तेलंगाना चुनाव: क्या केसीआर ने अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए की थी विधानसभा भंग?
नई दिल्ली। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) प्रमुख और मु्ख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने राज्य विधानसभा चुनाव से आठ महीने पहले ही विधानसभा भंग कर दी। केसीआर ने भले ही किसी और मकसद से विधानसभा को भंग किया हो, लेकिन विपक्ष ने आरोप लगाया है कि सीएम अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहे हैं और लोगों से जो उन्होंने वादे किए थे, उन्हें पूरा करने में वह नाकाम रहे हैं। केसीआर पर आरोप है कि उन्होंने न सिर्फ राज्य में कांग्रेस को पैर जमाने का मौका दिया है, बल्कि पार्टी और जनता को भी धोखा दिया है।

कांग्रेस और अन्य पार्टियां अब याद दिला रही ही कि कैसे केसीआर ने वादा किया था कि यदि कांग्रेस तेलंगाना के गठन की अनुमति देती है तो टीआरएस को इसके साथ विलय कर दिया जाएगा, लेकिन केसीआर ने कांग्रेस के साथ टीआरएस के विलय के विचार को खारीज कर दिया है। वहीं, अब चुनाव के समय यह भी याद दिलाया जा रहा है कि 2014 के चुनावों के दौरान केसीआर ने दलित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने और एलकेजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा के वादे किये थे, जो पूरे नहीं हुए हैं।
तेलंगाना सरकार पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि वे न सिर्फ राज्य के पानी और संसाधनों का सही से प्रयोग करने में नाकाम रहे हैं, बल्कि रोजगार के अवसर भी नहीं पैदा कर पाए हैं। इसके अलावा अपने पड़ोसी राज्य आंध्रप्रदेश के साथ चल रहे विवाद को निपटाने में भी केसीआर सरकार नाकाम रही है। पानी की समस्या की वजह से तेलंगाना में कई प्रोजेक्ट्स को बंद करना पड़ा है।
पानी का सही से इस्तेमाल करने में नाकाम रही केसीआर सरकार ने किसानों के साथ सबसे ज्यादा अन्याय किया है। वहीं, सरकार ने किसानों के लिए जो ऋतू बंधू योजना बनाई थी, वह खुद पर ही बोझ बन गई है। इस योजना के अंतर्गत राज्य सरकार प्रत्येक किसान के लिए प्रति सीजन 4,000 रुपये प्रति एकड़ का निवेश प्रदान कर रही है। सरकार ने इस रबी सत्र में 4,000 रुपये प्रति एकड़ का वितरण करने का प्रावधान है। लेकिन, सरकार की यह ऋतू बंधू योजना उस छोटे किसान तक नहीं पहुंच पाई, जहां असल में पहुंचनी चाहिए थी। तेलंगाना में 60 से 65 फीसदी लैंड ऑनर्स खेती नहीं करते हैं, लेकिन उनको इस योजना का लाभ मिल रहा।












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