नज़रिया: बंधुआ मज़दूरी को ख़त्म करने के लिए किसे झकझोरा जाए?
दो दिसंबर अंतरराष्ट्रीय दासता उन्मूलन दिवस के रूप में मनाया जाता है. पूरी दुनिया में ग़ुलामी का एक दौर रहा है जिसने बंधुआ मज़दूरी का भी रूप लिया. भारत में बंधुआ मज़दूरी आज भी जारी है.
बंधुआ मज़दूरी को आधुनिक ग़ुलामी भी कहा जा सकता है. उसकी परिभाषा बंधुआ मज़दूर प्रणाली अधिनियम, 1976 में दी गई है और इसकी पूरी पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसलों से होती है.
बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत सरकार और उसके साथ पीयूडीआर बनाम भारत सरकार इन दोनों फ़ैसलों के अनुसार, न्यूनतम मज़दूरी से कम पर जो काम कर रहा है, वो बंधुआ मज़दूर है.
इस परिभाषा को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी स्वीकार किया है. इसके अतिरिक्त भी कई तरीके हैं जिसके अनुसार कोई बंधुआ मज़दूर माना जाता है.
जब इन कारणों को लागू किया जाता है तो पता लगता है कि भारत में जितने असंगठित क्षेत्र के मज़दूर हैं, उन पर आधुनिक ग़ुलामी की परिभाषा लागू होती है. भारत में असंगठित क्षेत्र में तकरीबन 50 करोड़ लोग हैं.
इन सबको मद्देनज़र रखते हुए हम कह सकते हैं कि भारत में बंधुआ मज़दूरी कम नहीं हो रही है बल्कि बाल मज़दूरी भी बढ़ रही है. बाल मज़दूरी ग़ुलामी से कम नहीं है. मानव तस्करी के ज़रिए बच्चियों को वेश्यावृत्ति में डाला जा रहा है. यह आधुनिक ग़ुलामी की प्रथा बेहद भयंकर हो रही है.
चैंपियन तीरंदाज़ बना मनरेगा में मज़दूर
केरल में बाहरी मज़दूर सीख रहे हैं मलयालम
मज़दूर सीवर में उतरते गए और मरते गए...
केवल जागृति हुई है
बंधुआ मज़दूरी को समाप्त करने के प्रयासों को देखें तो इसको लेकर चेतना बढ़ी है. लाखों बाल और बंधुआ मज़दूर रिहा हुए हैं लेकिन इसका व्यापक प्रभाव जो पड़ना था वह हुआ नहीं. यह प्रथा अभी भी जारी है.
छप्पर डालने तक के लिए ज़मीन जिन लोगों के पास नहीं है, उनकी संख्या हमारे देश में तकरीबन 10 करोड़ है. इन लोगों के लिए पीवी राजगोपाल और दूसरे लोगों ने आंदोलन किया और एक लाख लोगों के साथ दिल्ली कूच किया लेकिन सरकारों ने एक इंच भी ज़मीन नहीं दी.
महात्मा गांधी ने बंधुआ मज़दूरी के ख़िलाफ़ चंपारण में 100 साल पहले सत्याग्रह किया था. आज उसी जगह जाकर देखा जाए तो वैसी ही भूमिहीनता, बंधुआ मज़दूरी, ग़रीबी और लाचारी है.
ख़ास जाति पर असर
गांधी शांति प्रतिष्ठान और राष्ट्रीय श्रमिक संस्थान ने मिलकर साल 1977-78 में बंधुआ मज़दूरी का पहला सर्वेक्षण किया. उसके परिणाम में 86 फ़ीसदी बंधुआ मज़दूर दलित और आदिवासी थे. यह आज भी वैसा ही दिखाई देता है.
आदिवासियों में यह बढ़ा है, क्योंकि विकास के नाम पर उनकी ज़मीनों का अतिक्रमण किया गया. इससे उनकी त्रासदी भयंकर हुई है. इसके ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज़ उठाई तो उन्हें माओवादी समर्थक कहकर जेल में ठूंस दिया गया.
इसे समाप्त करने के लिए सरकार को आगे आना होगा क्योंकि उसके पास पैसा और योजनाएं हैं. पुनर्वास की जो योजनाएं हैं, उसके लिए सरकार की तारीफ़ की जानी चाहिए लेकिन वह लागू नहीं हो रही हैं.
पहले पुनर्वास के लिए 20 हज़ार रुपये का पैकेज हुआ करता था जिसे बढ़ाकर 2 से 3 लाख रुपये कर दिया गया. उसके प्रचार के लिए भी पैसे ख़र्च किए गए. यह पूरा ज़िम्मा केंद्र सरकार के पास है लेकिन उसका पैसा किसी को नहीं जा रहा है.
नोटबंदी का असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ा है जिससे ग़रीब मज़दूरों की हालत ख़राब हुई है. मनरेगा के तहत रोज़गार दिया जा रहा है लेकिन सरकार की रिपोर्ट के हिसाब से साल के 100 दिन काम के वादे के बावजूद 44 दिन ही काम दिया जा रहा है. इसमें भी न्यूनतम मज़दूरी नहीं दी जा रही है.
सरकारी विभाग में भी बंधुआ मज़दूर
आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील कार्यकर्ता सरकारी विभागों में बंधुआ मज़दूर की तरह हैं. करोड़ों बच्चे पहली कक्षा में दाख़िला लेते हैं लेकिन पांचवीं तक पहुंचते-पहुंचते 8 से 10 करोड़ बच्चे स्कूल छोड़े देते हैं. इसका मतलब है कि वह बंधुआ मज़दूरी में जा रहे हैं.
ग़ैर-सरकारी संगठन सरकार की मदद कर सकते हैं लेकिन वही इनके पर कतर देती है. सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल पहले बंधुआ मज़दूरी और इससे जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दे दिए लेकिन आयोग ने कह दिया कि उनके कहने से कोई सरकार काम नहीं करती.
इसको समाप्त करने के लिए सबको मिलकर हल्ला बोलना होगा. दासता को समाप्त करने के लिए जो अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जा रहा है, उस पर यह प्रतिज्ञा की जानी चाहिए कि सरकारों को झकझोरा जाए.
असंगठित मज़दूरों के लिए सातवें वेतन आयोग के अनुसार कोई न्यूनतम वेतन जब तय होगा, तभी यह साबित होगा कि सरकार बंधुआ मज़दूरी को लेकर गंभीर है.
(बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से बातचीत पर आधारित)
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