Tripura election result: 5 साल पहले 50 सीटों पर लड़ने वाली बीजेपी की 49 पर हुई थी जमानत जब्त
बीजेपी ने ये कमाल अचानक से नहीं किया है इसके पीछे 'बीजेपी के चाणक्यों' की कड़ी मेहनत है। त्रिपुरा में बीजेपी का कोई कैडर नहीं था लेकिन बीजेपी के चाणक्यों ने बहुत ही कम समय में अपना कैडर विकसित किया और बड़ी ही चालाकी से लेफ्ट को लेफ्ट के ही स्टाइल में जवाब दिया
नई दिल्ली। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव का परिणाम राजनीतिक पंडितों को आश्चर्यचकित करने वाला है। पिछली विधानसभा चुनाव में जिस भारतीय जनता पार्टी का खाता भी नहीं खुला था वो इस बार बहुमत का आंकड़ा छूने में कामयाब हुई है। त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी ने लेफ्ट के 25 साल के किले को ध्वस्त कर दिया है। रुझानों में बीजेपी को दो तिहाई बहुमत दिख रहा है। बीजेपी ने 60 में से 59 सीटों के लिए हुए मतदान में 41 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि माणिक सरकार के नेतृत्व वाली सीपीएम को महज 17 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अलावा ये नतीजे बीजेपी के लिए भी चौंकाने वाले हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में माकपा को 49 सीटें और कांग्रेस को 10 सीटें मिली थीं। जबकि बीजेपी के पास एक भी सीट नहीं थी।

तब बीजेपी की 49 सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी
जब 2013 में विधानसभा चुनाव हुए थे तब बीजेपी 50 सीटों पर लड़ी थी और 49 सीटों पर बीजेपी की जमानत जब्त हो गई थी। 2013 के चुनाव में बीजेपी को लेफ्ट का गढ़ कहे जाने त्रिपुरा में महज 1.5 फीसदी वोट ही मिले थे, लेकिन इस बार बीजेपी गठबंधन ने वोट शेयर में बड़ी बढ़त हासिल करते हुए 49.6 पर्सेंट वोट हासिल किया है। बीजेपी को खुद 41.1 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि उसकी सहयोगी पार्टी पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा को 8.5 फीसदी वोट मिले हैं। इस तरह दोनों दलों के गठबंधन को सूबे के करीब आधे वोटरों ने समर्थन दिया है। 1993 में त्रिपुरा की सत्ता पर काबिज हुए लेफ्ट के लिए यह सूबा भी केरल और पश्चिम बंगाल की तरह गढ़ बन चुका था। लेकिन, पश्चिम बंगाल के बाद अब इस सूबे की सत्ता जाने से लेफ्ट को करारा झटका लगा है।

इसके पीछे 'बीजेपी के चाणक्यों' की कड़ी मेहनत है
बीजेपी ने ये कमाल अचानक से नहीं किया है इसके पीछे 'बीजेपी के चाणक्यों' की कड़ी मेहनत है। त्रिपुरा में बीजेपी का कोई कैडर नहीं था लेकिन बीजेपी के चाणक्यों ने बहुत ही कम समय में अपना कैडर विकसित किया और बड़ी ही चालाकी से लेफ्ट को लेफ्ट के ही स्टाइल में जवाब दिया। बीजेपी ने त्रिपुरा में 'मोदी लाओ' की जगह 'सीपीएम हटाओ', 'माणिक हटाओ' जैसे नारों का इस्तेमाल किया। 2014 लोकसभा चुनावों के बाद से बीजेपी लगातार अपनी पकड़ बनाने के लिए यहां प्रयास करती रही है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि पहली बार आम चुनावों में बीजेपी को त्रिपुरा में लेफ्ट मोर्चा के बाद सबसे अधिक छह प्रतिशत वोट मिले थे। उसके बाद पिछले एक साल से पार्टी वहां अपने कैडर को बनाने के लिए प्रयासरत रही है। इसका नतीजा तब देखने को मिला है।

बीजेपी ने अपने चुनावी इतिहास में बिल्कुल नया प्रयोग किया
त्रिपुरा में 'लाल दुर्ग' ढहाने के लिए बीजेपी ने अपने चुनावी इतिहास में बिल्कुल नया प्रयोग किया। पिछले एक साल से बीजेपी ने यहां अपना संगठन मजबूत करती रही है ताकि लेफ्ट के कैडर का मुकाबला किया जा सके। 50 हजार से ज्यादा बीजेपी और आरएसएस कार्यकर्ता, पदाधिकारी और ट्रेनर संगठनों ने जीत में बड़ी भूमिका निभाई। माकपा का शासन त्रिपुरा में पिछले 25 सालों से हैं और माणिक सरकार 1997 से राज्य के मुख्यमंत्री हैं लेकिन इस बार उनको पहली बार बीजेपी के रूप में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। कांग्रेस की सूबे की सत्ता से साफ होने और उसकी जगह पिछली बार तृणमूल कांग्रेस के उभार लेकिन बाद में आंतरिक टूट-फूट का सीधा लाभ बीजेपी को मिला है।

योगी आदित्यनाथ ने ये भूमिका निभाई
पिछले दो दशकों से त्रिपुरा की सत्ता के निर्विवाद चेहरा रहे माकपा (सीपीएम) नेता मुख्यमंत्री माणिक सरकार को सत्ता से बाहर करने में पीएम मोदी के जादू के साथ-साथ यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के जलवे ने भी काम किया। योगी आदित्यनाथ ने नाथ संप्रदाय के लोगों को बीजेपी से जोड़ने का काम किया। आपको बता दें कि योगी आदित्यनाथ खुद नाथ संप्रदाय से संबंध रखते हैं यही वजह रही की बीजेपी मे चुनाव प्रचार के दौरान यूपी के सीएम को खूब इस्तेमाल किया। त्रिपुरा में बीजेपी ने 'विस्तारक' और 'पन्ना प्रमुख' नियुक्त किए थे ताकि मंडलों और स्थानीय नेताओं के बीच कोई आंतरिक कलह न हो।
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