Train accident: 13 साल बाद भी पिता के डेथ सर्टिफिकेट का इंतजार, कौन है जिम्मेदार?
पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में 13 साल पहले एक भयानक रेल हादसा हुआ था, जिसमें 148 लोगों की मौत हो गई थी। उसके कई पीड़ित आजतक मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भटक रहे हैं।

ओडिशा के बालासोर में हुई ट्रेन दुर्घटना ने पूरी दुनिया को दुखी किया है। इस हादसे में जो चले गए, उन्हें कोई लौटा नहीं सकता। न ही उनके परिवार वालों का दर्द मिटाया जा सकता है। लेकिन, फिर भी समाज के हर वर्ग की ओर से लोग पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आ रहे हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि अगर 13 साल पहले हुए किसी ट्रेन हादसे में अपने पिता को गंवा चुकी बेटी को अभी तक डेथ सर्टिफिकेट के लिए भटकना पड़ रहा हो तो उसपर क्या गुजर रहा होगा।
13 साल से पिता के मृत्यु प्रमाण पत्र का इंतजार
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल के हावड़ा की रहने वाली पॉलोमी अट्टा तब सिर्फ 5 साल की थी, जब 28 मई, 2010 को उनके पिता प्रसेनजीत की जनेश्वरी एक्सप्रेस रेल हादसे में मौत हो गई थी। यह दुर्घटना पश्चिम बंगाल के झाड़ग्राम में हुआ था, जिसमें 148 लोगों की मौत हो गई थी।
पॉलोमी की मां ने शुरू किया संघर्ष
लेकिन, सरकारी डायरी में आज भी प्रसेनजीत को 'लापता' बताया जाता है। इस वजह से पीड़ित परिवार को 13 साल भी डेथ सर्टिफिकेट तक नहीं मिला है। प्रसेनजीत के मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करने का संघर्ष पॉलोमी की मां जुथिका ने शुरू किया था। क्योंकि, इसके बिना परिवार को किसी तरह की सरकारी सहायता मिलना असंभव है।
मृत्यु प्रमाण पत्र के इंतजार में मां गुजर गई
इस घटना के बाद रेलवे ने पीड़ित परिवार के सदस्य को रोजगार देने का वादा भी किया था। पॉलोमी ने कहा, 'झाड़ग्राम के सिविल जज की अदालत में जाने से पहले मेरी मां ने सीएम ममता बनर्जी, बाद के रेल मंत्रियों, स्थानीय विधायकों, जिले के अधिकारियों से भी से मिलने की कोशिश की थी।'
उनके मुताबिक 'हमने परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य खो दिया था और हमें सड़कों पर आने को मजबूर होना पड़ा। पिछले साल मेरी मां भी गुजर गई। अब मैं उनका मिशन जारी रखूंगी।' इसी तरह कोलकाता के सुरेंद्र सिंह और लिलुआ के राजेश कुमार बोथरा ने भी हादसे में अपनी पत्नियों और बच्चों को खो दिया था। वे भी 2018 में कोर्ट पहुंचे।
कई और भी पीड़ितों को है डेथ सर्टिफिकेट का इंतजार
2022 की सुनवाई में रेलवे ने मुकदमे की जरूरत पर सवाल किया। राज्य सरकार की ओर से अभी तक उपस्थिति दर्ज नहीं हुई है। जनेश्वरी ट्रेन हादसे के चार पीड़ित परिवारों के वकील तीर्थांकर भख्त के मुताबिक, डीएनए मिलान के लिए मेरे सभी क्लाइंट ने दो से तीन बार बल्ड टेस्ट करवाया है। 'अभी भी पहचाने जाने के अयोग्य मूल 37 शवों में से 24 उसी श्रेणी में हैं।' न ही सरकारी स्तर पर इस समस्या के समाधान के लिए कोई गंभीर पहल हुआ है।
इस सरकारी गैर-जिम्मेदारी का गुनहगार कौन?
दक्षिण-पूर्व रेलवे के प्रवक्ता का कहना है कि मृत्यु प्रमाण पत्र राज्य सरकार जारी करती है, रेलवे नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक बंगाल के गृह विभाग से संपर्क नहीं हो पाया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के वकील बिवास चटर्जी ने कहा, 'नियम यह है कि सात साल तक अनुपस्थित रहने की स्थिति में मृत घोषित किया जा सकता है, जबतक कि कोई ऐसा सबूत न हो कि व्यक्ति जीवित है।'
जब हादसा हुआ था तो रेल मंत्री थीं ममता बनर्जी
हैरानी की बात है कि जब जनेश्वरी एक्सप्रेस हादसा हुआ था, तब ममता बनर्जी देश की रेल मंत्री थीं और उसके 13 साल बाद भी जब पीड़ित सिर्फ मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भटक रहे हैं तो वह लगातार तीन कार्यकाल से राज्य की मुख्यमंत्री पद पर हैं।
बालासोर की घटना के बाद बंगाल में झाड़ग्राम पर संग्राम
ओडिशा के बालासोर में हुई ट्रेन हादसे के बाद जनेश्वरी एक्सप्रेस को लेकर बंगाल की राजनीति भी गर्म है। जब टीएमसी सांसद और सीएम बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने इसको लेकर ट्विटर के माध्यम से रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से इस्तीफा मांगा तो बंगाल बीजेपी के नेता और विधानसभा में विरोधी दल के नेता सुवेंदु अधिकारी ने उनपर पलटवार कर पूछा कि क्या उनकी बुआ ने तब इस्तीफा दिया था?












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