जानें क्यों, मोदी सरकार के लिए आने वाले समय में सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हो सकती है 'बेरोजगारी'
नई दिल्ली। कोरोना वायरस महामारी के कारण भारत समेत दुनिया की सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। भारत सरकार ने 31 अगस्त को जीडीपी के अनुमानित आंकड़े जारी किए। सरकार की ओर से जारी किए गए आंकड़े अर्थशास्त्रियों की ओर से लगाए गए अनुमान कहीं अधिक खराब रहे हैं। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च, गोल्डमैन सैक्स, आईसीआरए या क्रिसिल - सभी ने भारत की जीडीपी निगेटिव में बताई थी। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट्स के मुताबिक , क्रिसिल ने अपने सितंबर के अपडेट में (मई के आंकलन पर) जीडीपी की गिरावट के दो मुख्य कारण बताए है। पहला-महामारी का अभी तक पीक देखने को नहीं मिला और दूसरा -सरकार पर्याप्त प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान नहीं कर रही है।

सरकार ने कोरोना काल में उम्मीद के मुताबिक सीधी सहायता नहीं दी
क्रिसिल ने कहा कि, देश में कोरोना बहुत तेजी से फैल रहा है। भारत में ऐसे बहुत से जिले हैं जहां हर रोज एक हजार से अधिक कोरोना संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं। अगर ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो अब भारत में हर दिन लगभग 1 लाख कोरोना के मामले सामने आ रहे हैं। क्रिसिल ने उम्मीद की थी कि इस आपदा के समय सरकार सकल घरेलू उत्पाद के 1% से अधिक और जीडीपी के 1.2% से अधिक खर्च करेगी, जिसकी घोषणा तालाबंदी के तुरंत बाद की गई थी,लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

महामारी के बात 2 करोड़ से अधिक लोगों ने खो दिए रोजगार
क्रिसिल का अनुमान है कि भारत को मध्यम अवधि में वास्तविक जीडीपी का 13% का "स्थायी" नुकसान होगा। जो 3% औसत नुकसान से बहुत अधिक है यह एशिया-प्रशांत में अन्य अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक नुकसान होगा। रोजाना की नकदी के लिहाज से यह घाटा करीब 30 लाख करोड़ रुपये होने वाला है। यह तेज आर्थिक संकुचन बड़े पैमाने पर बेरोजगारी और प्रच्छन्न रोजगार में दिखाई देगा। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के सीईओ महेश व्यास ने बताया कि, भारत में 35 मिलियन (या 3.5 करोड़) बेरोजगार लोगों का एक मौजूदा पूल है। महामारी के बाद से, 21 मिलियन वेतनभोगी ने नौकरियों खो दी हैं, औऱ इन लोगों को जल्द नौकरियां मिलने की संभावना नहीं है।

भारत को लगभग 4.5 करोड़ नौकरियों की आवश्यकता होगी
उन्होंने बताया कि, 35 मिलियन के इस पूल में, भारत में काम करने वाले आयु वर्ग के 2 मिलियन लोग यानी 15 साल से 59 साल हर महीने जुड़ते हैं। लेकिन हमारे पास श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) सिर्फ 40% है, तो हर महीने लगभग 0.8 मिलियन रोजगार की तलाश करते हैं। एलएफपीआर आबादी में ऐसे लोगों का अनुपात है जो काम मांग रहे हैं। इसकी गणना रोजगार और बेरोजगारों को जोड़कर और उन्हें कुल आबादी के अनुपात के रूप में दिखाया जाता है। विकसित देशों में 60% से अधिक की तुलना में भारत में लगभग 40% से कम LFPR है। भारत को हर साल लगभग 9.6 मिलियन (या लगभग 1 करोड़) नए रोजगार बनाने की आवश्यकता है। इसलिए इस वित्तीय वर्ष के अंत तक, अगर और लोग अपना रोजगार नहीं खोते हैं तो भारत को लगभग 4.5 करोड़ नौकरियों की आवश्यकता होगी।

रोजगार की स्थिति में जल्द सुधार की संभावना कम
2016-17 और 2019-20 के बीच सीएमआईई के आंकड़ों से पता चलता है कि देश में रोजगार लोगों की कुल संख्या 40.7 करोड़ से 40.3 करोड़ पर रुकी हुई है। इस प्रकार जब जीडीपी गिर रही है या धीमी गति से बढ़ेगी तो अगले कुछ सालों में इस बात की संभवानाएं काफी कम है कि, लोगों को बड़ी संख्या में नौकरियां मिलेंगी। वहीं हर साल, कम से कम 1 करोड़ युवा भारतीय काम की मांग के लिए श्रम बल में शामिल होंगे।
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