ट्रिपल तलाक के बचाव में उतरे केरल के सीएम, कहा- सिर्फ मुसलमानों के लिए ही ये अपराध क्यों है?

तीन तलाक को लेकर 2019 में एक विधेयक पारित किया गया जिसके बाद से तीन तलाक देना अपराध की श्रेणी में आ चुका है। वहीं अब तीन तलाक के बचाव में केरल मुख्‍यमंत्री आ चुके हैं। उन्‍होंने अपराधिक श्रेणी में रखे जाने पर सवाल उठाया

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मोदी सरकार के कार्यकाल में तीन तलाक विधेयक 30 जुलाई 20219 को पारित हो चुका है। जिसके बाद से मुस्लिम समाज में एक बार में तीन तलाक कहकर पत्‍नी को तलाक देना आपराध बन चुका है। इस विधेयक को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019 के नाम से जाना जाता है। इस कानून के लागू होने के बाद मुस्लिम समाज की महिलाओं को काफी राहत मिली । वहीं अब केरल के मुख्‍यमंत्री पिनाराई विजयन ने तीन तलाक प्रथा का बचाव करते हुए तीन तलाक को आपराधिक बनाने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना करते हुए सवाल उठाया है।

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मुसलमानों के लिए तलाक क्‍यों अपराध है ?

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने पूछा कि जब अन्य सभी धर्मों के तलाक को सिवित मैटर के रूप में देखा जाता है तो केवल तलाक मुसलमानों के लिए ही अपराध क्यों माना जाता है। विभिन्न धार्मिक बैगग्राउंट के लोग होते हैं क्या हम प्रत्येक व्यक्ति को सजा देने के लिए अलग- अलग तरीके का उपयोग कर सकते हैं? पिनारई ने कहा ये क्‍या न्‍याय है कि एक निश्चित धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति के लिए एक कानून है और दूसरे के लिए एक अलग कानून है ? क्या तीन तलाक के मामले में हम यही नहीं देख रहे हैं ?

सीएम पिनाराई ने कहा

तीन तलाक को मुस्लिम समाज के लिए अपराध बना दिया गया है। उन्‍होंने कहा तलाक सभी धर्मों में होता है लेकिन अन्य सभी धर्मों में से सिविल यानी दीवानी मामलों के रूप में देखा जाता है और ये केस सिविल कोर्ट में लड़े जाते हैं तो फिर अकेले मुसलमानों के लिए यह एक अपराध क्यों है? अगर वो मुस्लिम है तो तलाक के मामले में उसे जेल हो सकती है। जबकि हम सब भारतीय हैं और सबके लिए समान कानून की बात की जाती है। क्या हम कह सकते हैं कि हमें अपनी नागरिकता इसलिए मिली क्योंकि हम एक विशेष धर्म में पैदा हुए हैं? क्या धर्म कभी नागरिकता का आधार रहा है?

शाहबानो केस फैसला और तीन तलाक पर कानून

2019 के पहले दो मौके आए जब तीन तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट में जानें के बाद संसद में पहुंचा। पहला मौका था 1985 और दूसरी बार 2019 में। 1985 में शाहबानों केस में शाहबानो के पक्ष में जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया तो उसी फैसले के आधार पर संसद में विधेयक पारित कर कानून बना दिया गया था। इस कानून के तहत तीन तलाक अपराध की श्रेणी में आ गया। ये कानून शाहबानों जैसी महिलाओं के लिए बड़ी राहत साबित हुआ। बता दें 40 वर्षीय शायरा बानो नेने पति द्वारा दिए गए तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में न्‍याय की गुहार लगाई थी। उसके पति ने उसे एक टेलीग्राम के जरिए तलाक भेजा था। 2017 में शायरा बानो के केस पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाते हुए तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था।

इस कानून में कौन से केस सुने जाते हैं

मुस्लिम महिलाओं के विवाह से संबंधित अधिकारों के संरक्षण के लिए ये विधेयक लागू किया गया है । ये कानून तलाक-ए-बिद्दत जिसका मतलब है एक बार तीन बार तलाक बोलने वाले मामलों पर लागू किया जा रहा है। इसके साथ ही वाट्सअ प, एसएमएस,, पत्र के जरिए तीन तलाक देने संबंधी केस इस कानून के तहत सुने जाते हैं। इस कानून के पारित होने के बाद ही तीन तलाक देना गैर-जमानती अपराध है।

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