मायावती ने क्यों लिया यू-टर्न, बसपा के लिए सपा या चंद्रशेखर कौन है बड़ा खतरा?
Uttar Pradesh News: रविवार को लखनऊ में लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार को लेकर मायावती की अध्यक्षता में बसपा की राष्ट्रीय स्तर की एक समीक्षा बैठक हुई। इसके बाद पार्टी की ओर से जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई, उससे संकेत मिलता है कि पार्टी अपने राजनीतिक भविष्य के लिए किसे संभावित खतरे के रूप में देखती है।
विज्ञप्ति की शुरुआत में ही बिना सपा का नाम लिए 'संविधान बचाने के नाम पर गलत प्रचार कर मतदाताओं को गुमराह करके बीएसपी को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाने' की दलील दी गई। इसमें सपा की सहयोगी कांग्रेस पर सीधा हमला करते हुए कहा गया है कि जिसने बाबा साहेब अंबेडकर को रोकने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए, वह अब संविधान बचाने की बात कैसे कर सकती है?

विपक्षी दलों पर संविधान बदलने का खतरा दिखाकर गुमराह करने का लगाया आरोप
मतलब साफ है कि मायावती मानती हैं कि लोकसभा चुनावों में इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर से जिस तरह से भाजपा के खिलाफ संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने का 'खतरा' दिखाया गया, उससे भाजपा-विरोधी बीएसपी के वोट डायवर्ट हो गए। बसपा ने भविष्य में इस तरह की कोशिशों को नाकाम करने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को उपाय खोजने और सतर्क रहने को कहा है।
भतीजे आकाश आनंद को लेकर मायावती का यू-टर्न
इसके साथ ही बसपा सुप्रीमो ने सबसे बड़ा यू-टर्न ये लिया है कि उन्होंने फिर से अपने भतीजे आकाश आनंद को पूरी तरह से 'परिपक्व' मानते हुए, उनके सारे पद लौटा दिए हैं। मतलब, वे पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक के साथ-साथ पार्टी प्रमुख के एकमात्र उत्तराधिकारी भी बने रहेंगे। मायावती ने पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं से अब आकाश को पहले से भी ज्यादा आदर-सम्मान देने को कहा है और भरोसा जताया है कि वे उनकी उम्मीदों पर पूरी तरह से खरे उतरेंगे।
जनाधार खिसकने से सहमी बसपा
यहां दो बातें साफ हैं। एक तो बसपा नेतृत्व यह मानता है कि लोकसभा चुनाव में उसका अपना जनाधार खिसका है, जिससे पार्टी का वोट शेयर 2019 के 19.3% से 2024 में सिमट कर 9.3% रह गया है। दूसरा, पार्टी आने वाले विधानसभा उपचुनावों और 2027 के यूपी विधानसभा चुनावो के लिए युवा नेतृत्व को मौका देना जरूरी समझ रही है।
आकाश आनंद पर मायावती ने क्यों लिया यू-टर्न?
जब लोकसभा चुनावों के दौरान आक्रामक बयानबाजी की वजह से बसपा प्रमुख ने अपने भतीजे को 'अपरिपक्व' मानते हुए अहम जिम्मेदारियां छीन लीं, तो पार्टी की सारी जिम्मेदारी खुद उनपर आ गई। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक पार्टी के हारे हुए उम्मीदवारों ने फीडबैक दिया है कि अगर आकाश आनंद को नहीं हटाया जाता तो बसपा का कम से कम जाटव और मुस्लिम कोर वोटर सपा-कांग्रेस की ओर नहीं शिफ्ट होता। उन्हें लगा कि आकाश को हटाने से भाजपा-विरोधी दलितों और मुसलमानों में सीधा संदेश गया कि मायावती बीजेपी के दबाव में हैं।
बीएसपी के एक नेता ने कहा, 'उनकी (आकाश की) पुनर्नियुक्ति से बीएसपी को बीजेपी की बी-टीम वाले टैग से छुटकारा पाने में मदद मिलेगी। इससे हमारे जाटव और अन्य दलित वोटरों में हमारे प्रति विश्वास बहाल करने में सहायता मिलेगी और लोकसभा चुनावों में करारी हार की वजह से कैडर का जो मनोबल टूटा है, उन्हें भी फिर से प्रोत्साहन मिलेगा।'
मायावती को आखिर किस बात का डर है?
मायावती के अचानक बदले अंदाज के पीछे बीएसपी के अंदर के कई लोग आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के नेता चंद्रशेखर आजाद के बढ़ते प्रभाव की ओर इशारा कर रहे हैं। वह नगीना से चुनाव जीत गए हैं, जहां पिछली बार बीएसपी जीती थी। इस बार चंद्रशेखर वहां न सिर्फ 1.53 लाख वोटों से जीते हैं, बल्कि बसपा यहां चौथे स्थान पर खिसक गई है।
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बसपा के एक नेता ने कहा, 'बीएसपी का अब कोई लोकसभा सांसद नहीं है और आजाद अब सदन में दलितों और मुसलमानों का मुद्दा उठाएंगे और पूरे देश में घूमेंगे। इससे उन्हें मायावती के विकल्प में दलित नेता के रूप में उभरने का मौका मिलेगा, जिससे बीएसपी और कमजोर होगी। इस नुकसान की भरपाई के लिए आनंद की वापसी महत्वपूर्ण थी।'












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