादसे को भूल नही पाया हूँ. माँ-बाप को अपने बच्चों पर यकीन करना चाहिए, क्योंकि लड़कियां ही नही लड़कों के साथ के साथ भी यौन शोषण हो सकता है. अगर बच्चा कुछ कह रहा है तो उसे सुनिये. वो झूठ नहीं बोल रहा होता. आख़िर वो आपका ही बच्चा है, किसी और का नहीं!"

नोट: ये पीड़ितों के निजी अनुभव हैं. संपादकीय नीति के तहत बीबीसी ने इनकी पहचान गोपनीय रखी है.

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