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कोरोना टेस्टिंग किट ख़रीद में मुनाफ़ाख़ोरी का पूरा सच

स्वास्थ्य कर्मी, कोरोना वायरस
Reuters
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कोरोना वायरस टेस्टिंग किट के दाम को लेकर भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) पर बड़ा आरोप लग रहा है. आरोप ये है कि एक रैपिड डायगोनॉस्टिक किट की क़ीमत 245 रुपए है, जिसे आईसीएमआर कंपनी से 600 रुपए में ख़रीद रहा है. यानी इस कोरोना काल में भी लोग मुनाफ़ा कमाने से नहीं चूक रहे हैं. वो भी 145 फ़ीसदी ज़्यादा.

हालांकि आईसीएमआर ने इस पूरे मसले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि भारत सरकार को एक भी पैसे का नुक़सान नहीं हुआ है. लेकिन टेस्टिंग किट ख़रीदने और बेचने और उसमें होने वाले मुनाफ़े की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. जब आप इसकी जड़ में जाएंगे तो पता चलेगा, कहानी में बहुत कुछ और है, जो सामने अभी नहीं आया.

टेस्ट
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कहां से शुरू हुआ बवाल?

दरअसल ये पूरा मामला दिल्ली हाई कोर्ट के एक ऑर्डर से शुरू हुआ. आर्डर के बारे में जानने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि कोविड-19 की जाँच दो तरह से की जाती है.

एक टेस्ट है RT-PCR टेस्ट, जिसमें रिपोर्ट आने में देर लगती है. लेकिन भारत सरकार जाँच के लिए इसी टेस्ट को ज़्यादा अहमियत देती है. दूसरा टेस्ट है रैपिड टेस्ट. जिसमें मिनटों में नतीजा आ जाता है.

लेकिन ये टेस्ट भारत सरकार सर्विलेंस के लिए करना चाहती है. इससे ये पता लगता है कि आपके शरीर में कभी इंफ़ेक्शन था और अब एंडी-बॉडी बन गए हैं.

भारत में रैपिड टेस्टिंग किट को चीन से आयात करने वाली एक कंपनी मैट्रिक्स लैब्स और पूरे भारत में इसे बांटने वाली कंपनी रेअर मेटाबोलिक्स लाइफ़ साइंसेज़ प्राइवेट लिमिटेड के बीच मार्च के महीने में एक क़रार हुआ था.

स्वास्थ्य कर्मी, कोरोना वायरस
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लेकिन दोनों कंपनियों के बीच पैसे के लेन-देन को लेकर विवाद हुआ और मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा. दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका रेअर मेटाबोलिक्स लाइफ़ साइंसेज़ प्राइवेट लिमिटेड ने डाली थी.

क़रार के मुताबिक़ वो देश भर के लिए रैपिड किट की डिस्ट्रिब्यूटर थी और मैट्रिक्स लैब देश भर में इन सभी किट के लिए इंपोर्टर यानी आयात करने वाली कंपनी थी.

उनका आरोप था कि चीन से किट्स की आयात कर रही कंपनी मैट्रिक्स लैब्स डिलीवरी के पहले पैसे की मांग कर रही है.

कंपनी के वकील जयंत मेहता ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि इस केस की सुनवाई के दौरान कोर्ट को पता चला कि चीन से किट को आयात करने वाली कंपनी तो मात्र 245 रुपए प्रति किट के दाम पर ये किट ख़रीद रही है.

इस पर कोर्ट ने कहा कि आज के इस दौर में किट जैसी ज़रूरी सामान पर 245 रुपए के ऊपर 155 रुपए और जोड़ दें तो भी कंपनी को 61 फ़ीसदी का मुनाफ़ा होगा. ये बहुत ज़्यादा है और किट बेचने वाले के लिए कम तो नहीं है. इसलिए जीएसटी के साथ मिला कर रैपिड टेस्टिंग किट की क़ीमत 400 रुपए प्रति किट से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए.

कोरोना वायरस
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और इसी ऑर्डर से ये बात निकल कर सामने आई कि चीन से मंगाई जाने वाली किट दरअसल केवल 245 रुपए में ही आ रही है, जबकि ICMR इसके लिए कंपनी को 600 रुपए का दाम दे रही है.

इस पूरे घटनाक्रम पर बीबीसी ने मैट्रिक्स लैब्स के वकील से बात की. उनके वकील अमिताभ चतुर्वेदी ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया है कि वो तो डिस्ट्रिब्यूटर को किट 400 रुपए प्रति किट के हिसाब से ही दे रहे थे, लेकिन डिस्ट्रिब्यूटर इसे आगे आईसीएमआर या दूसरी राज्य सरकारों को 600 रुपए में बांट रहे थे.

दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए दोनों कंपनियों की सहमति से ये तय किया कि आगे से ये टेस्ट किट 400 रुपए में ही सरकार को बेचे जाएंगे.

यहीं ये पता चला कि जिस किट की क़ीमत 245 रुपए है, उसे सरकार 600 रुपए में ख़रीद रही है यानी दोगुने से भी ज़्यादा दाम पर.

रेअर मेटाबोलिक्स कंपनी 22 मई 2015 में स्थापित हुई, जिसका पता दिल्ली के द्वारका इलाक़े पर रजिस्टर है. कंपनी के तीन डायरेक्टर हैं, कृपा शंकर गुप्ता, शोभा दत्ता और शैलेश पांडे. 2019 में कंपनी का टर्नओवर 6.19 करोड़ का था. अख़बार बिजनेस टुडे के मुताबिक़ कंपनी की नेट वर्थ 22.06 लाख की है.

ICMR का पक्ष और निविदाएं मंगाने की प्रक्रिया

जब विवाद ज़्यादा बढ़ गया तो आईसीएमआर की ओर से एक प्रेस नोट जारी कर पूरे मामले पर स्पष्टीकरण दिया गया. 27 अप्रैल 2020 को जारी इस प्रेस नोट में उनकी तरफ़ से दो अहम बातें कही गई.

चूंकि चीन से मंगाए ये किट ख़राब पाए गए हैं, इसलिए सरकार ने कंपनी को पैसे का भुगतान नहीं किया है. इसलिए सरकार को अभी तक कोई घाटा नहीं हुआ है.

आईसीएमआर ने सबसे पहले जब इस तरह की रैपिड टेस्टिंग किट को ख़रीदने की निविदाएं /बोलियां मंगाईं थी, तब किसी कंपनी ने इसमें रुचि नहीं दिखाई थी.

दूसरी बार निविदाएं मंगाने पर बायमेडिक्स और वोंडफो की निविदाएं फ़ाइनल की गई, जो सभी शर्तों को पूरा करते हुए सबसे कम दाम पर ये किट सरकार को देने का प्रस्ताव रख रही थी. रैपिड टेस्टिंग किट के लिए ये क़ीमत 600 रुपए थे.

आईसीएमआर का दावा है कि उन्होंने चीन की कंपनी से सीधे इन रैपिड टेस्टिंग किट को मंगाने की कोशिश की थी, लेकिन उनमें कुछ दिक्क़तें सामने आई.

उनके मुताबिक़ चीन की कंपनी- पहले ही पूरे पैसे मांग रही थी, किट ख़राब निकलने पर वापस लेने का प्रावधान उनके कोटेशन में नहीं था, वो किट के दाम को डॉलर के बढ़ने और घटने के साथ जोड़ कर दाम बता रहे थे.

इन सब वजहों से आईसीएमआर ने चीन से किट सीधे ख़रीदने की प्रक्रिया नहीं अपनाई.

आईसीएमआर का कहना है कि वो पहली बार इस तरह की किट विदेश से ख़रीद रहे थे, इसलिए जो कोटेशन कंपनियों ने उन्हें दिए वही उनके लिए रेफ़रेंस प्वाइंट था.

लेकिन ये बात तो हुई रैपिड टेस्टिंग किट की. सरकार हमेशा से दावा करती रही है कि ये टेस्टिंग किट केवल सर्विलेंस के लिए इस्तेमाल में आती है. जाँच के लिए सरकार RT-PCR किट का ही इस्तेमाल करने की सलाह देती है.

RT-PCR किट के दाम में भी गड़बड़ी

जब पूरे देश में किट के दाम को लेकर राजनीति शुरू हो गई तो सोमवार सुबह राहुल गांधी ने इस पर ट्वीट भी किया. ट्वीट में उन्होंने लिखा- "जब समूचा देश Covid-19 आपदा से लड़ रहा है, तब भी कुछ लोग अनुचित मुनाफ़ा कमाने से नहीं चूकते. इस भ्रष्ट मानसिकता पर शर्म आती है, घिन आती है. हम PM से माँग करते हैं कि इन मुनाफ़ाख़ोरों पर जल्द ही कड़ी कार्रवाई की जाए. देश उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा."

इससे पहले कांग्रेस के नेता डॉ. उदित राज ने भी एक ट्वीट के साथ फोटो शेयर करते हुए कहा था कि इसमें कितनी सच्चाई है, मुझे नहीं पता.

ट्वीट के साथ जो फोटो था, उसमें किसी अनवेरिफ़ाइड अकाउंट से लिखा गया था कि भारत में 17 कंपनियां 500 रुपए में किट देने को तैयार थीं, लेकिन पीएम ने ठेका एक गुजराती कंपनी को दिला दिया. जय हो मोदी जी की.

डॉ. उदित राज के ट्वीट का जवाब देते हुए ICMR ने लिखा, "ये फ़ेक न्यूज़ है. ICMR ने RT-PCR टेस्ट के लिए 740-1150 रुपए टेस्ट किट का दाम तय किया है और रैपिड टेस्ट के लिए 528-795 रुपए टेस्ट किट का दाम तय किया है. इससे कम क़ीमत पर कोई भी कंपनी अगर ये किट सरकार को दे सकती है, तो वो ICMR या फिर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव रिसर्च विभाग, अनु नागर से संपर्क कर सकते हैं."

जिस RT-PCR टेस्ट किट के लिए आईसीएमआर ने 740-1150 रुपए दाम अपने ट्वीट में बताया, वो टेस्ट किट के लिए प्राइवेट लैब्स 4500 रुपए जनता से वसूल रहे हैं.

इसके लिए आईसीएमआर ने बाक़ायदा एक नोटिफ़िकेशन जारी करके कहा है कि कोई निजी लैब्स कोरोना के टेस्ट के लिए 4500 रुपए से अधिक वसूल नहीं सकते.

ऐसे में सवाल उठता है कि 1150 रुपए में मिलने वाले किट के लिए 4500 रुपए क्यों वसूल रही है सरकार?

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टेस्टिंग किट दाम को लेकर पहले भी उठे सवाल

दरअसल ये पहला मौक़ा नहीं है जब कोविड-19 के टेस्ट किट को लेकर सवाल उठ रहे हैं. इसके पहले भी सर्वोच्च अदालत में कोविड-19 की हर तरह की टेस्टिंग को फ़्री करने के लिए एक याचिका दायर की गई थी.

8 अप्रैल को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि प्राइवेट लैब्स में फ़्री में हो कोविड-19 के टेस्ट. उस वक़्त बात RT-PCR टेस्ट की ही हो रही थी.

कोविड-19 का टेस्ट मुफ़्त में हो, सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका को दायर करने वाले शंशाक देव ने बीबीसी को बताया कि उनकी याचिका का आधार ही ये था कि एक परिवार में 4 लोग हैं और सबको टेस्ट करना पड़े तो 18000 रुपए का ख़र्च आएगा.

इतना ही नहीं एक बार टेस्ट करने के बाद पॉज़िटिव पाए जाने पर एक व्यक्ति को दो बार और टेस्ट कराना पड़ता है. दो बार टेस्ट में नेगेटिव आने के बाद ही उसे अस्पताल से छुट्टी मिलती है. इस लिहाज़ से तो एक परिवार के लिए 50 हज़ार से ज़्यादा ख़र्च केवल टेस्ट पर ही होगा. दवा और अस्पताल में एडमिट होने का ख़र्च तो अलग ही है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के तुरंत बाद आईसीएमआर कोर्ट पहुंची और कहा कि एक्सपर्ट की रायशुमारी करने के बाद ही प्राइवेट लैब्स के लिए RT-PCR टेस्ट की क़ीमत 4500 रुपए तय की गई है. वैसे भी आयुष्मान योजना के तहत सरकार प्राइवेट अस्पतालों में ज़रूरत मंदों का मुफ़्त में टेस्ट करवा रही है.

आईसीएमआर ने अपनी दलील में ये भी कहा कि सरकारी अस्पतालों में वैसे भी ये टेस्ट मुफ़्त हो रहे हैं. केवल 12 फ़ीसदी के आसपास ही लोग प्राइवेट लैब्स में टेस्ट करवा रहे हैं.

आयुष्मान योजना और कोविड19 टेस्ट

बीबीसी ने इस बारे में आयुष्मान भारत योजना के सीईओ इंदु भूषण से बात की. उनके मुताबिक़ 4 तारीख़ के केंद्र सरकार के फ़ैसले के बाद इस योजना के तहत अब तक मात्र 14 लोगों का कोविड टेस्ट प्राइवेट अस्पताल में मुफ़्त हो पाया है.

इनमें सबसे ज़्यादा 8 लोगों का टेस्ट मध्य प्रदेश में हुआ है, यूपी में दो, हरियाणा में दो और छत्तीसगढ़ केरल में एक-एक व्यक्ति का कोविड टेस्ट आयुष्मान योजना में मुफ़्त हुआ है.

ये हाल तब है जब सरकार ये दावा करती है कि इस योजना के देश भर में 50 करोड़ लाभार्थी हैं.

इंदु भूषण के मुताबिक़ ये संख्या कम इसलिए भी है क्योंकि आज भी क़रीब 88 फ़ीसदी लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए जा रहे हैं.

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जानकारों की राय

लेकिन जानकार इस बात से सहमत नहीं दिखते. टेस्टिंग किट और उसके दाम पर हुए पूरे विवाद पर बीबीसी ने बात की वरिष्ठ स्वास्थ्य पत्रकार विद्या कृष्णन से.

विद्या एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और वर्षों से स्वास्थ्य के मुद्दों पर लिखती रही हैं. उनके लेख द अटलांटिक और लॉस एंजेलेस टाइम्स में छपते रहे हैं.

वो पूरे टेस्ट किट ख़रीदने के पूरे मामले को एक 'स्कैंडल' मानती हैं. उनका दावा है कि सरकार ने अपना पूरा होमवर्क ही नहीं किया है. सरकार की ओर से जारी स्पष्टीकरण में भी कई ख़ामियाँ हैं.

सवाल 1- जिस रैपिड किट को उन्होंने 600 रुपए में ख़रीदा है, उसी तरह की टेस्टिंग किट को छत्तीसगढ़ सरकार ने मात्र 337 रुपए में कैसे ख़रीदा?

विद्या का कहना है कि छत्तीसगढ़ का मॉडल ही सबसे सटीक है, ऐसी नहीं है. लेकिन सरकार थोड़ा और रेकी करती तो, उनको और सस्ते में किट ज़रूर मिल जाते.

सवाल 2- दुनिया के बड़े से बड़े देश में भी ये टेस्ट फ़्री में हो रहे हैं, तो भारत में क्यों नहीं.

विद्या इसके लिए फ़्रांस और दक्षिण एशियाई देशों का उदाहरण देती हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि अमरीका में बिल लाया गया है ताकि मरीज़ों को टेस्ट के पैसे ना देना पड़े. बांग्लादेश में ये टेस्ट फ़्री में हो रहा है, श्रीलंका में फ़िलहाल केवल सरकारी लैब्स में ही ये टेस्ट हो रहा है, पाकिस्तान में प्राइवेट लैब्स में हो रहा है लेकिन वहां क़ीमत पर सरकार का नियंत्रण है और कम भी है.

सवाल 3 - मरीज़ को पैसा दे कर टेस्ट करने बोलेंगे तो वो और बीमारी को छिपाएंगे. इससे सरकार को पता नहीं चलेगा कि बीमारी समाज में किस हद तक फैल चुकी है.

सवाल 4 - RT-PCR टेस्ट का बेस प्राइज जो आईसीएमआर ने ट्विटर पर डाला वो 740-1150 रुपए है. तो प्राइवेट लैब्स में इसी टेस्ट का 4500 रुपए क्यों लिया जा रहा है?

विद्या के मुताबिक़ सरकार के पास दो ही रास्ते हैं या तो कोविड-19 की जांच फ़्री हो, या फिर दाम बहुत ही कम हो ताकि सब एफ़ोर्ड कर सकें.

विद्या का दावा है कि सरकार ने ये दाम तय करने के लिए प्राइवेट कंपनियों के साथ कमेटी बनाई. सरकार ने ख़ुद अधिक मुनाफ़े वाली क़ीमतें तय की. उनके मुताबिक़ बायोकॉन की हेड किरण मजूमदार शॉ भी इस कमेटी में थी.

बीबीसी से बातचीत में किरण मजूमदार शॉ ने इन आरोपों से इनकार किया. उनका कहना है कि वो किसी कमेटी कि कभी हिस्सा नहीं रहीं और ना ही किट ख़रीदने पर इनसे सरकार ने कभी बात की.

हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि सरकार ने उनसे संपर्क किया था ताकि वो प्राइवेट लैब्स को कोविड-19 की टेस्टिंग करने के लिए मनाएं. उन्होंने कहा, "सरकार जानती थी कि सरकारी लैब्स में टेस्ट करना ही काफ़ी नहीं है और इसमें प्राइवेट लैब्स की भागीदारी आवश्यक है. उस वक्त सरकार ने मुझसे कहा कि आपके पास डाइग्नॉस्टिक्स लैब्स नहीं हैं, लेकिन प्राइवेट लैब्स को साथ लाने का काम तो आप कर ही सकती हैं. तब मैंने प्राइवेट लैब्स से बात की थी. उस समय टेस्ट के दाम तय करने की बात जब सामने आई, तो हमने सरकार से पूछा कि उनको एक टेस्ट कितने का पड़ रहा है, उन्होंने हमें 4500 रुपए बताए और वहीं मैंने प्राइवेट लैब्स को बताया, जिस पर आगे चल कर सहमति बनी."

किरण ने आगे बताया कि उस वक्त भी उन्होंने प्राइवेट लैब्स से कहा था कि जब देश में ये किट बनने लग जाएंगे तो इसके दाम कम किए जा सकते हैं.

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किरण के मुताबिक़ ये रेट RT-PCR टेस्ट किट के लिए थे. यहां ये समझने की ज़रूरत है कि RT-PCR टेस्ट किट में क्या-क्या होता है.

उन्होंने बताया, "इसमें दाम में केवल किट ही नहीं है, इस क़ीमत में टेस्ट करने वाला आदमी, उसके पीपीई, उसके आने जाने का ख़र्च, लैब का ख़र्च, टेस्ट करने के लिए इस्तेमाल में आने वाले सामान केमिकल सब शामिल हैं. ये उतना आसान नहीं है जितना एक आम आदमी समझता है. इस दाम का एक पूरा ब्रेक-अप है."

उन्होंने कहा कि जिस दिन इस टेस्ट में इस्तेमाल होने वाले सभी सामान के दाम कम हो जाएंगे, उस दिन टेस्ट किट की क़ीमत अपने आप कम हो जाएगी. अब मैंने सुना है कि 2000 रुपए में भी भारत में ये बन रहा है.

किरण का दावा है कि सरकार के किसी कमेटी का वो कभी भी हिस्सा नहीं थी, ना ही रैपिड टेस्ट किट के चीन से इंपोर्ट में उनका कोई हाथ है.

फ़िलहाल अभी भी स्थिति दोनों टेस्ट किट के दामों को लेकर स्पष्ट नहीं है. रैपिड टेस्ट किट पर सरकार भले ही अपनी स्थिति स्पष्ट करने का दावा कर रही हो, लेकिन RT-PCR किट की उचित क़ीमतों को लेकर संशय बरक़रार है.

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