रामदेव की कंपनी दिव्य फार्मेसी को कोर्ट ने दिया झटका, मुनाफा साझा करने का आदेश

नई दिल्ली। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी की याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में उत्तराखंड बायोडायवर्सिटी बोर्ड के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमे बोर्ड द्वारा कहा गया था कि वह बायोलॉजिकल डायवर्सिटि एक्ट 2002 के तहत दिव्य फार्मेसी के उपर फीस लगाएगी। लेकिन रामदेव की कंपनी की ओर से कहा गया कि उनकी कंपनी पूरी तरह से स्वदेशी है लिहाजा वह इस एक्ट के तहत वह मुनाफे में कोई साझेदारी नहीं करेगी। लेकिन बोर्ड ने कहा कि अगर स्वदेशी और विदेशी कंपनी के बीच भेदभाव किया जाएगा तो फेयर एंड एक्विटेबल बेनिफिट्स शेयरिंग की मूल भावना को ठेस पहुंचेगी।

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मुनाफा साझा करें

आपको बता दें कि दिव्य फार्मेसी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के तहत बिजनेस कर रही है, इसकी स्थापना 1995 में की गई थी। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार 50000 किलोग्राम औषधियों की मदद से 2 करोड़ उत्पादों का निर्माण हर रोज कर सकती है। इसका लक्ष्य है कि किसानोनं और गरीबी और कर्ज से मुक्त कराना और उन्हें उनके उत्पादन की बेहतर कीमत मुहैया कराना। कोर्ट ने 21 दिसंबर के अपने अहम फैसले में कहा कि जैविक संसाधनों पर सिर्फ देश की संपत्ति नहीं है बल्कि इसपर स्थानीय, स्वदेशी और स्थानीय समुदाय के लोगों का भी अधिकार है। जोकि अपनी परंपराओं को जीवित रखते हैं, लिहाज देश और विदेश दोनों को ही इन संसाधनों से होने वाले लाभ का फायदा इन्हें देना चाहिए।

फैसले को देंगे चुनौती

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दिव्य फार्मेसी पर एफईबीएस फीस लगा सकती है और उसे इसका अधिकार है। हालांकि कोर्ट ने यह बोर्ड पर छोड दिया है कि वह चाहे तो फार्मेसी से पहले के मुनाफे पर भी फीस वसूल सकता है या फिर वह मौजूदा समय से होने वाले मुनाफे पर फीस वसूल सकता है। वहीं कोर्ट के फैसले के बाद दिव्य फार्मेसी के वकील आर पार्थसारथी ने कहा कि हम दिविजन बेंच के सामने कोर्ट के फैसले को चुनौती देंगे।

कोर्ट पर था भरोसा

वहीं यूबीबी बोर्ड के संग्राम सिंह ने कहा कि हमे इस बात का पूरा भरोसा था कि हाई कोर्ट उनके पक्ष में यह फैसला सुनाएगा। पहले से ही 30 कंपनियों ने एफईबीएस के साथ करार किया है। हमने इन कंपनियों को विकल्प दिया है कि वह खुद ही अपने मुनाफे के अनुसार फीस दें या फिर हमे ऑडिट करने का मौका दीजिए।

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