US Iran War: अमेरिका ने ईरान पर फिर दागे रॉकेट, तेल खरीद में दी गई छूट भी छीनी, भारत की क्यों बढ़ सकती है टेंशन
US Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा विवाद एक बार फिर बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। दोनों देशों के बीच कुछ ही हफ्ते पहले हुआ सीजफायर (युद्धविराम) पूरी तरह टूट चुका है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने मंगलवार, 7 जुलाई को एक बड़ा फैसला लेते हुए ईरान को तेल बेचने के मामले में दी गई प्रतिबंधों की छूट (Sanctions Waiver) को तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया है।
इसके साथ ही, अमेरिकी सेना ने ईरान के ठिकानों पर दोबारा बमबारी और मिसाइल हमले शुरू कर दिए हैं।

इस अचानक बदले घटनाक्रम से पूरी दुनिया के शेयर बाजारों और कच्चे तेल (Crude Oil) के मार्केट में खलबली मच गई है, जिसका सीधा असर भारत पर भी पड़ सकता है।
दोनों देशों में कुछ हफ्ते पहले हुआ था युद्धविराम
अमेरिका और ईरान के बीच कई महीनों तक चले तनाव और संघर्ष के बाद दोनों देशों ने कुछ सप्ताह पहले एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर सहमति जताई थी। इस समझौते का मकसद दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई रोकना और हालात को सामान्य करना था। इसके तहत अमेरिका ने ईरान से तेल खरीदने पर लगी कुछ पाबंदियों में अस्थायी राहत दी थी। यह छूट 21 अगस्त तक लागू रहने वाली थी, लेकिन अब इसे तय समय से पहले ही वापस ले लिया गया है।
अमेरिका ने क्यों खत्म की तेल खरीद की छूट?
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यह राहत हमेशा के लिए नहीं थी, बल्कि ईरान के व्यवहार पर निर्भर थी। अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक-राष्ट्रपति ट्रंप और उनका प्रशासन पहले भी साफ कर चुका है कि ईरान को मिलने वाली कोई भी राहत उसके अच्छे व्यवहार पर निर्भर करेगी।
अगर ईरान समझौते का पालन नहीं करेगा, तो उसे कोई फायदा नहीं मिलेगा। अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग से गुजर रहे तीन कारोबारी जहाजों को निशाना बनाया, इसलिए तेल खरीद पर दी गई छूट वापस ले ली गई।
अमेरिका ने फिर शुरू किए सैन्य हमले
तेल खरीद की छूट खत्म करने के साथ ही अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई भी दोबारा शुरू कर दी है। यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अमेरिकी सेना ने ईरान पर कई शक्तिशाली हमले शुरू किए हैं।
अमेरिकी सेना का कहना है कि इन हमलों का मकसद ईरान को यह संदेश देना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। CENTCOM ने अपने बयान में कहा कि ईरान की कार्रवाई "बिना किसी उकसावे के की गई, बेहद खतरनाक थी और युद्धविराम समझौते का साफ उल्लंघन है।"
किस जहाज पर हुआ हमला?
अमेरिका के मुताबिक, जिन तीन जहाजों को निशाना बनाया गया उनमें से एक कतर का जहाज 'अल-रेकय्यात (Al-Rekayyat)' भी था। बताया जा रहा है कि यह जहाज ऊर्जा से जुड़ा सामान लेकर भारत आ रहा था। हालांकि, इस घटना में कितना नुकसान हुआ और किसी के हताहत होने की जानकारी अभी सामने नहीं आई है।
भारत की मुश्किलें क्यों बढ़ सकती हैं?
अमेरिका द्वारा इस छूट को रद्द किए जाने का सबसे बड़ा झटका भारत को लग सकता है। भारतीय रिफाइनरियों और अर्थव्यवस्था के लिए ईरान का तेल बेहद फायदेमंद माना जाता है।
सस्ता और आसान व्यापार: Hindustan Times की रिपोर्ट की मुताबिक- भारत की कुल जरूरत का करीब 10.5% तेल ईरान से आता था। ईरानी कंपनियां भारत को तेल के भुगतान के लिए 60 से 90 दिनों का लंबा समय (क्रेडिट पीरियड) देती हैं, जबकि दूसरे देश सिर्फ 30 दिन का समय देते हैं।
दूरी कम, ट्रांसपोर्टेशन सस्ता: वेनेजुएला या बाकी अमेरिकी देशों के मुकाबले ईरान भौगोलिक रूप से भारत के बेहद करीब है, जिससे तेल लाने का समुद्री किराया बहुत कम लगता है।
सप्लाई रुकने का डर: हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते में हर रोज करीब 1 से सवा करोड़ बैरल कच्चा तेल फंस जाता है। अगर यह रास्ता बंद या असुरक्षित होता है, तो दुनिया भर में तेल की भारी किल्लत हो जाएगी और पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे।
पहले भी दी गई थी अस्थायी राहत
मार्च 2026 में ट्रंप प्रशासन ने रूस और ईरान से ऊर्जा खरीद के लिए 30-30 दिन की अस्थायी छूट दी थी। इसका उद्देश्य वैश्विक बाजार में बढ़ती तेल कीमतों को नियंत्रित करना था। बाद में जून में ईरान के लिए एक नई राहत दी गई थी, जो 60 दिनों तक लागू रहने वाली थी। लेकिन अब अमेरिका ने इसे बीच में ही समाप्त कर दिया है।
अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर असर पड़ सकता है। यदि दोनों देशों के बीच हालात और बिगड़ते हैं या हॉर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल सकती है। इसका असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर भी पड़ सकता है, जहां पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधन की लागत प्रभावित हो सकती है।














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