विश्वकर्मा योजना का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा, बीजेपी को मिलेगा कितना फायदा?
ऐसे समय में जब बिहार में जातिगत सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर लग गई है, विश्वकर्मा योजना बीजेपी के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक कदम साबित हो सकता है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका लाभ अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) को मिलने की बात कही है।
अगर हम विश्वकर्मा योजना में शामिल किए गए पारंपरिक कला, कारिगर और शिल्पकारों के 18 तरह के पेशों को बारीकी से देखें तो ये समाज में किसी न किसी खास जाति से ताल्लुक रखते हैं। इनमें से अधिकतर ओबीसी में से भी अति पिछड़ी जातियां शामिल हैं और कुछ अनुसूचित जातियों से भी जुड़ी हुई हैं।

पारिवारिक व्यवसाय में लगे लोगों को लाभ देने की कोशिश
दरअसल, विश्वकर्मा योजना का आधार ऐसे पारंपरिक पेशे को बनाया गया है, जो आमतौर पर पारिवारिक व्यवसायों से जुड़े हैं। इसमें जुड़े लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी से एक ही तरह के काम करते आ रहे हैं। इनमें से बड़ी आबादी ऐसी भी है, जो हाल के समय में किसी न किसी वजह से अपने पारंपरिक रोजगार को छोड़कर दूसरी ओर देखने को मजबूर हुए हैं। इस नई योजना के लागू होने के बाद वह फिर से अपने पारिवारिक व्यवसाय की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
समाज के इन लोगों होगा फायदा
जैसे कि इस योजना का लाभ लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई, लोहे का काम करने वाले लोहार, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, आभूषणों के निर्माण में जुड़े व्यवसायी सुनार, दर्जी, नाई, कंस्ट्रक्शन का काम करने वाले राजमिस्री, चमड़े के कारोबार से जुड़े चर्मकार, फूल-माला का काम करने वाले माली, बांस, बेंत से चीजें बनाने वाले, झाड़ू बनाने वाले, कपड़े धोने वाले धोबी, मूर्तिकला में माहिर लोगों आदि को मिलने वाला है।
बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है ये 'वोट बैंक'
इनमें से कई पारंपरिक पेशेवर समाज प्रभावशाली ओबीसी जातियों के मुकाबले ज्यादा पिछड़ी जातियों के लोग हैं। अगर बीजेपी के नजरिए से देखें तो खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में वह इसी वोट बैंक पर फोकस करना चाहती है।
कौन है विश्वकर्मा समाज ?
एक बात और भी गौर करने वाली है। इस योजना की औपचारिक लॉन्चिंग की तारीख 17 सितंबर यानी विश्वकर्मा जयंती को रखी गई है। भगवान विश्वकर्मा को भौतिक चीजों के सृजन और निर्माण का देवता माना जाता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देने वाले ये तमाम तरह के पारंपरिक कारीगरों के लिए भी विश्वकर्मा आराध्य देव हैं। मसलन, बिहार में तो खासकर बढई जाति के लोग अपना टाइटल भी अक्सर विश्वकर्मा ही रखते हैं।
जातिगत सर्वे की बढ़ने लगी है मांग
इन सब तथ्यों के बीच सबसे बड़ी बात ये है कि मोदी सरकार इस योजना पर तब अमल कर रही है, जब बिहार में जातिगत सर्वे को देखते हुए विपक्षी इंडिया गठबंधन की ओर से दूसरे राज्यों में भी इसकी मांग बढ़ती जा रही है। कांग्रेस को भी इस राजनीति में फायदा दिखने लगा है। क्योंकि, अभी केंद्रीय नौकरियों और दाखिलों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण की व्यवस्था है। जबकि, ओबीसी जातियों का दावा कि उनकी आबादी इससे कहीं अधिक है।
एक बात और ध्यान देने लायक है कि जस्टिस रोहिणी आयोग ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी है। इसका गठन मूल रूप से यह पता लगाने के लिए किया गया था कि ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने में अभी तक इस लिस्ट में शामिल कौन सी जातियां पिछड़ी रह गई हैं। क्योंकि, इस आरक्षण व्यवस्था का लाभ कुछ प्रभावशाली ओबीसी जातियों को ही ज्यादा मिला है। विश्वकर्मा योजना का फायदा जिन लोगों को मिलने वाला है, उनमें से अधिकतर वही जातियां हैं, जिन्हें अबतक ओबीसी आरक्षण का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है।
इन सारे पहलुओं को देखने से लगता है कि बीजेपी अपने अति-पिछड़े ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में प्रभावी तरीके से पहल करने में जुटी हुई है। हालांकि, जातिगत जनगणना जैसे कदमों से उसकी कोशिशों पर क्या असर पड़ेगा, इसका अनुमान अभी लगाना कठिन है।
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