नीतीश कुमार के अंतिम दांव का इंतजार, I.N.D.I.A. में सीटों पर 'तकरार', आगे की रणनीति तैयार?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीतिक तौर पर बहुत ही ज्यादा अप्रत्याशित हैं। उनके अगले कदम के बारे में उनके साथ हमेशा रहने वाले लोग भी दावे के साथ कुछ नहीं कह सकते। जी20 डिनर के लिए उनका अचानक दिल्ली पहुंचना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत ही गर्मजोशी से मिलना इसका सबसे ताजा उदाहरण है।

एक दिन पहले तक उनके दफ्तर से भी उनके राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से विदेशी मेहमानों के लिए आयोजित रात्रिभोज में शामिल होने की पुष्टि नहीं हो पा रही थी। इसलिए, उनकी पार्टी जेडीयू 2024 के लोकसभा चुनावों तक विपक्षी दलों के इंडिया ग्रुप के साथ ही टिकी रहेगी, इसकी गारंटी देने में बड़े-बड़े सियासी पंडितों के भी पसीने छूट सकते हैं।

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इंडिया ग्रुप से मोहभंग?
वजह ये है कि इंडिया ग्रुप के सूत्रधार रहे जेडीयू सुप्रीमो अब इसके प्रति कितने गंभीर हैं, उसको लेकर आशंकाएं पैदा होने लगी हैं। बुधवार को इसकी समन्वय समिति में उन्होंने जेडीयू की ओर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन को नहीं भेजा। उनकी जगह उनके एक और लेफ्टिनेंट और बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा शामिल हुए। इस समिति में आरजेडी की ओर से डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव सदस्य हैं, जो एक दिन पहले ही इसके लिए दिल्ली पहुंच गए थे।

एक दिन पहले नीतीश के गृह क्षेत्र में सभा कर चुके हैं ललन सिंह
ललन सिंह के समन्वय समिति में नहीं भेजे जाने को लेकर तरह-तरह की अटकलें हैं। उनके डेंगू पीड़ित होने की भी बातें कही जा रही हैं। हालांकि, एक दिन पहले ही वह नीतीश के गृह क्षेत्र नालंदा जिले के हरनौत में मौजूद थे और एक बड़ी जनसभा में अपने नेता को देश के 'अगले प्रधानमंत्री' के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे थे। ललन सिंह की यह लाइन खुद नीतीश की अपनी लाइन के उलट है, जो कह चुके हैं कि उन्हें किसी पद का लालच नहीं है। अलबत्ता ये बात अलग है कि वे इंडिया ग्रुप के संयोजक भी नहीं बन पाए हैं।

नीतीश कुमार के अंतिम दांव का इंतजार
ऐसे में सवाल है कि क्या बिहार के मुख्यमंत्री किसी अगले सियासी दांव का इंतजार कर रहे हैं? क्योंकि अपनी सुविधा के हिसाब से सियासी पलटी मारने में उनकी फितरत लाजवाब है। आगे भी नीतीश ऐसा नहीं करेंगे, इसका अंजादा लगाना मुश्किल है। खासकर लोकसभा चुनावों के लिए बिहार में महागठबंधन या अभी के इंडिया ग्रुप में सीटों का तालमेल एक ऐसा मुद्दा है, जो नीतीश को फिर से एनडीए के साथ जाने को मजबूर कर सकता है।

I.N.D.I.A. में सीटों पर 'तकरार'?
जब नीतीश उस हाई-प्रोफाइल डिनर के लिए दिल्ली गए थे तो तेजस्वी ने उसी दौरान आरजेडी नेताओं के साथ लोकसभा चुनावों के सिलसिले में एक बैठक की थी। जानकारी के मुताबिक नीतीश 2024 में जेडीयू के लिए सारी सीटिंग सीटें मांग रहे हैं। तब बीजेपी-जेडीयू का गठबंधन था और दोनों बिहार की 40 में से 17-17 सीटों पर लड़ी थी। 6 सीटें दिवंगत नेता रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी को गई थी। बीजेपी, एलजेपी अपनी सारी सीटें जीत गई और जेडीयू को 16 सीटें मिलीं। यानी महागठबंधन में नीतीश को रखना होगा, तो सहयोगी दलों को उनकी 16 सीटें छोड़नी पड़ेंगी।

लेकिन, लालू यादव की पार्टी और महागठबंधन में शामिल कांग्रेस और सारी लेफ्ट पार्टियां निश्चित तौर पर सीट बंटवारे का आधार 2020 के विधानसभा चुनाव को बनाना चाहेंगी। क्योंकि, अगर नीतीश के दावे माने गए तो आरजेडी भी 16 सीटों से कम पर लड़ने के लिए तैयार नहीं होगी। इसका मतलब कांग्रेस, सीपीएम,सीपीआई, सीपीआई (एमएल)(एल) के लिए सिर्फ 8 सीटें रह जाएंगी।

सामान्य नहीं है नीतीश का दिल्ली डिनर में पहुंचना?
इस आधार पर गठबंधन होना बहुत मुश्किल लग रहा है। क्योंकि, 2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार की 243 सीटों में से आरजेडी 75, कांग्रेस 19, सीपीआई (एमएल)(एल) 12, सीपीआई 6 और सीपीएम 4 सीटों पर जीती थी। तब जेडीयू, बीजेपी के साथ थी और वह 115 सीटों पर लड़कर सिर्फ 43 सीटें ही जीत सकी थी। यह बहुत बड़ा मसला है। इसलिए नीतीश कुमार का महीनों बाद ऐसे कार्यक्रम में शामिल होना, जिसमें पीएम मोदी की प्रमुख भूमिका थी, सामान्य नहीं है। इंडिया ग्रुप में भी कहीं न कहीं इसको लेकर आशंकाएं पैदा हो चुकी हैं।

बीजेपी नीतीश पर क्यों करेगी भरोसा?
जहां तक ये बात है कि बीजेपी आखिर अब नीतीश पर भरोसा क्यों करेगी? पार्टी का प्रदेश नेतृत्व भी उनके सख्त खिलाफ है। लेकिन, तथ्य ये है कि भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व 2024 के चुनाव में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता। अगर पीएम मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को लगेगा कि नीतीश एनडीए के साथ रहेंगे और बिहार में वह 2019 वाला परिणाम दोहरा सकते हैं तो प्रदेश नेताओं का विरोध टिकना मुश्किल होगा।

नीतीश के लिए आगे की रणनीति तैयार?
अब सवाल है कि बीजेपी, जेडीयू को सीटों के मामले में कैसे एडजस्ट करेगी? अभी तक चर्चा है कि बीजेपी राज्य में 30 से ज्यादा सीटें अपने पास रख सकती है। इसका मतलब ये है कि वह जेडीयू को इंडिया ग्रुप से ज्यादा या लगभग पिछली बार जितनी सीटों का ऑफर दे सकती है। अगर इंडिया ग्रुप में गणित बिगड़ा तो यह नीतीश की अगली रणनीति का आधार हो सकता। वह ये कहकर उससे बाहर हो सकते हैं कि जितनी सीटें हमारे पास है, उतना भी नहीं मिल रहा था।

नीतीश क्यों छोड़ सकते हैं इंडिया?
इसके अलावा जेडीयू और आरजेडी के बीच आए दिन जो खटपट की खबरें आती हैं, उसके पीछे नीतीश की अपनी सियासी असहजता है। जैसे 2017 में रेलवे के जमीन के बदले जॉब घोटाले में तेजस्वी का नाम आया था तो वे बिदक कर गठबंधन से बाहर हो गए थे। लेकिन, इस बार उनपर चार्जशीट हो चुकी है और उन्हें उनका बचाव करना पड़ रहा है।

बिहार की राजनीति में 'पिक्चर अभी बाकी है!'
यही नहीं, नीतीश बिहार में जिस कुर्मी-कोइरी जाति की राजनीति करते आए हैं, उसमें कोइरी समाज के दो बड़े दिग्गज अब बीजेपी में हैं या बीजेपी के (सम्राट चौधरी और उपेंद्र कुशवाहा) साथ हैं। नीतीश खुद कुर्मी समाज से हैं और इस जाति के भी एक दिग्गज और कभी उनके खास रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह भी भाजपा में चले गए हैं। मतलब, नीतीश का अपना खुद का ठोस जनाधार आज हिला हुआ है। ऐसे में इंतजार के अलावा कोई उपाय नहीं है। या यूं कहिए कि बिहार की राजनीति में 'पिक्चर अभी बाकी है!'

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