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अपर्णा यादव का भाजपा में जाना सपा के लिए कितना बड़ा सियासी सदमा?

मुलायम सिंह की छोटी बहु अपर्णा यादव ने बुधवार को समाजवादी पार्टी छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया. अपर्णा ने पार्टी की सदस्यता लखनऊ में नहीं बल्कि दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय मुख्यालय में ली जिससे साफ़ ज़ाहिर है कि भाजपा इसे एक राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में देश की मीडिया के सामने पेश करना चाहती है.

up election Aparna Yadav joins BJP big political shock for SP?

इस अवसर पर अपर्णा यादव ने कहा, " मैं हमेशा से प्रधानमंत्री जी से प्रभावित रहती थी और मेरे चिंतन में राष्ट्र सबसे पहले है. मुझे लगता है कि राष्ट्र का धर्म मेरे लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है. मैं राष्ट्र की आराधना करने निकली हूँ. इसलिए आप सभी का सहयोग भी अनिवार्य है. मैं हमेशा भाजपा की योजनाओं से प्रभावित रहती हूँ और जो भी अपनी क्षमता से कर सकूंगी, करूंगी."

बाद में भाजपा ने एक तस्वीर जारी की जिसमें भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अपर्णा यादव का सम्मान कर रहे हैं और साथ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अलावा पार्टी के दूसरे बड़े नेता भी मौजूद हैं.

लखनऊ में अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अखिलेश यादव ने अपर्णा के भाजपा में शामिल होने के बारे में कहा, "सबसे पहले तो मैं बधाई दूंगा और शुभकामनायें. और साथ ही साथ हमें ख़ुशी इस बात की है कि समाजवादी विचारधारा का विस्तार हो रहा है. मुझे उम्मीद है कि हमारी विचारधारा वहां पर भी पहुँच करके संविधान और लोकतंत्र को बचाने का काम करेगी. नेताजी ने बहुत कोशिश की समझाने की."

लेकिन क्या यह भाजपा का सपा पर उसकी पार्टी के कुछ पिछड़े नेता तोड़ने का पलटवार था? इस सवाल के जवाब में अखिलेश यादव ने कहा, "समाजवादी पार्टी ने जिनको लिया है और साथ लेकर आए हैं, उनका व्यापक जनाधार है."

अपर्णा यादव परिवार में रहते कैसे भाजपाई हो गईं?

अपर्णा यादव की प्रेस वार्ता में प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक बड़ी दिलचस्प बात कही. उन्होंने कहा, "मुलायम सिंह की बहू होने के बावजूद भी आपने जो अपना विचार समय-समय पर मीडिया के माध्यम से रखा है वो विचार शुरू से मुझे भाजपाई लगता था."

पत्रकार सुमन गुप्ता लम्बे समय से समाजवादी पार्टी और उसमें चल रही पारिवारिक उठापटक को कवर करती आ रही हैं. अपर्णा यादव के छोटे राजनीतिक करियर को भी सुमन गुप्ता ने क़रीब से देखा है. वो कहती हैं, "महत्वाकांक्षा इनमें तो बहुत पहले से दिखने लगी थी और भाजपा की तरफ़ इनका जो रुझान था वो भी दिख रहा था. अब 2017 को याद करिए जब योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने उत्तर प्रदेश के और वीवीआईपी गेस्ट हाउस में रहा करते थे तब वो गुलदस्ता लेकर उनके यहाँ गई थीं. उसके बाद उनका जो कान्हा उपवन का कार्यक्रम है, गाय और जानवरों का, उसमें भी उन्होंने बुलाया था तो योगी आदित्यनाथ वहां भी गए थे."

अपर्णा यादव ने समय-समय पर भाजपा के प्रति नरमी के सबूत भी दिए हैं. उन्होंने और उनके पति प्रतीक यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ सेल्फ़ी भी खिंचवाई थी.

जून 2020 में अपर्णा यादव को योगी सरकार ने वाई कैटेगरी की सुरक्षा भी दी जिसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का शुक्रिया अदा किया था.

फ़रवरी 2020 में जब लखनऊ में डिफ़ेन्स एक्सपो का आयोजन हुआ तो अपर्णा यादव ने इसे योगी सरकार का रोज़गार बढ़ाने का प्रयास बताते हुए कहा था, "रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह जी एवं श्री योगी आदित्यनाथ जी का यह प्रयास उत्तर प्रदेश में असाधारण निवेश एवं रोज़गार के बड़े अवसर देगा और उत्तर प्रदेश की आर्थिक व्यवस्था को गति देगा."

https://twitter.com/aparnabisht7/status/1274301483610062849?s=21

अपर्णा और उनके पति प्रतीक यादव की अखिलेश यादव से नहीं बनती है, यह बात सबको पता है.

इसके बारे में वरिष्ठ पत्रकार शीतल प्रसाद सिंह कहते हैं, "उनके पारिवारिक झगड़े पिछले नौ साल से सार्वजनिक हैं और इनमें कोई बोलचाल के सम्बन्ध भी नहीं हैं, और यह भी सब लोग जानते हैं. समाजवादी पार्टी में वो किसी पद विशेष पर भी नहीं थीं सिर्फ़ एक चुनाव लड़ी थीं. और जब वो चुनाव लड़ी थीं तब भी वो भाजपा से घुलती-मिलती थीं और मोदी जी की तारीफ़ करती थीं.

और अब केशव प्रसाद मौर्य ने भी कहा कि हम तो जानते थे कि यह विचार से भाजपाई हैं. अखिलेश यादव से तो कोई इनका रिश्ता नहीं हैं. हाँ, जब तक मुलायम सिंह राजनीति में सक्रिय थे तो उनके कहने पर इनको टिकट मिल गया था क्योंकि उस समय अखिलेश के हाथ में कमान नहीं थी. जब से अखिलेश यादव के पास पार्टी का पूरा कंट्रोल हो गया है तब से उन्होंने उन्हें साइडलाइन कर रखा था."

अपर्णा को लेकर क्या होगी लम्बी राजनीति?

अपर्णा यादव की भाजपा में शामिल होने की ख़बर ट्विटर पर तो टॉप ट्रेंड बनी, लेकिन भाजपा के इस पलटवार का ज़मीनी असर क्या होगा असर?

इस बारे में पत्रकार शीतल सिंह कहते हैं, "यह सिर्फ़ आज की ख़बर रहेगी. एक हद तक आज का लाइमलाइट पैदा करने की इस क़दम में ताक़त है, तो उतना फ़ायदा तो उन्होंने पहुँचा दिया है क्योंकि चुनाव वर्चुअल लड़ा जा रहा है. ऐसे में इस ख़बर को तीन दिन से तैयार किया जा रहा था और वो आज जाकर बनी. तो इसका इतना ही फ़ायदा है. जहाँ तक जन समर्थन का सवाल है, इनके जाने-आने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है. जो लोग अखिलेश यादव को वोट दे रहे हैं, वो इस बात को जानते हैं कि अपर्णा यादव कौन हैं."

https://twitter.com/aparnabisht7/status/1483756907886428160

वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं कि चुनाव के समय हर पार्टी माहौल बनाने का काम करती है, "अपनी व्यक्तिगत स्थिति में वो जो कुछ भी हों लेकिन उनकी राजनीतिक शख्सियत ऐसी नहीं रही कि उनके कहीं जाने से बड़ा वोट चला जायेगा, या उनके जाने से बहुत बड़ी क्रान्ति आ जाएगी, ऐसा कुछ नहीं है. चुनाव के ऐन वक़्त में लोगों के इधर-उधर जाने का, जिसमें स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में शामिल होने और भाजपा से लोगों का टूट कर आना भी हुआ, तो अपर्णा यादव भाजपा के डैमेज कंट्रोल की एक कड़ी बन गईं. जबकि जो जनाधार वाले हैं वो भाजपा से सपा में आए.

जहाँ तक परिवार की बात है तो यह क्षति ज़रूर हुई है एक परसेप्शन के रूप में. एक अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी हो गई और एक इनके यहाँ भी भाजपाई पैदा हो गया."

लेकिन क्या इस घटना का लम्बे समय तक उत्तर प्रदेश की राजनीति पर कोई असर देखने को मिलेगा? इसके बारे में सुमन गुप्ता कहती हैं, "वो तो उनके चुनावी प्रदर्शन से ही पता चल जायेगा. इसी चुनाव के बाद उनकी क्या वैल्यू है वो पता चल जाएगा."

क्या यादव परिवार की कलह फिर से निकल कर सामने आएगी?

अपर्णा यादव को पार्टी की सदस्यता दिलाते हुए उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने तंज़ कसा, "अखिलेश यादव अपने परिवार में ही सफल नहीं हैं और प्रदेश में भी असफल रहे हैं."

2017 में अखिलेश यादव पारिवारिक क्लेश का ख़मियाज़ा भुगत चुके हैं. अपर्णा यादव के भाजपा में शामिल होने के तुरंत बाद अखिलेश यादव के चाचा और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी प्रमुख शिवपाल यादव के राजनीतिक भविष्य के बारे में अफ़वाएं उड़ने लगीं.

लेकिन शिवपाल यादव ने तुरंत इन अफ़वाहों का खंडन करते हुए ट्वीट किया, "श्री लक्ष्मीकांत बाजपेयी के इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है कि मैं भाजपा में शामिल हो सकता हूँ. यह दावा पूर्णतः निराधार और तथ्यहीन है. मैं श्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी गठबंधन के साथ हूँ और अपने समर्थकों से आह्वान करता हूँ कि प्रदेश की भाजपा सरकार को उखाड़ कर फेंक दें एवं प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गठबंधन वाली सरकार बनाएं."

https://twitter.com/shivpalsinghyad/status/1483721495058649088?s=20

लेकिन अपर्णा यादव के भाजपा में शामिल होने से 2017 विधान सभा चुनावों के दौरान यादव परिवार में मचे घमासान और अखिलेश यादव और शिवपाल के बीच चली वर्चस्व की लड़ाई की याद एक बार फिर ताज़ा हो गई है. इस बारे में सुमन गुप्ता कहती हैं, "2016 में जो घर परिवार में विवाद सामने आया, उस विवाद में अपर्णा यादव, उनकी सास साधना गुप्ता और उनके पति प्रतीक यादव वो सब अखिलेश यादव को चुनौती देते हुए ही नज़र आए. जहाँ भी इन्हें मौक़ा मिला वो इन्हें अपमानित करने से नहीं चूकते थे."

सुमन गुप्ता के अनुसार उस समय चूंकि पूरा विवाद शिवपाल यादव बनाम अखिलेश यादव था, इसलिए अपर्णा यादव की तरफ़ लोगों का ज़्यादा ध्यान नहीं गया लेकिन जो अब हुआ है उसके बीज तो वहीं पड़ गए थे.

क्या अपर्णा यादव बनेंगी भाजपा का धारदार हथियार?

क्या अपर्णा यादव भाजपा के पास सपा को टारगेट करने के लिए एक नया हथियार साबित होंगी?

इस बारे में पत्रकार शीतल पी सिंह कहते हैं, "यह काहे का हथियार होगा? क्या अपर्णा यादव लिख लेने से उत्तर प्रदेश में सपा से जुड़ा यादव उनके लिए अपना वोट कटा सकता है? ऐसा शायद सैंपल कहीं नहीं मिलेगा. लड़ाई तो जो हो रही है वो यह हो रही है कि पिछड़ी जाति के नेता अखिलेश यादव के पक्ष में गोलबंद हो रहे हैं. यही चुनावी स्थिति है."

लेकिन भाजपा अपर्णा यादव के अपनी पारिवारिक पार्टी से अलग होने के मुद्दे का भरपूर इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है.

पार्टी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "अपर्णा यादव पहले भी अपने सामाजिक कार्यों को लेकर चर्चा में रही हैं और उन्होंने अलग मंचों पर नरेंद्र मोदी जी की प्रशंसा की है. महिलाओं के सम्मान के लिए जो केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की योगी सरकार ने काम किया है वो उससे प्रभावित रही हैं और उसी से प्रभावित होकर उन्होंने भाजपा ज्वाइन किया है. अखिलेश यादव अपने तौर तरीक़ों पर पुनर्विचार करें कि किस तरह से वो अपना परिवार नहीं संभल पाए, पहले चाचा को अपमानित किया, फिर अपने पिता से अध्यक्ष पद छीन लिया."

अपर्णा यादव के फ़ैसले को निजी बताते हुए समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गाँधी कहते हैं, "अपर्णा जी को सोचना चाहिए था कि इस समय जो लड़ाई है वो लोकतंत्र और संविधान और आरक्षण की व्यवस्था को बचाए रखने की है. तो उनको इस लड़ाई का साथ देना चाहिए था. उन लोगों के साथ नहीं जाना चाहिए था जो देश की सामाजिक न्याय की व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं."

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