ट्रैफिक सिग्‍नल पर भीख मांगने वाले मासूम बच्‍चों का होगा डीएनए टेस्‍ट

नयी दिल्‍ली (ब्‍यूरो)। हर राज्य के अखबारों में बच्चों के गायब होने की खबर किसी ने किसी पन्ने के कोने में झांकती रहती है। देश बड़ा है। आबादी बड़ी है। संभव हो आपके आसपास कोई ऐसा नहीं मिले, जिसके बच्चे होश संभालने से पहले ही गायब हो चुके हो। इसलिए आपको जानकार थोड़ा आश्चर्य होगा, लेकिन हकीकत यह है कि आज देशभर में करीब आठ सौ गैंग सक्रिय होकर छोटे-छोटे बच्चों को गायब कर मानव तस्करी के धंधे में लगे हैं। यह रिकार्ड सीबीआई का है।

Delhi Police may do DNA tests on child beggars

अब बात अगर दिल्‍ली की करें तो दिल्‍ली में मासूम बच्‍चों के लापता होने की सनसनीखेज मामलों पर अदालतें पहले भी कई बार चिंता जता चुकी हैं। लेकिन सरकार ने अब जाकर इस मामले को गंभीरता से लिया है और बच्‍चों की तस्‍करी में शामिल गिरोहों पर नकेल कसने के लिए तैयार हो गई है। तैयारी पूरी हो चुकी है और इस क्रम में सबसे पहले ट्रैफिक सिग्‍नल पर भीख मांगले वाले बच्‍चों का दिल्‍ली पुलिस डीएनए टेस्‍ट करवा सकती है।

सूत्रों से जो जानकारी मिली है उसके मुताबिक‍ पीएमओ को इस बारे में शिकायत मिलने के बाद दिल्‍ली पुलिस ने यह फैसला किया है। जानकारी के मुताबिक एक शख्स ने पीएमओ को ई-मेल के जरिए शिकायत की थी कि ट्रैफिक सिग्नल पर भीख मांगने वाले कई बच्चे अगवा कर लाए गए होते हैं। डीएनए टेस्ट से यह पता चल जाएगा कि जो कोई भीख मांगने वाले बच्चे के मां-बाप होने का दावा करते हैं, उनके दावे में कितनी सच्चाई है। बहरहाल, अगर दिल्ली पुलिस की यह मुहिम कामयाब रहती है, तो बच्चों की चोरी में शामिल कई गिरोह कानून की गिरफ्त में आ जाएंगे और इसे बच्चों की हिफाजत की दिशा में इसे एक बड़ा कदम समझा जा सकता है।

हैरान करते हैं आंकडे

  • देश के औसतन हर घंटे में एक बच्चा गायब होता है।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 44,000 बच्चे हर साल लापता हो जाते हैं
  • लापता बच्चों में करीब 11,000 का ही पता लग पाता है
  • यूएन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत मानव तस्करी का बड़ा बाजार बन चुका है
  • देश की राजधानी दिल्ली मानव तस्करों की पसंदीदा जगह बनती जा रही है
  • देश भर से बच्चों और महिलाओं को लाकर ना केवल आसपास के इलाकों बल्कि विदेशों में भी भेजा जा रहा है।

बचपन पर तस्करों की नजर

मासूस बचपन पर, जिस पर राष्‍ट्र का भविष्‍य निर्भर करता हो, अपहरणकर्ताओं और तस्‍करों की नजर लग जाए, तो मानना चाहिए कि राष्‍ट्र की सुरक्षा खतरे में है। अपना देश वर्तमान में इसी खतरे से दो-चार हो रहा है। यहां के बचपन को सुरक्षा की दरकार है। सरकार भले ही लाख दावा करे कि वह बच्‍चों की सुरक्षा के लिए भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) के आकड़ें इन दावों की पोल खोल रहे हैं। एनसीआरबी के मुताबिक, बीते तीन वर्षों में 1.84 लाख बच्‍चे लापता हो गए।

इनमें से 28,595 बच्‍चे अपहरणकर्ताओं का शिकार बने। एनसीआरबी की रिपोर्ट यह भी कहती है कि देश में लगभग 96 हजार बच्‍चे हर साल लापता हो रहे हैं, यानी हर घंटे, लगभग 11 बच्‍चे। इन बच्‍चों में 70 फीसदी की उम्र होती है, 12 से 18 साल। आखिर इतने बच्‍चे जाते कहां हैं? जवाब मुश्किल नहीं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ‘ट्रैफिकिंग इन वूमेन ऐंड चिल्ड्रन इन इंडिया' नामक रिपोर्ट को मानें, तो बच्चों की तस्करी को रोकने के प्रयास नाकाफी हैं और इनमें मौजूद खामियों का फायदा उठाकर तस्‍कर बच्‍चों को उठाने में कामयाब हो जाते हैं।

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