उत्तर प्रदेश चुनाव से क्यों है लापता सीएए एनआरसी हिंसा में मरने वाले 23 लोगों का मुद्दा

मोहम्मद निसार
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मोहम्मद निसार

20 जनवरी को उत्तर प्रदेश विधानसभा के तीसरे चरण की वोटिंग से चंद दिनों पहले जब हम फ़िरोज़ाबाद पहुंचे तो वहां भाजपा, सपा, बसपा, कांग्रेस, सभी पार्टियां जमकर प्रचार में जुटी थीं.

विकास, बेरोज़गारी, महंगाई, चूड़ी के व्यापार में मंदी, मूलभूत सुविधाओं की हालत, इन सब मुद्दों का नेताओं के चुनावी भाषणों और प्रचार सामग्रियों में सभी का ज़िक्र था.

जो हर चुनावी बातचीत से गायब था वो था उन सात परिवारों के ज़ख्म का ज़िक्र जिनके अपने परिवार के लोग 20 दिसंबर 2019 को फ़िरोज़ाबाद की सड़कों पर मारे गए थे. ऐसे में जब चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध ये शहर लोकतंत्र के सबसे बड़े दिन के लिए तैयारी कर रहा था, दुख में डूबे ये परिवार महीनों बाद भी न्याय की आस लगाए बैठे हैं.

करीब सवा दो साल पहले की उस दिसंबर में उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर बिजनौर, रामपुर, वाराणसी, लखनऊ, कानपुर, फ़िरोज़ाबाद और संभल में नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में हिंसा में 23 लोगों की मौत हुई थी.

फ़िरोज़ाबाद और कानुपर में हम छह परिवारों से मिले जिनका कहना था कि न ही आज तक उन्हें प्रशासन की तरफ़ से कोई मदद मिली है, ना ही मामले की व्यापक जांच हुई और न ही चुनाव प्रचार में कोई पार्टी या नेता उन्हें न्याय दिलाने की बात कर रहा है.

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नूर मोहम्मद
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नूर मोहम्मद

चूड़ी के काम से जुड़े छोटे-छोटे घरों से पटी कादरी मस्जिद कश्मीरी गेट की संकरी गलियों में से एक में रह रहे मृतक राशिद के पिता नूर मोहम्मद से मेरी मुलाकात जब उनसे हुई तो उन्होंने डूबती आवाज़ में कहा, "कोई सुनवाई नहीं है हमारी. हम लोकल वकीलों के पास जाते हैं बस. कोई पार्टी नहीं आई. ऐसे कैसे वोट डालें. वोटों के लिए तो पार्टी वाले आ जाएंगे लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही है."

दमे की बीमारी की वजह से कानपुर के मोहम्मद शरीफ़ को चलने फिरने से सांस फूलने लगती है. अपने बेटे मोहम्मद रईस की मौत पर वो कहते हैं, "हम गरीबों के लिए इंसाफ़ नहीं है. अभी तक एफ़आईआर नहीं हुई है."

उनके नज़दीक ही बैठे मोहम्मद तक़ी ने अपने 26 साल के बेटे मोहम्मद सैफ़ को खोया है. वो कहते हैं, "हमको पैसा-दौलत नहीं, इंसाफ़ चाहिए."

'नहीं भूलता वो दिन'

वो शुक्रवार था और उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों की तरह फ़िरोज़ाबाद में भी हालात ख़राब थे.

सीएए-एनआरसी से नाराज़ लोग कई शहरो में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, और फ़िरोज़ाबाद के मसरूरगंज मोहल्ले के रहने वाले मोहम्मद निसार को भी शहर के हालात खराब होने की खबर मिल रही थी.

उस दिन निसार घर पर ही थे जब दोपहर करीब साढ़े तीन बजे स्थानीय लोगों ने उन्हें बताया कि उनके भाई 45-वर्षीय भाई शफ़ीक़ को गोली लगी है और वो नैनीकलां चौराहे पर खून से लथपथ अवस्था में हैं.

कानपुर पुलिस स्टेशन
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कानपुर पुलिस स्टेशन

निसार के मुताबिक शफ़ीक़ नैनीकलां चौराहे पर स्थित उनके एक दूसरे मकान में रह रहे अपने छोटे भाइयों को छत से नीचे उतारकर वापस अपने घर आ रहे थे जब "गेट पर ही (उन्हें) गोली लग गई."

घर की सीढ़ियों से उतरकर मोहल्ले की संकरी गलियों से दौड़ते-भागते निसार जब चौराहे पर पहुंचे तो वहां अफ़रा-तफ़री का माहौल था.

निसार ने अपने मोबाइल पर सेव उसी वक्त शूट किए एक मोबाइल वीडियो को दिखाया जिसमें लोगों से घिरे और खून से लथपथ शफ़ीक़ अर्धनग्न अवस्था में सड़क पर पड़े नज़र आते हैं.

निसार के मुताबिक उनके भाई को "सिर पर गोली लगी थी" और उनका दावा है कि उन्होंने खुद पुलिस को चौराहे के आसपास गोलियां चलाते देखा.

20 दिसंबर 2019 की घटना के कुछ दिनों बात ही 'द प्रिंट' से बातचीत में उन दिनों फ़िरोज़ाबाद के एसएसपी सचिंद्र पटेल ने कहा था, "पुलिस की तरफ़ से कोई फ़ायरिंग नहीं हुई. एक भी गोली नहीं चलाई गई है. गोलियां प्रदर्शनकारियों की तरफ़ से ही चली हैं. 20 तारीख़ को हुई हिंसा में पुलिस के 60 जवान घायल हुए हैं."

सग़ीर खान
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सग़ीर खान

शफ़ीक़ को "सीने से लगाकर" उनके भाई इलाज के लिए पहले उन्हें फ़िरोज़ाबाद और फिर आगरा के अस्पताल ले गए मगर निसार के मुताबिक डॉक्टरों ने वहां कथित तौर पर शफ़ीक़ का इलाज करने से मना कर दिया जिसके बाद उन्हें दिल्ली के सफ़दरगंज अस्पताल ले जाया गया जहां छह दिन बाद उनकी मौत हो गई.

निसार कहते हैं, "जब ट्रीटमेंट नहीं मिलेगा तो मरीज़ कहां से जीवित रहेगा. ज़ाहिर सी बात है उसे मरना है."

अपने घर की पहली मंज़िल के एक छोटे से कमरे में उन्होंने बताया, "मुझे न्याय चाहिए और मुझे मेरा हक़ चाहिए. मेरा बेकसूर भाई चला गया."

चुनाव प्रचार में कोई ज़िक्र नहीं

नागरिकता संशोधन कानून
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नागरिकता संशोधन कानून

मोहम्मद शफ़ीक़ के अलावा उस दिन फ़िरोज़ाबाद में मोहम्मद हारून, नबी जान, मुक़ीम, अबरार, अरमान और राशिद भी मारे गए.

उत्तर प्रदेश चुनाव में जहां 'जिन्ना' से लेकर 'गर्मी निकाल देने' तक पर बहस चल रही है, वहां 20 नवंबर 2019 की घटना में मारे गए लोगों के परिवारों का कहना है कि चुनाव के शोर से उनका दर्द नदारद है, और न्याय की राह भी नज़र नहीं आ रही है.

फ़िरोज़ाबाद में पीड़ितों के वकील शगीर ख़ान के मुताबिक मामले में दर्ज छह एफ़आईआर में क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी गई है.

वो पूछते हैं, "पुलिस पुलिस की जांच कैसे कर सकती है? जबकि यहां मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए, हाईकोर्ट का रिटायर्ड जज जांच करे तो इंसाफ़ की उम्मीद लगाई जा सकती है."

कानपुर में तीन मृतकों के वकील मोहम्मद आरिफ़ खान के मुताबिक वहां तीनों मामलों में एफ़आईआर भी नहीं हुई है और पुलिस ने कहा कि लोग देसी हथियार लेकर आए जिसकी वजह से मौत हुई.

मोहम्मद आरिफ़ खान ने बताया कि उन्होंने निचली अदालत से प्रार्थना की थी कि तीन मृतकों के मामले में कथित तौर पर शामिल पुलिसकर्मियों के ऊपर हत्या का चार्ज बनाते हुए अभियोग दर्ज किया जाए या उनके ऊपर प्राथमिकी दर्ज की जाए लेकिन अदालत ने उनकी प्रार्थना को खारिज कर दिया.

समसुन निसा
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समसुन निसा

फ़ैसले का इंतज़ार

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मामले पर याचिकाएं, गैर-सरकारी संगठनों की रिपोर्टें आदि दाखिल हुए और सरकार ने भी जवाब दिया, लेकिन मामले में एमिकस क्यूरी वकील एस फ़रमान अहमद नक़वी के मुताबिक सात-आठ बार सुनवाई के बाद पिछले करीब डेढ़ साल से कोविड के कारण आगे सुनवाई नहीं हो पाई है और अभी तक कोई फैसला नहीं आया है.

छपरिया आकाशवाणी बस्ती के एक मकान में मृतक मुकीम की मां समसुन निसा ने कहा, "इतना बड़ा बच्चा गंवाया है, तो कुछ तो मिले इंसाफ. सरकार द्वारा किसी चीज़ की कोई मदद नहीं है. पुलिस कहती है पब्लिक की गोली चली है."

समसुन निसा के मुताबिक मरने से पहले उनके बेटे ने धीमी आवाज़ में उनसे कहा था, "अम्मी पुलिस की गोली लगी है हमारे."

पीड़ित और उनके वकील पुलिस की फायरिंग से मौत का आरोप लगाते हैं और सबूत के तौर पर चश्मदीदों के बयान और वीडियो का हवाला देकर दावा करते हैं, लेकिन पुलिस अधिकारी लगातार गोलियां चलाने से इनकार करते रहे हैं.

जनवरी 2020 में बीबीसी से बातचीत में जहां उस वक्त मेरठ के एसपी सिटी अखिलेश नारायण सिंह ने वहां कुछ राउंड हवाई फ़ायरिंग की बात की थी, मेरठ के एडीजी प्रशांत कुमार ने फायरिंग से इनकार किया था.

फ़रवरी 2020 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में दावा किया कि पुलिस की गोली से कोई नहीं मरा.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में दाखिल किए गए एक हलफ़नामे में उत्तर प्रदेश के गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया कि सरकारी एजेंसियों ने जो कदम उठाए उसका मक़सद लोगों को सुरक्षा देना और सार्वजनिक और सामाजिक व्यवस्था बरकरार रखना था.

क्यों बच रही हैं राजनीतिक पार्टियां

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अंबिकानंद सहाय के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट रिझाने की कोशिश में लगे पार्टी नेता मुसलमान और उनसे जुड़े मुद्दों के नज़दीक आने से कतराते दिखते हैं.

ऐसे में ये समझना मुश्किल नहीं कि पार्टियां क्यों राजनीतिक प्रचार में 23 मृतकों के बारे में बात करने से बच रही हैं.

फ़िरोज़ाबाद में स्थानीय पत्रकार शशांक मिश्रा कहते हैं, "कहीं न कहीं पार्टियों को डर है कि उन मुद्दों को छेड़कर, दुखती रग पर हाथ रखकर वो बीजेपी के कोर वोटर से हाथ न धो बैठें."

फ़िरोज़ाबाद में पीड़ित परिवारों के वकील शगीर खान को "सेक्युलर पार्टियों" से शिकायत है.

वो कहते हैं, "किसी भी पार्टी ने, चाहे वो समाजवादी पार्टी हो जो मुसलमानों की बड़ी हितैषी बनती है, कहीं कोई मामला नहीं उठाया, या इस बात को कहने की कोशिश नहीं की गई कि हमारी सरकार आएगी तो हम आपको इंसाफ़ देंगे."

"एमआईएमआईएम अपने आपको मुस्लिम पार्टी बोलती है उसने (भी) आवाज़ उठाने का काम नहीं किया."

राकेश शंखवार
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राकेश शंखवार

इन आरोपों पर जवाब लेने हम फ़िरोज़ाबाद के नगला भाउ इलाके पहुंचे जहां भाजपा उम्मीदवार मनीष असीजा की डोर-टू-डोर कैंपेनिंग के दौरान मेरी मुलाकात पार्टी ज़िला अध्यक्ष राकेश शंखवार से हुई.

पीड़ित परिवार के पुलिस पर आरोपों पर वो कहते हैं, "उन लोगों ने पुलिस पर हमला किया था. तो उसमें पुलिस ने कार्रवाई की. जब दोनों तरफ़ से झगड़ा होता है तो कुछ न कुछ नुकसान होता भी है."

प्रशासन से कोई मदद न मिलने पर उन्होंने कहा, "ये सरासर गलत आरोप हैं. मोदी जी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एक नारा दिया था, सबका साथ सबका विकास. हमने किसी भी व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं किया है. सबके साथ समान भाव के साथ काम किया है. हमने कहीं भेदभाव की नीति नहीं अपनाई है. झगड़ा हुआ है, और झगड़े में खतम हुए हैं. प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत 44,000 से ज़्यादा आवास फिरोज़ाबाद में बने हैं. 50 प्रतिशत प्रधानमंत्री आवास समुदाय विशेष के होंगे."

फ़िरोज़ाबाद के बाहरी इलाके में समाजवादी पार्टी के समर्थकों को संबोधित करने आए पार्टी नेता अक्षय यादव ने कहा अगर उनकी सरकार बनी तो कथित पुलिस फायरिंग में मौत की "निष्पक्ष जांच की जाएगी."

पीड़ित परिवारों के इस आरोप पर उनकी पार्टी न्याय दिलाने पर कोई बात नहीं कर रही है, अक्षय यादव कहते हैं, "न्याय तभी हो सकता है जब सरकार बदलेगी. और हम लोगों की कोशिश है कि सरकार हमारी बने. जांच सही हो और न्याय दिया जा सके."

पीड़ित परिवारों ने बताया कि घटना के बाद अखिलेश यादव उनसे मिले और आर्थिक सहायता दी थी, लेकिन उसके बाद किसी ने उनकी सुध नहीं ली.

आज भी पिस रहे हैं परिवार

बीबीसी
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बीबीसी

20 दिसंबर 2019 को कानपुर में पुलिस की कार्रवाई पर मीडिया में कई रिपोर्टें छपी थीं.

कानपुर से बीबीसी की उस दिन की रिपोर्ट के मुताबिक बाबूपुरवा में ईदगाह मस्जिद में नमाज़ के बाद करीब पांच हज़ार लोग प्रदर्शन करते हुए सड़क पर आ गए और पथराव और आगज़नी के दौरान स्थानीय पुलिस अधिकारी मनोज कुमार गुप्त को भी गले के नीचे पत्थर लगे थे जिससे वो भी घायल हो गए थे.

बाबूपुरवा में 20 दिसंबर 2019 को मरने वालों में कानपुर के मोहम्मद शरीफ़ का बेटा मोहम्मद रईस भी था जो पापड़ बेचता था और शादी-ब्याह में बर्तन धोता था जिससे परिवार का खर्च चलता था.

एक छोटे से कमरे में उनके बगल ही नजमा बानो और मोहम्मद तक़ी बैठे थे.

घटना से पहले ये तीनों परिवार एक दूसरे से अनजान थे लेकिन दिसंबर 2019 की घटना के बाद से ये सभी एक-दूसरे के दुख-सुख के साथी बन गए हैं.

उस दिन नजमा बानो के 24 साल के बेटे आफ़ताब आलम और मोहम्मद तक़ी के 26 साल के बेटे सैफ़ की भी मौत हो गई थी.

नजमा बानो
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नजमा बानो

मोहम्मद शरीफ़ ने रोते हुए बताया कि उस दिन उनका बेटा रईस पास ही ईदगाह में बर्तन धोने गया था जहां उसे काम के साढ़े तीन सौ रुपए मिलने थे. उसने 200 प्लेट ही धोए होंगे जब भगदड़ मची और गोली चलने से उसकी मौत हो गई.

वो कहते हैं, "उसी वक्त हम मुर्दा हो गए. हमारे बच्चे को गोली लग गई. डर के मारे सब कोई सहम गए थे."

बेटे के जाने के बाद घर के गुज़ारे के लिए उनकी पत्नी झाड़ू-बर्तन करना पड़ता है. नम आँखों से वो याद करते हुए कहते हैं. "वो हमको खाना भी खिलाता था और हाथ पैर आकर दबाता था."

दूसरे परिवारों का भी यही हाल

55 वर्षीय नजमा बानो के मुताबिक उनका बेट आफ़ताब नमाज़ पढ़ने के बाद अपने पापा की कब्र पर फातिहा पढ़ने गया जब वापस लौटते समय कथित तौर पर पुलिस की गोली से उनकी मौत हो गई.

मोहम्मद शरीफ़
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मोहम्मद शरीफ़

वो कहती हैं, "बस ये मान लो इंसाफ़ नहीं है दुनिया में, कुछ नहीं है."

पुताई का काम करने वाले 55-वर्षीय मोहम्मद तक़ी का बेटा सैफ़ चमड़े का काम करता था और उस दिन जब वो बड़े भाई को दुकान में खाना देकर वापस लौट रहा था तब गोली लगने से उनकी मौत हो गई.

वो कहते हैं, "(उनके) इलाज में लापरवाही न हुई होती तो हमारे बच्चे बच सकते थे."

आरिफ़ खान के मुताबिक दंगा करने, हत्या करने, और शांति भंग करने जैसे आरोपों में अभी भी लोग जेल में और उन्हें सत्ता परिवर्तन का इंतज़ार है.

वो कहते हैं, "हमें उम्मीद है कि जब नई सरकार आएगी तो हम कोशिश करके इन मुकदमों को वापिस करवाएंगे."

फ़िरोज़ाबाद में मृत शफ़ीक के भाई मोहम्मद निसार कहते हैं कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है.

उन्होंने बताया, "हमारा भारत का संविधान हमसे ये कहता है तुम हक़ से लड़ाई लड़ोगे, हक़ से सभी कुछ मिलेगा. हम जो लड़ाई लड़ रहे हैं वो कानूनी तौर पर लड़ाई लड़ रहे हैं. हमें पूरी उम्मीद है हमें न्याय मिलेगा ही मिलेगा."

महीनों से न्याय की आस लगाए इन परिवारों की उम्मीद लगातार धूमिल हो रही है

जिंदगी से समझौता करने की कोशिश कर रहे इन परिवारों को न्याय की चाह तो है, लेकिन चुनावी नतीजे के बाद व्यवस्था कितनी बदलेगी, सभी परिवारों की निगाहें उसी बात पर होंगी.

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