Telangana Election: बंदी संजय कुमार को लेकर दुविधा में है बीजेपी या अपना रही है खास रणनीति?

तेलंगाना में बीजेपी ने जब लोकसभा सांसद बंदी संजय कुमार को प्रदेश की कमान सौंपी थी, उसके बाद पार्टी मजबूत स्थिति में आने लगी थी। इस बात में कोई दो राय नहीं कि कुछ ही महीनों में उनके नेतृत्व में भाजपा राज्य में एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर आई।

पार्टी ने 2020 के मार्च में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। मुख्यमंत्री केसीआर की सत्ताधारी बीआरएस के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से आक्रामक राजनीति शुरू की, उससे बीजेपी चर्चा का विषय बन गई और इस वजह से उसे चुनावी सफलता भी मिलने लगी।

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जब बीजेपी आक्रामक थी तो किया नेतृत्व परिवर्तन
अलबत्ता बंदी संजय कुमार के काम करने के तरीके को लेकर पार्टी में सवाल भी उठने लगे थे। पार्टी में जल्द ही उनके कई विरोधी उभर आए और नेतृत्व परिवर्तन का दबाव बढ़ने लगा। शुरू में पार्टी की सेंट्रल लीडरशिप ने इन मांगों को नजरअंदाज किया। लेकिन, इस साल 4 जुलाई को अचानक केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना दिया। यह वह वक्त था कि कांग्रेस की जगह भाजपा ही मुख्य विपक्ष की भूमिका में नजर आ रही थी। बीजेपी के इस हृदय परिवर्तन को लेकर राजनीतिक पंडितों में भी कयासबाजियां शुरू हो गईं।

बीआरएस के खिलाफ आक्रामक राजनीति पड़ी भारी
जानकारों का मानना है कि बंदी को इसलिए हटना पड़ा, क्योंकि वह बीआरएस के खिलाफ बहुत ज्यादा आक्रामक थे और यह पार्टी की दूर की रणनीति में मुश्किलें खड़ी कर सकती थी। सीधे शब्दों में कहें तो 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद अगर भाजपा को बीआरएस के समर्थन की आवश्यकता पड़ेगी तो इसमें दिक्कत आ सकती है। मतलब, पार्टी भारत राष्ट्र समिति के खिलाफ उतनी भी आक्रामक रणनीति के पक्ष में नहीं थी कि बाद में किसी तरह का समीकरण बनाने में दिक्कत हो जाए।

विधानसभा चुनावों में फिर से पड़ बंदी संजय की राजनीति की जरूरत
वैसे केसीआर की बेटी के कविता के खिलाफ दिल्ली शराब घोटाले में सीबीआई और ईडी की जांच अभी भी चल ही रही है। बंदी संजय को पार्टी ने प्रदेश नेतृत्व की जगह पहले केंद्रीय संगठन की जिम्मेदारी सौंपी थी। लेकिन, जब विधानसभा का चुनाव आया तो चुनाव मैदान में एक प्रभावशाली लड़ाई लड़ने के लिए उतार दिया है। कुछ ओपिनियन पोल के मुताबिक कांग्रेस और बीआरएस के बीच की सीधी लड़ाई को बीजेपी त्रिकोणीय बनाने के लिए संघर्ष कर रही है।

इंडियन एक्सप्रेस ने पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के लक्ष्मण के हवाल से कहा है, 'बंदी संजय अगर एमएलए चुने जाते हैं तो ज्यादा कर सकते हैं। विधानसभा में हमें एक मजबूत नेता की जरूत है। पार्टी भी प्रमुख चुनाव क्षेत्रों में जीतने वाले उम्मीदवारों को उतारना चाहती है। इसलिए संजय और डी अरविंद दोनों को विधानसभा चुनाव लड़ने को कहा गया है। अगर वे जीतते हैं तो वे यह भी सुनिश्चित कर सकते हैं कि अगले साल लोकसभा चुनाव में नए उम्मीदवार उनकी मौजूदा सीटें जीत सकें।'

बंदी संजय 2018 में करीमनगर से विधानसभा चुनाव हार गए थे, लेकिन 2019 में करीमनगर से ही लोकसभा का चुनाव जीत गए थे। 2018 में बीजेपी जब राज्य में सिर्फ 1 ही सीट जीती थी, तो उसे महसूस हुआ था कि प्रदेश में पार्टी के पास जो भी नेता हैं, वे हिंदुत्व के प्रति काफी 'सॉफ्ट' हैं। बंदी संजय को हिंदुत्व के पिच पर आक्रामक बैटिंग के इरादे से ही लाया गया था।

अपनी नियुक्ति के कुछ ही महीने बाद 2020 के दिसंबर में उन्होंने अपनी क्षमता हैदराबाद निगम चुनाव में दिखा दिया था। 150 सीटों में से 48 पर जीतकर पार्टी ने कर्नाटक के बाद दक्षिण भारत के दूसरे राज्य में अपना डंका बजा दिया था। पार्टी उनके नेतृत्व में महत्वपूर्ण हुजूराबाद और दुबाक्का विधानसभा उपचुनाव भी जीत गई।

उन्होंने 28 अगस्त, 2021 से एक राज्यव्यापी प्रजा संग्राम यात्रा की शुरुआत की थी। इसके माध्यम से वे बीआरएस सरकार पर निशाना साध रहे थे। 5 चरणों में उन्होंने 120 दिनों की यात्रा में राज्य में 1,500 किलोमीटर की पद यात्रा की और 60 विधानसभा क्षेत्रों में घूमे। पदयात्रा खत्म होने के बाद आयोजित सभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उनकी तारीफ की तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पैदल मार्च की सफलता के लिए उन्हें बधाई दी।

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