'यूपी के दो लड़के' ने इन 5 वजहों से किया कमाल, 2017 में क्यों हो गए थे फेल?

UP Lok Sabha Chunav Result 2024: उत्तर प्रदेश में इस बार सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की जुगलबंदी ने कमाल कर दिया है। इन दोनों की अगुवाई में राज्य में इंडिया ब्लॉक 80 में से 43 सीटें जीता है। लेकिन, 'यूपी के दो लड़के' वाला यही फॉर्मूला 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में फेल हो गया था।

इस बार के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 63 सीटें अपने पास रखी थी और कांग्रेस के लिए 17 सीटें छोड़ी थी। इनमें से सपा अच्छी स्ट्राइक रेट के साथ 37 सीटें जीत गई। वहीं कांग्रेस ने भी एक-तिहाई से ज्यादा सीटों पर कब्जा कर लिया।

lok sabha chunav

2017 में राहुल-अखिलेश की जोड़ी हो गई थी फेल
2017 के यूपी विधानसभा चुनावों में भी सपा और कांग्रेस ने राज्य में गठबंधन किया था। अखिलेश यादव और राहुल गांधी को दो युवाओं के तौर पर चुनाव अभियान में खूब हाइप दिया गया था। कांग्रेस ने तो चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर तक की सेवाएं लीं। उन्होंने पार्टी के पक्ष में 'खाट सभाएं' भी करवाईं, लेकिन फिर भी गठबंधन की खटिया खड़ी होने से नहीं रोक पाए।

तब समाजवादी पार्टी यूपी विधानसभा की 403 सीटों में से 311 पर लड़कर सिर्फ 47 सीटें जीत सकी थी। वहीं उसने कांग्रेस के लिए जो 114 सीटें छोड़ीं उसमें वह सिर्फ 7 सीटों पर ही जीती और 29 पर तो जमानतें भी जब्त करवा दीं। 25 सीटों पर समाजवादी पार्टी ने भी जमानत गंवा दी थी।

हैशटैग 'यूपी के दो लड़के' हुआ वायरल
4 जून, 2024 मंगलवार को जैसे ही यूपी से लोकसभा चुनावों के रुझान आने शुरू हुए सोशल मीडिया पर हैशटैग 'यूपी के दो लड़के' वायरल होने लगा। एक्स पर पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन भी इसपर टिप्पणी करने से खुद को रोक नहीं पाए। सवाल है कि इस बार इन दोनों नेताओं की जुगलबंदी ने ऐसा क्या करतब कर दिया है? हमनें इसकी जो पड़ताल की, उसकी पांच मुख्य वजहें लग रही हैं।

पहली- चुनाव अभियान में दोनों की जुगलबंदी
राजनीति के जानकार इसका पहला कारण ये मानते हैं कि दोनों नेताओं ने इसबार के चुनाव अभियान में एक-दूसरे पूरा सहयोग किया। इन्होंने अपने उम्मीदवारों के पक्ष में 15 साझा सभाएं की हैं। दोनों ने ही एक-दूसरे के एजेंडे को पूरे जोश के साथ आगे बढ़ाने का काम किया है।

दूसरी- आरक्षण और जाति वाला कार्ड
दोनों नेता वोटरों के दिमाग में यह बात डालने में सफल रहे कि अगर तीसरी बार मोदी सरकार बन गई तो वे संविधान बदल देंगे। इसके ऊपर दोनों ने जाति जनगणना की चाशनी का भी भरपूर इस्तेमाल किया। अखिलेश का पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) कार्ड ने भी भरपूर काम किया।

तीसरी- सरकारी नौकरी और महिलाओं के खातों में पैसे
ऊपर से सरकारी नौकरियां देने के वादे ने भी इनके पक्ष में कमाल का काम किया। महिलाओं के खाते में एक लाख रुपए डालने वाले वादे ने किस हद तक वोटरों को प्रभावित किया है, उसकी तस्वीर बुधवार को लखनऊ में कांग्रेस दफ्तर में देखने को मिली, जहां बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाएं चुनाव अभियान के दौरान पार्टी की ओर से बांटी गई गारंटी कार्ड लेकर पैसे भुनाने भी पहुंच गईं।

चौथी- अपने अहंकार को हावी नहीं होने दिया
कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस बार दोनों नेताओं ने चुनाव जीतने के लिए अपने-अपने निजी अहंकार को आड़े नहीं आने दिया। इसके बारे में मामले की जानकारी रखने वाले कहते हैं कि अखिलेश ने वादा निभाया और बाराबंकी में कांग्रेस प्रत्याशी तनुज पुनिया के लिए भी वोट मांगने पहुंचे।

पांचवीं- मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतने में सफल
गठबंधन के पक्ष में सबसे बड़ी बात ये रही कि ये दोनों नेता मुस्लिम मतदाताओं को इंडिया ब्लॉक के पक्ष में एकजुट करने में कामयाब हो गए। जबकि, सपा ने सिर्फ 4 और कांग्रेस ने 2 ही मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इनमें सपा के चारों और कांग्रेस के एक मुस्लिम उम्मीदवार की जीत भी हो गई।

मुस्लिम मतदाताओं का पूरी तरह से इंडिया ब्लॉक के पक्ष में झुकाव का संकेत बसपा सुप्रीमो मायावती के उस पत्र से भी जाहिर है, जिसमें उन्होंने कहा है कि आगे से 'उनकी पार्टी मुसलमानों को सोच-समझकर ही टिकट देगी।'

2017 में सपा की फर्स्ट फैमिली में ही मचा था महासंग्राम
दरअसल, यूपी में आज भी कांग्रेस को समाजवादी पार्टी की वजह से संजीवनी मिली है। 2017 में भी यूपी में उसका अपना कोई खास जनाधार नहीं था और वह सपा के दम पर ही चुनाव लड़ रही थी। लेकिन, तब सपा की फर्स्ट फैमिली में ही महासंग्राम मचा हुआ था।

अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव ने तब पार्टी से अलग होकर अपनी पार्टी बना ली थी और खुद भी चुनाव लड़े, दूसरों को भी लड़वाया। वह पार्टी में खुद के और पार्टी संस्थापक मुलायम सिंह को भी अपमानित किए जाने के आरोप लगा रहे थे। तबतक अखिलेश पूरी तरह से अपने पिता की छत्रछाया से बाहर भी नहीं आ सके थे।

2022 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपने दम पर एक सियासी पार्टी को संचालित किया। वह परिवार के सियासी विवादों को भी सुलझाने में सफल हुए। उन्होंने तभी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ संघर्ष करने का एक बड़ा अनुभव जुटाने में सफलता पाई। इन सबका मिलाजुला परिणाम रहा कि वे अपने को पूर्ण रूप से तैयार राजनेता के तौर पर स्थापित करने में कामयाब हुए हैं।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+