Telangana Election: किस पार्टी के मुफ्त के वादों में है ज्यादा दम? तेलंगाना की माली हालत जान लीजिए

तेलंगाना विधानसभा चुनाव की तारीख काफी करीब आ चुकी है और दस दिन बाद ही 30 नवंबर को राज्य की 119 सीटों के लिए मतदान होने जा रहा है।

सत्ताधारी भारत राष्ट्र समिति (BRS), कांग्रेस और बीजेपी सभी प्रमुख दलों ने वोटरों के सामने वादों का पिटारा खोल दिया है। चुनाव जीतने के 'अचूक हथियार' माने जा रहे कुछ वादों को गौर करने पर कभी-कभी लगता है कि अब तो सिर्फ 'चांद-तारे' तोड़कर लाने जैसे वादे ही बाकी रह गए हैं!

telangana election and freebies

तेलंगाना की वित्तीय स्थिति कैसी है?
तेलंगाना में बीआरएस ने हैट्रिक लगाया या फिर कांग्रेस की सत्ता वाली मुराद पूरी हुई तो राज्य के खजाने की स्थिति के हिसाब से ये पार्टियां कैसे अपने वादे निभा पाएंगी या फिर बीजेपी जीती तो अपना संकल्प कैसे पूरा करेगी? यह जानने से पहले तेलंगाना की वित्तीय स्थिति और राज्य की माली स्थिति पर नजर डाल लेना जरूरी है।

सबसे पहले चालू वित्त वर्ष की बात कर लेते हैं। साल 2023-24 का बजट प्रोजेक्शन 2,90.396 करोड़ रुपए का है। इसे पूरा करने के लिए 2,59,861 करोड़ रुपए के राजस्व प्राप्ति का अनुमान लगाया गया है। अगर इसे वास्विक चश्मे से देखें तो इस साल अगस्त तक राज्य सरकार 99,106 करोड़ रुपए का राजस्व जुटा पाई थी।

पिछले बजट की वास्तिक तस्वीर कैसी रही?
पिछले वित्त वर्ष (2022-23) की बात करें तो राज्य सरकार ने 2,56,958 करोड़ रुपए का बजट पेश किया था, जिसमें 2,45,256 करोड़ रुपए राजस्व के तौर पर जुटाने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन, राज्य सरकार ने सीएजी के सामने जो आंकड़े पेश किए, उसके हिसाब से वह सिर्फ 1,92,097 रुपए ही राजस्व जुटा सकी थी और उसमें टैक्स का हिस्सा महज 1,26,617 करोड़ रुपए था।

तब राज्य सरकार ने 19,553 करोड़ रुपए की जमीन भी बेची थी और अन्य स्रोतों से भी धन जुटाए थे। तब जाकर भी कुल राजस्व के तौर सिर्फ 1.51 लाख करोड़ रुपए सरकारी खजाने में आया था। जबकि, सरकारी कर्मचारियों के वेतन, पेंशन आदि का भार ही राज्य पर 60,000 करोड़ रुपए का था। कहने का मतलब सरकार की आमदनी और खर्च में बहुत बड़ा अंतर रह गया था।

ब 3.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का हो सकता है बजट
इस बार राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए जो मुफ्त के वादे बांटे हैं, उसे चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमानों से ही हिसाब लगाएं तो जो भी अगली सरकार बनेगी, उसे इसे पूरा करने में बहुत ही मुश्किल आ सकती है।

राजस्व के गैप को कैसे मिटा सकेगी नई सरकार?
क्योंकि, मौजूदा 2.9 लाख करोड़ रुपए के बजट को बढ़ाकर वादे पूरे करने के लिए इसे बढ़ाकर 3.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा तक ले जाना पड़ सकता है। ऐसे में सवाल है कि जो भी नई सरकार बनेगी वह अपने वादों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त राजस्व कहा से जुटा सकेगी?

किस पार्टी के मुफ्त के वादों में है ज्यादा दम?
अब प्रमुख राजनीतिक दलों ने जो लोक-लुभावन वादे किए हैं, उसे पूरा करने के लिए सरकारी खजाने पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ेगा उसकी बात कर लेते हैं। क्योंकि, सभी राजनीतिक दलों के वादे अलग-अलग तरह के हैं।

बीजेपी के वादों का खर्च- 500-1,000 करोड़ रुपए अनुमानित
जैसे भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में सरकार बनने पर फ्री लैपटॉप, तीर्थ यात्राओं और राशन कार्डधारियों को साल में चार मुफ्त एलपीजी सिलेंडर देने का वादा किया है। अगर बीजेपी को सरकार बनाने का मौका मिलता है तो पार्टी की इन चुनावी रेवड़ियों को पूरा करने के लिए सरकारी खजाने पर 500 से लेकर 1,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ने का अनुमान है।

बीआरएस के वादों का खर्च- 52,000 करोड़ रुपए अनुमानित
वहीं सत्ताधारी बीआरएस ने भी कई तरह की मुफ्त योजना का वादा किया है। इसने पहले से चल रही कुछ योजना के रकम में भी बढ़ोतरी की बात कही है। इसके प्रमुख वादों में 5 लाख रुपए का बीमा, पेंशन की रकम बढ़ाकर 5,016 रुपए करने, गैस सिलेंडर 400 रुपए, रायथु बंधु के लिए 16,000 रपुए और महिलाओं के लिए किए गए वादों के अलावा अन्य वादों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त 52,000 करोड़ रुपए लगने का अनुमान है।

कांग्रेस के वादों का खर्च- 68,000 करोड़ रुपए अनुमानित
चुनावी वादों के इस खेल में कांग्रेस ने सबको पीछे छोड़ रखा है। अकेले किसानों के 2 रुपए तक की ऋण माफी के उसके वादे पूरे करने के लिए 38,398 करोड़ रुपए लगेंगे। कुल मिलाकर कांग्रेस पार्टी की ओर से जो मुफ्त की गारंटियां दी गई हैं, उसे पूरा करने के लिए जनता के खजाने पर सालाना 68,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

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