कैसे विधानसभा स्पीकरों की आड़ में सत्ताधारी दल करते हैं मनमानी? तेलंगाना का मामला सुप्रीम कोर्ट को भी खटक रहा

Telangana Politics: भारतीय लोकतंत्र में विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्हें निष्पक्ष रूप से सदन की कार्यवाही संचालित करने और संविधान के दायरे में रहते हुए निर्णय लेने का अधिकार मिला हुआ है। हालांकि, विभिन्न राज्यों में समय-समय पर यह आरोप लगते रहे हैं कि सत्ताधारी दल स्पीकर की आड़ में अपने राजनीतिक हितों को साधने का प्रयास करते हैं।

मंगलवार को ही में तेलंगाना विधानसभा में भारत राष्ट्र समिति (BRS) के तीन विधायकों के दलबदल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा स्पीकर की ओर से करीब एक साल से कोई फैसला न लेने पर सवाल उठाए हैं। यह मामला न केवल तेलंगाना बल्कि पूरे देश में विधानसभा स्पीकरों की निष्पक्षता पर बहस को फिर से जिंदा कर रहा है।

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Telangana Congress: तेलंगाना मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना विधानसभा स्पीकर से यह पूछा है कि कांग्रेस में शामिल हुए तीन बीआरएस एमएलए की अयोग्यता याचिका पर एक वर्ष बीतने के बाद भी कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या इस मुद्दे का समाधान विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद किया जाएगा।

बीआरएस विधायकों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि यह मामला न्यायिक दखल की मांग करता है, क्योंकि याचिका बहुत ज्यादा समय से लंबित है और इसमें अनावश्यक देरी हो रही है।

Telangana News: स्पीकर की भूमिका और उसका राजनीतिक प्रभाव

विधानसभा स्पीकर को भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता पर निर्णय लेने का अधिकार है। लेकिन, जब कोई विधायक (MLA) दलबदल करता है, तो स्पीकर का निर्णय कई बार राजनीतिक कारणों से प्रभावित होता दिखता है।

तेलंगाना मामले में भी ऐसा ही प्रतीत हो रहा है, जहां स्पीकर ने दलबदल करने वाले बीआरएस विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी को अनुचित ठहराते हुए कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए।

Telangana Congress Politics: कब-कब सवालों के घेरों में आई विधानसभा स्पीकरों की भूमिका?

1.मणिपुर विधानसभा मामला (2020):

केस: केशम मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा स्पीकर

सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर विधानसभा स्पीकर को दलबदल करने वाले विधायकों की अयोग्यता याचिका पर निर्णय लेने में देरी के लिए फटकार लगाई थी।

कोर्ट ने इस देरी को राजनीति से प्रेरित बताया और सुझाव दिया कि संसद को एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल स्थापित करना चाहिए, जो स्पीकर के बजाए निष्पक्ष तरीके से अयोग्यता मामलों पर फैसला ले सके।

2. तेलंगाना विधानसभा मामला (2016):

केस: एसए संपत कुमार बनाम काले यदैया

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना विधानसभा स्पीकर को तीन महीने के भीतर दलबदल से संबंधित याचिका पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। यह आदेश यह तथ्य जाहिर करता है कि न्यायपालिका स्पीकर की निष्पक्षता को लेकर लगातार संदेह व्यक्त कर चुकी है।

3.महाराष्ट्र विधानसभा निलंबन (2021):

जुलाई 2021 में, महाराष्ट्र विधानसभा में 12 बीजेपी विधायकों को एक साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। विधायकों ने इसे अनुचित करार दिया और कहा कि उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायालय ने इसे अनुचित करार दिया।

Telangana Politics: संवैधानिक प्रावधान और न्यायिक समीक्षा

संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत, स्पीकर को दलबदल से संबंधित मामलों में निर्णय लेने का अधिकार दिया गया है। हालांकि,किहोटो होलोहोन बनाम जचिल्लू (1992) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि स्पीकर के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगे और यदि कोई निर्णय दुर्भावनापूर्ण या असंवैधानिक पाया जाता है, तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है।

Telangana Politics: क्या समाधान संभव है?

1.निश्चित समयसीमा: स्पीकर को दलबदल मामलों पर निर्णय लेने के लिए एक निश्चित समयसीमा का पालन करना चाहिए।

2.स्वतंत्र ट्रिब्यूनल: सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के अनुसार, स्पीकर के बजाय एक स्वतंत्र न्यायिक या अर्ध-न्यायिक ट्रिब्यूनल को दलबदल मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार देना चाहिए।

3.निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी: न्यायपालिका को स्पीकर की ओर से लिए गए निर्णयों की समीक्षा करने की शक्ति होनी चाहिए, ताकि किसी भी राजनीतिक पक्षपात को रोका जा सके।

तेलंगाना का मामला एक बार फिर यह दिखाता है कि विधानसभा स्पीकर का पद राजनीतिक दखल से अछूता नहीं रह पाया है। स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठना भारतीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप बताता है कि न्यायपालिका इस प्रकार की देरी और पक्षपातपूर्ण रवैए को स्वीकार नहीं करेगी। यह आवश्यक हो गया है कि स्पीकर को सीमित समयसीमा में निर्णय लेने के लिए बाध्य किया जाए और एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल की स्थापना की जाए, ताकि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों की रक्षा हो सके।

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