नेट न्युट्रैलिटी के लिए ट्राई लाने जा रहा है नए नियम, अब नहीं होगी मुश्किल
नई दिल्ली। क्या आपके साथ ऐसा कभी हुआ है कि आपने इंटरनेट चलाया और अपने पसंदीदा न्यूज चैनल को लगाया लेकिन आपकी स्क्रीन पर लिखकर आया कि हमे खेद है, अब यह चैनल उपलब्ध नहीं है, कृप्या चैनल के डिक्टेटर को देखें, क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी ई-कॉमर्स साइट से कुछ खरीदना चाहते हैं लेकिन आपका ऑपरेटर यह कहता है कि हम यह सुविधा सिर्फ कालीबाबा को देते हैं, क्या आपके साथ यह हुआ है कि किसी फिल्म को ऑनलाइन देख रहे हैं लेकिन यह क्विकफ्लिक्स पर ओजोन की तुलना में काफी धीमी चल रही है, या कभी ऐसा हुआ हो कि आप हाइप या डाइक जैसे मैसेंजर ऐप नहीं चला पा रहे हों। अगर इन तमाम मश्किलों से आपको दो चार होना पड़ा है तो आप भी इंटरनेट पर स्वतंत्रता से दूर हैं, जिससे निपटने के लिए ट्राई नेट न्युट्रैलिटी के नियमों बदलाव करने जा रही है।

इस तरह की तमाम मुश्किलों का सामना आपको सिर्फ इसलिए नहीं करना पड़ा क्योंकि आप जिस कंपनी का इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं वह डेटा देने में आपके साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करती है, आप कंपनी को इंटरनेट का पैसा देते हैं और किसी भी तरह का कंटेट देखने के लिए स्वतंत्र हैं, आपको अलग-अलग साइट्स को खोलने के लिए पैसे देने की जरूरत नहीं है। यह सिद्धांत मुख्य रूप से इस नियम पर आधारित है कि इंटरने को अन्य किसी भी उत्पाद की तरह से टेलीकॉम सेक्टर को लोगों को सरल रूप से मुहैया कराना है। इस नियम को लागू रखने के लिए और लोगों को इंटरनेट इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता को लेकर उस वक्त विवाद खड़ा हो गया जब इसपर कुछ हद तक पाबंदी लगाने की बात कही गई। लेकिन नेट न्युट्रैलिटी की इसलिए भी लागू किया जाना चाहिए क्योंकि हमारा संविधान हमें आजादी देता है, जिसे इंटरनेट पर भी लागू किया जाना चाहिए।
इस नियम के उल्लंघन का पहला मामला तब सामने आया जब अमेरिका में कई इंटरनेट की कंपनियों ने और टेलीकॉम कंपनियों ने इस बात की वकालत की कि उन्हें प्राथमिकता के आधार पर अपने ग्राहकों को अलग-अलग साइट्स चलाने के लिए अलग-अलग भुगतान की बात कही, जिसमे यह कहा गया कि लोगों को चुनिंदा साइट्स को चलाने के लिए या फिर उसे तेज चलाने के लिए अलग से भुगतान करना होगा, हालांकि यह फॉर्मूला टेलीकॉम व ऑपरेटर दोनों के लिए बिजनेस के लिहाज से फायदे का सौदा था, जिसके चलते दोनों ही पक्ष इसके लिए तैयार हो गए, लेकिन इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता।
आप जानते हैं कि जब टेक की दुनिया में कुछ भी अमेरिका में होता है तो उसका असर भारत में भी देखने को मिलता है, भारत में इस समय दो चीजें हुई, पहली यह कि कुछ बड़ी इंटरनेट कंपनियां इसी तरह के एग्रीमेंट करने के लिए आगे बढ़ी तो दूसरी टेलीकॉम सेक्टर भी इसकी ओर लपका ताकि वह कुछ अतिरिक्त मुनाफा कमा सके। भारत और अमेरिका में यह एक जैसी ही कहानी थी, जहां अमेरिका में बड़े स्तर पर इसका विरोध हुआ तो भारत में भी सिविल सोसाइटी ग्रुप ने इसका जमकर विरोध किया और इसके खिलाफ प्रदर्शन किया। लोगों ने इस कानून को इंटरनेट की आजादी पर खतरा बताया। लोगों ने इस प्रयास को बड़ी कंपनियों की साजिश के तौर पर देखा जोकि पैसा कमाने के लिए लोगों की इंटरनेट की आजादी पर हमला बोल रही हैं, जबकि टेलीकॉम वायस कॉल के दाम तकरबीन खत्म होने से काफी नुकसान का सामना कर रहा है, उसने इस मौके को भुनाने की कोशिश की यह पक्ष रखा गया कि हम इंटरनेट एक्सेस की बात कर रहे हैं ना कि कंटेंट की। टेलीकॉम के इस रवैये से लोगों में काफी गुस्सा बढ़ गया।
जब इस नए प्रस्ताव को कानून में बदलने की बात आई तो भारत और अमेरिका के रास्ते अलग थे, अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ओपेन इंटरनेट डायरेक्टिव को जारी किया, जिसके बाद टेलीकॉम को इंफ्रास्ट्क्टर प्रोवाइडर बना दिया गया जोकि सिर्फ न्यूट्रल कैरियर के तौर पर काम करेंगे। जबकि भारत में प्रधानमंत्री ने निवेश में कटौती की धमकी के बाद भी एक स्थाई रुख अख्तियार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इस मुद्दे को कंपनियों पर छोड़ दिया, उन्होंने टेलीकॉम को इस बात की आजादी दी कि वह इस बात का निर्धारण करें के उन्हें कैसे काम करना है। ट्राई ने इस मसले पर तमाम पक्षों से विचार विमर्श के बाद इस समाधान पर पहुंचा कि टेलीकॉम कंपनियों ग्राहकों से पैसों के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव नहीं कर सकती हैं। लेकिन ट्राई ने नेट न्युट्रैलिटी के मुद्दे पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।
जिसके बाद बड़े स्तर पर इस मुद्दे को लेकर विचार विमर्श शुरू हो गया, इस मुद्दे पर पिछले ही हफ्ते बातचीत का दौर खत्म हुआ और कुछ नए सुझाव के साथ इसे आगे बढ़ाया गया। ट्राई नए सुझाव के साथ सामने आया है जिसमे मुख्य रूप से कहा गया है कि आप इंटरनेट पर क्या एक्सेस करते हैं इसमें भेदभाव नहीं किया जाएगा, टेलीमकॉम को कुछ हद तक आजादी दी गई है कि वह अपने नेटवर्क को ऑप्टिमाईज कर सकते हैं, कुछ अपवाद को छोड़कर कंपनियां नेट न्युट्रैलिटी को लागू करेंगी। लेकिन इस पूरी बातचीत और सुझाव के बाद जो बात सामने आती है वह यह कि टेलीकॉम कंपनियों ने अपनी लड़ाई को अब छोड़ दिया है, ज्यादातर कंपनियों ने पैसा कमाने के दूसरे तरीके ढूंढ़़ने शुरू कर दिए हैं, ऐसे में इस फैसले से उपभोक्ता भी काफी खुश हैं। हालांकि अभी यह समझने की जरूरत है कि यह सिर्फ ट्राई के सुझाव हैं।
सुभो राय, अध्यक्ष, इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया
विचार व्यक्तिगत हैं












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