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...तो सौरभ किरपाल बन सकते हैं देश के पहले समलैंगिक जज

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने गुरुवार को कॉलेजियम की बैठक बुलाई है जिसे अप्रत्याशित माना जा रहा है। अप्रत्याशित इसलिए क्योंकि वो 23 अप्रैल को रिटायर हो रहे हैं और राष्ट्रपति ने उनकी जगह जस्टिस एनवी रमना को देश का नया मुख्य न्यायधीश नियुक्त कर दिया है। वो 24 अप्रैल को शपथ लेंगे। अबतक की परंपरा यही रही है कि जब राष्ट्रपति नए चीफ जस्टिस को नियुक्त कर देते हैं तो सारी महत्वपूर्ण फाइलें अगले मुख्य न्याधीश के पास भी जाती हैं और मौजूदा चीफ जस्टिस कॉलेजियम की बैठक बुलाने और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की केंद्र सरकार को सिफारिश भेजने से बचते हैं। जस्टिस बोबडे का यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि कॉलेजियम की बैठक में देश के पहले समलैंगिक जज की बहाली का मुद्दा भी शामिल हो सकता है।

सरकार को सौरभ किरपाल के नाम पर आपत्ति

सरकार को सौरभ किरपाल के नाम पर आपत्ति

जानकारी के मुताबिक सरकार ने भारत के चीफ जस्टिस एसए बोबडे को लिखकर बता दिया है कि उसे सीनियर एडवोकेट सौरभ किरपाल की दिल्ली हाई कोर्ट का जज नियुक्त करने पर अभी भी आपत्ति है। ऐसे में जस्टिस बोबडे की अगुवाई वाले कॉलेजियम को यह तय करना है कि केंद्र सरकार की आपत्तियों के बावजूद किरपाल की नाम की सिफारिश करनी चाहिए या नहीं। अगर कॉलेजियम उनका नाम भेजता है तो वह देश के पहले ऐसे जज हो सकते हैं, जो खुद को 'गे' या समलैंगिक बताते हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक सीजेआई की एक चिट्ठी के जवाब में केंद्र सरकार ने फिर से कहा है कि 2018 में उसने उनकी नियुक्ति पर इसीलिए आपत्ति जताई थी कि उनका पार्टनर यूरोपियन है और वह स्विटजरलैंड की एम्बेसी में काम करता है, जिससे यह कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का मामला बन सकता है।

...तो सौरभ किरपाल बन सकते हैं देश के पहले समलैंगिक जज

...तो सौरभ किरपाल बन सकते हैं देश के पहले समलैंगिक जज

दरअसल, पिछले महीने ही जस्टिस बोबडे ने केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को लिखकर कॉलेजियम को उनके बारे में मिले इंटेलिजेंस इनपुट पर स्पष्टीकरण मांगा था। वैसे अटकलें लगती रही हैं कि उनकी सेक्सुअलिटी की वजह से ही उनकी नियुक्ति में अड़ंगा लग रहा है। इससे पहले अक्टूबर, 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट की कॉलेजियम में जिसकी अगुआई वहां की तत्कालीन चीफ जस्टिस गीता मित्तल कर रहीं थीं ने उन्हें जज बनाने की सिफारिश की थी। उसके करीब एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने भी उनके नाम पर 'कुछ समय बाद' विचार करने करने का फैसला किया था। लेकिन, उसके बाद कई बार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनके नाम पर फैसला टाल दिया। अंतिम बार पिछले साल अगस्त में दिल्ली हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति की सिफारिश भेजी गई थी, लेकिन उनका नाम नहीं था। ऐसे में यदि अब कॉलेजियम सिफारिश करता है तो सौरभ किरपाल बन सकते हैं देश के पहले समलैंगिक जज।

समलैंगिकता अब अपराध नहीं

समलैंगिकता अब अपराध नहीं

पहली बार जब सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनके नाम पर विचार किया था, लेकिन जज के पद पर उनकी नियुक्ति की सिफारिश टाल दी थी, उसके दो दिन बाद ही यानी 6 सितंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आईपीसी की धारा 377 यानी समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटाया था। इसके बाद ही मार्च, 2019 को दिल्ली हाई कोर्ट के सभी 31 जजों ने सर्वसम्मति से किरपाल को सीनियर एडवोकेट का दर्जा किया था।

फिलहाल किरपाल का जज बनना लग रहा है मुश्किल

फिलहाल किरपाल का जज बनना लग रहा है मुश्किल

तय प्रावधानों के मुताबिक जजों की नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम की ओर से नामों की सिफारिशों को सरकार मान सकती है या उन नामों पर फिर से विचार करने के लिए कॉलेजियम के पास वापस भेज सकती है। कॉलेजियम भी या तो अपनी सिफारिश वापस ले सकता है या उस फिर से सरकार के पास भेज सकता है। अगर वह अपनी सिफारिश पर कायम रहता है तो सरकार उसे मानने के लिए बाध्य रहती है। लेकिन, सवाल ये भी है कि कॉलेजियम में किसी के नाम पर जस्टिस बोबडे आम राय बना पाते हैं या नहीं? क्योंकि इस बैठक को लेकर कुछ जजों ने आपत्ति भी जताई है। यही नहीं, कानून मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक जस्टिस बोबडे की अगुवाई वाले कॉलेजियम की सिफारिश को मानने से केंद्र सरकार इनकार भी कर सकती है, क्योंकि उन्होंने परंपरा से हटकर कॉलेजियम की बैठक बुलाई है। अब देखने वाली बात है कि सौरभ किरपाल को देश का पहला समलैंगिक जज बनने का मौका मिल पाता है या नहीं। (सौरभ किरपाल की तस्वीरें उनके ट्विटर और फेसबुक से)

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