UP Lok Sabha Chunav: क्या माफिया मुख्तार की मौत से गाजीपुर में सपा को सहानुभूति मिलेगी?
Uttar Pradesh Lok Sabha Election: यूपी में पूर्वांचल का गाजीपुर जिला आजादी के बाद से सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन की वजह से कुख्यात था। पिछले दो-ढाई दशकों में यह माफियाओं की वजह से कुख्यात हो चुका है। दो महीने पहले गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी की जेल में हुई मौत के बाद भी वह मौजूदा चुनाव में एक प्रभावी मुद्दा बनकर छाया हुआ है।
मुख्तार का भाई और सपा का उम्मीदवार अफजाल अंसारी 2019 में गाजीपुर लोकसभा सीट पर ही बसपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। उस चुनाव में सपा-बसपा में गठबंधन था। इस बार समाजवादी पार्टी इंडिया ब्लॉक का हिस्सा है, जिसमें कांग्रेस भी सहयोगी है।

मुख्तार की मौत पर सहानुभूति के भरोसे अफजाल
अफजाल अंसारी का मुख्य चुनावी मुद्दा उनके भाई की मौत है। वह हर चुनावी सभा में दावा करते हैं कि उनके भाई मुख्तार को जेल में जहर दिया गया। इस आधार पर वह मतदाताओं का सहानुभूति बटोरने की भरसक कोशिशों में जुटे हैं। वह अपने समर्थकों से अपील करते हैं कि 'उत्पीड़न' करने वालों को सबक सिखाने की जरूरत है।
वे अपने समर्थकों से कहते हैं, 'बीजेपी की वजह से मुख्तार और उनके परिवार को जो भुगतना पड़ा है और जिस तरह का बर्ताव हुआ है, उसके लिए गाजीपुर के लोग बीजेपी को सबक सिखाएंगे।'
अफजाल को भी गैंगस्टर ऐक्ट में मिल चुकी है सजा
वैसे सपा प्रत्याशी के एक पांव पहले से ही जेल में पड़े हुए हैं। क्योंकि, अफजाल को भी गाजीपुर एमपी-एमएलए कोर्ट ने गैंगस्टर ऐक्ट के तहत चार साल की सजा सुना रखी है। यह मामला अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित है और अगर अदालत ने उनकी सजा बरकरार रखी तो उन्हें चुनावी मैदान छोड़ना पड़ सकता है। इसके लिए एक बैकअप प्लान तैयार रखा गया है और उनकी बेटी नुसरत अंसारी को निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन कराया गया है।
अफजाल ने 2019 से पहले 2004 में भी यहां से जीत दर्ज की थी। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक राजनीतिक विश्लेषक श्रीकांत पांडे का कहना है कि क्षेत्र में अफजाल और उसके भाइयों और खासकर मुख्तार की लोकप्रियता की कई वजहें हैं। उनके मुताबिक, 'उसे सहानुभूति मिलने की उम्मीद तो है ही, अफजाल का चुनाव मैनेजमेंट भी अच्छा है। और इस बार तो उसे समाजवादी पार्टी के वोट बैंक का भी समर्थन हासिल है।'
गाजीपुर में तीन बार भाजपा को मिल चुकी है जीत
गाजीपुर सीट पर अंसारियों का दबदबा स्पष्ट दिखता है। लेकिन, सच्चाई ये भी है कि फिर भी इस सीट पर भाजपा के मनोज सिन्हा 1996, 1999 और 2014 में चुनाव जीत चुके हैं। उनकी ओर से क्षेत्र में किए गए विकास कार्यों की वजह से वह स्थानीय लोगों में 'विकास पुरुष' के नाम से जाने जाते हैं।
भाजपा प्रत्याशी को मनोज सिन्हा की लोकप्रियता का भी सहारा
2014 से 2019 के बीच मनोज सिन्हा के कार्यकाल में क्षेत्र ने कई विकास कार्य देखे हैं। 2019 में उनकी हार के बाद केंद्र सरकार ने उन्हें जम्मू और कश्मीर का उपराज्यपाल बना दिया। लेकिन, क्षेत्र से उनका कनेक्शन कभी कम नहीं हुआ। बीजेपी के मौजूदा प्रत्याशी पारसनाथ राय उनके बहुत ही भरोसेमंद चेहरे हैं। संघ से जुड़े राय खुलकर कहते हैं कि उन्हें मनोज सिन्हा की वजह ही टिकट मिला है।
भाजपा यहां विकास और 'गुंडाराज' खत्म करने को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाए हुए है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी यहां पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में इसी लाइन पर बैटिंग करके बड़ी जीत सुनिश्चित करने की अपील की है।
गाजीपुर में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो सिन्हा के कार्यकाल में यहां रेल, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति की गवाही दे रहे हैं। लेकिन, पिछले पांच वर्षों में यह सब रुका है, जिसके लिए अफजाल की दलील है कि उनकी पार्टी की सरकार नहीं होने की वजह से वह विकास नहीं कर पाए हैं।
सपा को अपने जातीय समीकरण पर यकीन
कुल मिलाकर गाजीपुर में आखिरकार 1 जून को जब मतदान होगा तो जातीय समीकरण ही जीत और हार तय करेगा, इसकी संभावना अभी से स्पष्ट है। क्षेत्र के 20.7 लाख वोटरों में यादव और दलित वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा यानी 3.5 लाख है। सपा को लगता है कि पिछली बार बसपा से जीतने की वजह से अफजाल को अभी भी उसके कैडर का समर्थन हासिल है। इसमें अगर 1.5 लाख से ज्यादा मुस्लिम वोटरों को जोड़ दे दें तो उसका गुणा-गणित फिट हो जाता है।
भाजपा को भी मजबूत लग रहा है अपना किला
लेकिन, इस सीट पर ठाकुर, बिंद, कुशवाहा जातियों में से भी प्रत्येक की संख्या 1.5 लाख से अधिक है। इसके अलावा क्षेत्र में एक-एक लाख से अधिक ब्राह्मण और वैश्यों की भी आबादी है। बीएसपी ने यहां से उमेश सिंह को मौका दिया है, लेकिन उनके सामने पार्टी के कैडर वोट को ही जुटाने की चुनौती दिख रही है।
गाजीपुर में होगी कांटे की टक्कर!
भाजपा से जुड़े लोगों का कहना है कि मुख्तार के जाने के बाद अब क्षेत्र के मतदाताओं में अंसारियों का खौफ खत्म हो चुका है और वह अब निडर होकर चुनाव में हिस्सा लेंगे। इस तरह से गाजीपुर में इस बार का मुकाबला एकतरफा नहीं है और सपा और बीजेपी में काटें की टक्कर दिख रही है।












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