#GirishKarnad: एक खत ने बदल दी थी गिरीश कर्नाड की जिंदगी, कुछ ऐसे शुरू हुआ था फिल्मी सफर

बेंगलुरू। मशहूर फिल्म अभिनेता गिरीश कर्नाड अब हमारे बीच नहीं रहे, सोमवार सुबह उन्होंने बेंगुलुरू के अस्पताल में अंतिम सांस ली, वो 81 वर्ष के थे और काफी वक्त से बीमार चल रहे थे, उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग के अलावा नाटक, स्क्रिप्ट राइटिंग और निर्देशन में अपना हाथ आजमाया और वो खासे सफल भी रहे। कुछ वक्त पहले गिरीश कर्नाड ने कहा था कि उनकी जिंदगी एक खत के कारण बदल गई थी, दरअसल जब मैं 17 साल का था, तब मैंने आइरिस लेखक 'सीन ओ कैसी' की स्केच बनाकर उन्हें भेजा, तो उसके बदले उन्होंने मुझे एक लेटर भेजा था, जिसमें लिखा था कि ये सब काम करके कुछ हासिल नहीं होने वाला, कुछ ऐसा करो जिससे लोग तुम्हारा ऑटोग्राफ लें।

जन्म एवं शिक्षा

जन्म एवं शिक्षा

गिरीश कर्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था, उनको बचपन से ही नाटकों में रुचि थी, स्कूल के समय से ही थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था, उन्होंने 1970 में कन्नड़ फिल्म संस्कार से बतौर स्क्रिप्ट अपने करियर की शुरूआत की थी, गिरीश ने कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की थी, इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर भारत लौट आए, चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में इन्होंने सात साल तक काम किया था लेकिन इस दौरान जब काम में मन नहीं लगा तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया और फिर इन्होंने थिएटर को अपना पूरा वक्त दे दिया।

पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित थे कर्नाड

पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित थे कर्नाड

गिरीश की कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा दोनों में लेखनी समानाधिकार से चलती थी। 1998 में ज्ञानपीठ सहित पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों के विजेता गिरीश द्वारा रचित तुगलक, हयवदन, तलेदंड, नागमंडल और ययाति जैसे नाटक अत्यंत लोकप्रिय हुए जिनका भारत की अनेकों भाषाओं में इनका अनुवाद और मंचन हुआ था।

फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था

फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था

ग‍िरीश कर्नाड को 1978 में आई फिल्म 'भूमिका' के लिए नेशनल अवॉर्ड मिला था, उन्हें 1998 में साह‍ित्य के प्रत‍िष्ठ‍ित ज्ञानपीठ अवॉर्ड से नवाजा गया था, ग‍िरीश कर्नाड ऐसे अभ‍िनेता हैं ज‍िन्होंने कर्मश‍िल स‍िनेमा के साथ समानांतर स‍िनेमा के ल‍िए भी जमकर काम किया, अगर उन्होंने आर्ट फिल्मों में अपने अभिनय से लोगों को चौंकाया था तो वहीं उन्होंने कमर्शियल सिनेमा में अपनी एक्टिंग से लोगों से गुदगुदाया भी है।

कन्नड़ सिनेमा का पहले प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड जीता था

कन्नड़ सिनेमा का पहले प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड जीता था

गिरीश ने कन्नड़ फिल्म संस्कार(1970) से अपना एक्टिंग और स्क्रीन राइटिंग डेब्यू किया था, इस फिल्म ने कन्नड़ सिनेमा का पहले प्रेजिडेंट गोल्डन लोटस अवार्ड जीता था, बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म 1974 में आयी 'जादू का शंख' थी, गिरीश कर्नाड को सलमान खान की फिल्म एक था टाइगर' और 'टाइगर जिंदा है' के लिए जाना जाता है। 'वंशवृक्ष' नामक कन्नड़ फ़िल्म से इन्होंने निर्देशन की दुनिया में कदम रखा था, इसके बाद इन्होंने कई कन्नड़ तथा हिन्दी फ़िल्मों का निर्देशन तथा अभिनय भी किया।

टीवी पर भी मचाया था धमाल

आर के नारायण की किताब पर आधारित टीवी सीरियल मालगुड़ी डेज़ में उन्होंने स्वामी के पिता की भूमिका निभाई थी तो वहीं 1990 की शुरुआत में विज्ञान पर आधारित एक टीवी कार्यक्रम 'टर्निंग पॉइंट' में उन्होंने होस्ट की भूमिका निभाई थी।

ये रहीं फिल्में

उनकी मशहूर कन्नड़ फ़िल्मों में से तब्बालियू मगाने, ओंदानोंदु कलादाली, चेलुवी, कादु और कन्नुड़ु हेगादिती हैं तो वहीं हिंदी में इन्होंने 'निशांत' (1975), 'मंथन' (1976) और 'पुकार' (2000) जैसी फ़िल्में कीं, नागेश कुकुनूर की फ़िल्मों 'इक़बाल' (2005), 'डोर' (2006), '8x10 तस्वीर' (2009) और 'आशाएं' (2010) में भी उन्होंने काम किया. इसके अलावा सलमान ख़ान के साथ वो 'एक था टाइगर' (2012) और 'टाइगर ज़िंदा है' (2017) में अहम किरदार में नजर आए थे।

पुरस्कार और उपाधियां

पुरस्कार और उपाधियां

साहित्य के लिए

  • 1972: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
  • 1974: पद्मश्री
  • 1992: पद्मभूषण तथा कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • 1994: साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • 1998: ज्ञानपीठ पुरस्कार

सिनेमा के क्षेत्र में

  • 1980 फिल्मफेयर पुरस्कार - सर्वश्रेष्ठ पटकथा - गोधुली (बी.वी. कारंत के साथ)
  • इसके अतिरिक्त कई राज्य स्तरीय तथा राष्ट्रीय पुरस्कार।

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