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151 प्राइवेट ट्रेन चलाने में ये ग्लोबल और देसी कंपनियां ले रही हैं दिलचस्पी

नई दिल्ली- 2023 के अप्रैल महीने से देश में जो प्राइवेट ट्रेनों के संचालन की बात की गई है, उसके लिए अब दुनिया की टॉप ग्लोबल कंपनियां और भारत की भी निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियां दिलचस्पी ले रही हैं। प्राइवेट ट्रेनों को चलाने के लिए जो कंपनियां आगे आ रही हैं, उनकी आम लोगों में एक खास पहचान और भरोसा है। लेकिन, इन कंपनियों के लिए मोदी सरकार की नीतियों के हिसाब से एक बहुत बड़ी शर्त ये लगाई जा रही है कि उन्हें 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम के तहते सारी अत्याधुनिक ट्रेनों का निर्माण भारत में ही करना होगा। जाहिर कि इसके जरिए सरकार का मकसद ये है कि इससे देश में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सके।

ये ग्लोबल और देसी कंपनियां ले रही हैं दिलचस्पी

ये ग्लोबल और देसी कंपनियां ले रही हैं दिलचस्पी

भारत में निजी ट्रेनों के संचालन में जो ग्लोबल कंपनियां दिलचस्पी ले रही हैं उनमें मशीन और इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र से जुड़ी कई कंपनियां शामिल हैं। इन कंपनियों में हुंडई, हिताची, मित्सुई, बॉम्बरडायर, एल्सटॉम, मैक्योरी और सीमेंस शामिल हैं, जो भारत में ट्रेनों के चलाने की इच्छा जता रही हैं। इनमें हिताची और मित्सुई जैसी जापानी कंपनियां तो बहुत ही बड़ी ग्लोबल ब्रांड हैं। इनके अलावा कुछ और ग्लोबल ब्रांड ट्रेन चलाने की इच्छुक नजर आ रही हैं। वो हैं- सीएएफ इंडिया, सीआरआरसी जेईएलसी, जीएटीएक्स। वहीं अभी तक जिन देसी कंपनियों ने अपने देश के सबसे बड़े ट्रांसपोर्टर के साथ ट्रेन ऑपरेट करने की इच्छा जताई है, उनमें टाटा रियलिटी, अडानी पोर्ट्स, भारत फोर्ज, केईसी इंटरनेशनल, एस्सेल ग्रुप जैसी कंपनिया शामिल हैं। जबकि, सार्विजनिक क्षेत्र की कंपनियों में आईआरसीटीसी और बीईएमएल भी शामिल हैं, जिनमें आईआरसीटीसी को तो अब ऑनलाइन टिकट काटने के अलावा ट्रेनों के संचालन का भी अनुभव हासिल हो चुका है।

कुल मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों का करीब 5 फीसदी

कुल मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों का करीब 5 फीसदी

बता दें कि अभी भारतीय रेलवे ने निजी कंपनियों को जितनी ट्रेनें चलाने देने का मन बनाया है, उनकी संख्या मौजूदा 2,800 मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों का मात्र 5 फीसदी हैं। लेकिन, रेलवे के मौजूदा लंबी दूरी की ट्रेनों के मुकाबले प्राइवेट ट्रेनों का संचालन करने वाली कंपनियों के लिए कुछ खास शर्तें होंगी, जिनका पालन करना उनके लिए जरूरी होगा। मसलन, इन कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी ट्रेनें 95 फीसदी तक समय की पाबंद हों, 1 लाख किलोमीटर की यात्रा में एकबार से ज्यादा इंजन फेल होने जैसी घटनाएं न हों और उन्हें सफाई और बाकी यात्री सुविधाओं के उच्चतम मानदंड सुनिश्चित करने होंगे।

'मेक इन इंडिया' की भावना के तहत बनेंगी निजी ट्रेनें

'मेक इन इंडिया' की भावना के तहत बनेंगी निजी ट्रेनें

ट्रेनों के अलावा भारतीय रेलवे के बाकी सारे संसाधन इस्तेमाल करने के लिए निजी कंपनियों को प्रतियोगी बोली के हिसाब से रेलवे के साथ राजस्व का बंटवारा करना होगा। इसके अलावा उन्हें रेलवे लाइनों, स्टेशनों, रेलवे के तमाम बुनियादी ढांचों के इस्तेमाल के लिए एक फिक्स रकम देनी पड़ेगी और बिजली के पैसे खपत के हिसाब से चुकाने होंगे। इन कंपनियों के लिए एक बड़ी शर्त ये भी होगी कि उन्हें अत्याधिनिक ट्रेनों को 'मेक इन इंडिया' की भावना के मुताबिक भारत में ही बनाना होगा। अलबत्ता उनके ड्राइवर और गार्ड भारतीय रेलवे के कर्मचारी होंगे। जाहिर है कि अगर ये अत्याधुनिक ट्रेनें देश में ही तैयार होंगी तो इससे रोजगार का एक नया अवसर पैदा होगा।

वेट लिस्ट की संख्या कम होने की उम्मीद

वेट लिस्ट की संख्या कम होने की उम्मीद

रेलवे ने 109 जोड़ी रूटों पर 151 जोड़ी अत्याधुनिक ट्रेनों के संचालन का फैसला इसलिए लिया है, ताकि वेटिंग लिस्ट का बोझ कम हो सके, पैसेंजर की मांग के मुताबिक समय पर उनकी मनपसंद सीट उपलब्ध करवाई जा सके। निजी कंपनियों को इन ट्रेनों के लिए किराया तय करते समय एयरलाइंस और बसों के किराये को ध्यान में रखना होगा, ताकि ट्रेनों से यात्रा की अहमियत बरकरार रहे। भारतीय रेलवे की कोशिश है कि ये निजी ट्रेनों अप्रैल, 2023 से पटरियों पर दौड़नी लगें। (तस्वीरें प्रतीकात्मक)

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