उत्तर प्रदेश में फिर हावी हुई जाति की राजनीति?
लखनऊ। 8 अप्रैल को जैसे ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बतौर अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या के नाम की घोषणा की वैसे ही कई सियासी दलों की धड़कनें बढ़ गईं। धड़कनें इस लिये नहीं बढ़ीं कि केशव एक विकास पुरुष हैं, धड़कने इस लिये तेज हुईं क्योंकि वो बसपा, सपा, कांग्रेस का एक बड़ा वोटबैंक काट सकते हैं।
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और सुनिये एक ओर सत्तारूढ़ पार्टी समेत अन्य दल अति पिछड़े वर्ग को अपने खेमे से सरकता हुआ पा रहे हैं। दूसरी ओर सवर्ण के लिहाज से भाजपा खेमें की ओर से हो या फिर अन्य राजनीतिक दलों की ओर से आदित्यनाथ के नाम पर आशंकाएं प्रबल हैं। यदि इसी तर्ज पर बीजेपी ने अपने सियासी किले की रचना की तो निश्चित तौर पर सपा, बसपा के लिए भाजपा की व्यूह रचना को भेद पाना काफी कठिन होगा।
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सूबे में चुनावी सरगर्मियां बढ़ने लगी हैं, लोग चर्चा कर रहे कि आखिर जातीय गणित क्या होगा। कौन किस तरफ जा सकता है। कुलमिलाकर ऐस तमाम सवाल हैं, जिनके जवाबों को जनता जानना चाहती है। इन्हीं सवालों के जवाबों के लिए हमने हर संभव पहलू की पड़ताल की।
सियासत 'माइनॉरिटी' बनाम 'मेजॉरिटी' की
उत्तर प्रदेश में अभी तक के सभी मुख्यमंत्रियों की सूची पर यदि निगहबानी की जाए तो पता चलता है कि अब तक 20 में 14 मुख्यमंत्री सवर्ण रहे हैं। आजादी के बाद शायद ही कोई जातिगत गठजोड़ की बात पर गौर भी करता था। लेकिन उस वक्त की तस्वीर में ये देख पाना संभव है कि सूबे की राजनीति ठाकुर बनाम ब्राह्मण के साथ ही एक ओर बनिया को भी लेकर चलती थी। पर, आज तस्वीर कुछ अलग है। शब्द भी भिन्न हो गए हैं।
राजनीति में बनाम के आगे पीछे माइनॉरिटी और मेजॉरिटी फिट किया जाने लगा है। हालांकि पिछड़ा वर्ग और दलित वोट बैंक खेमे को साधने की खातिर पूरी जुगत लगाई जाती है। उदाहरण के तौर पर समझ लीजिए भाजपा का अंबेडकर के रूप में दलित कार्ड, राजा गंगा बख्श रावत का विजय दिवस सम्मान समारोह। एवं बसपा काल में हरिजन एक्ट की तमाम जुबानियां।
इसके पीछे कारण यह है कि करीबन पिछले ढाई दशक पहले पिछड़ों और दलित राजनीति के उफान ने सवर्णों की तनी हुई चाल को सामान्य अवस्था में लाकर भिन्न भिन्न जातियों का एक मंच तैयार कर दिया।
'दलितों' को लुभाने की कोशिश
रोहित वेमुला मामले पर बसपा सुप्रीमो ने कहा कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर की विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों को सरकार निशाना बना रही है और उन्हें तरह-तरह से परेशान कर रही है। इस बयान से सीधे तौर पर समझा जा सकता है कि हिमायत रोहित वेमुला की नहीं अपितु जातीय वोटबैंक की हो रही है।
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इस क्रम में राहुल गांधी भी कन्हैया के साथ उसकी आजादी की मांग में शरीक हुए, मकसद एकदम साफ था। दलित, पिछड़े वर्ग को लुभाना। जबकि इन तमाम दलित हिमायती पेशेवराना वादों में सपा भी पीछे नहीं रही। मुलायम सिंह ने भी वादा किया कि वे 17 अति पिछड़ा वर्ग की जातियों को दलित का दर्जा देंगे। मतलब साफ है सियासत जारी है। हां इसे जातीय सियासत कहा जाए तो शायद समझ पाना ज्यादा बेहतर होगा।
सपा और बसपा को नुकसान
ब्राह्मण, ठाकुर और भूमिहार की तुलना में प्रदेश में वैश्य और बनिया समुदाय की आबादी कम है। हालांकि आर्थिक मजबूती की वजह से पार्टियां इन्हें शरीक करने से बिलकुल भी नहीं चूकती। आगामी विधानसभा चुनाव में कुर्मी जाति अहम भूमिका निभाएगी।
कुर्मी जाति की दमदार मौजूदगी जहानाबाद, फतेहपुर, संत कबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर और बस्ती जिलों में देखी जा सकती है। इन जिलों में कुर्मी मतदाता 6 से 10 फीसदी तक है। जिन्हें साधने के लिए केशव मौर्या को जिम्मेवारी सौंप दी गई है।
जातिगत गणित की एक और तस्वीर
कुर्मी मतदाताओं के इतर लोधी मतदाता भी उत्तर प्रदेश में एक बड़े वोट बैंक के तौर पर देखे जा सकते हैं। जिन्हें अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा खेमे से मुख्यमंत्री के तौर पर कल्याण सिंह के नाम को भी उछाला जा रहा है। माना जाता है कि कल्याण सिंह सूबे में लोध बिरादरी के लिए सबसे बड़ा चेहरा हैं। हालांकि इन सबके इतर इस वोट बैंक को हथियाने के लिए उन्नाव सांसद साक्षी महाराज समेत उमा भारती भी निश्चित तौर पर चुनाव प्रसार में सक्रिय नजर आ सकते हैं।
ठाकुर 'भाजपा' के साथ तो यादव फिर से 'सपा'
गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मथुरा, आगरा, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, सुल्तानपुर, बांदा, चित्रकूट, इटावा, कन्नौज के लिए सामान्यतया माना जाता है कि यहां यादवों के साथ ठाकुर तीसरे सबसे बड़े वोट बैंक के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं।
मौजूदा गणित के आधार पर कहें या फिर तस्वीर के मुताबिक, आशंकाओं के हवाले से कहा जा रहा है कि यादव समुदाय एक बार फिर सपा के साथ जबकि भाजपा के समर्थन में ठाकुर समुदाय नजर आएगा।
सपा से मुसलमानों का मोहभंग
जनता के मुताबिक हिमायती बनकर दिखावा करने वाली सपा सरकार से मुसलमानों का भी मोहभंग हो चुका है, इसमें कोई दो राय नहीं है। जिस बिरादरी को आजम के दम पर सपा समेटने की कोशिश करती थी, कहीं न कहीं वही बिरादरी आजम की वजह से ही बंट चुकी है। जिसके बाद ये तो तय है कि सपा से जिन लोगों का मोहभंग हुआ है वे किसी न किसी दल की ओर पलायन जरूर करेंगे। हां देखना दिलचस्प होगा कि वे चुनाव किसका करते हैं।
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